संस्कृत को बनाये राष्ट्रभाषा, सभी प्रांतों में स्वीकार्य है देववाणी

  • छात्रसंघ के उद्घाटन समारोह में शंकराचार्य नरेन्द्रानन्द सरस्वती के विचार, जानिए और क्या कहा
वाराणसी. सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग उठी है। मंगलवार को छात्रसंघ उद्घाटन समारोह में काशी सुमेरू पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य नरेन्द्रानंद सरस्वती ने बतौर मुख्य अतिथि कहा कि संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनानी चाहिए। देश के सभी प्रांतों में देववाणी स्वीकार्य है।




उन्होंने कहा कि कतिपय प्रांतों में हिन्दी का विरोध है, लेकिन संस्कृत भाषा सभी जगह पर मान्य है। पीएम नरेन्द्र मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए नरेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि जाति नहीं आर्थिक पक्ष को ध्यान में रखते हुए ही आरक्षण देना चाहिए। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव विजय शंकर पाण्डेय ने कहा कि सरकार की मंशा छात्रसंघ को शिखडी बनाने की है, जबकि छात्रसंघ की भूमिका अर्जुन व भीम की तरह होनी चाहिए। रूपेश पाण्डेय ने कहा कि संस्कृत के विद्वानों के उपर भारतीय संस्कृति की रक्षा की विशेष जिम्मेदारी है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो.यदुनाथ प्रसाद दुबे ने कहा कि सत्य का मार्ग कठिन होता है और सत्य के मार्ग पर चल कर ही सफलता पायी जा सकती है। उन्होंने कहा कि सभी को सत्य स्वीकारना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में बहुत सी कठिनाई आती है और जो लोग सत्य का मार्ग छोड़ देते हैं वह कभी सफलता नहीं पाते हैं। यदि उन्हें सफलता मिल भी जाती है तो वह क्षणिक होती है और एक दिन उन्हें असफलता का सामना करना पड़ता है, जबकि सत्य के मार्ग पर चलने वालों को थोड़ी बहुत सफलता मिल जाती है लेकिन अंत में वह सफल होकर रहते हैं। छात्रों को इस सूत्र को अपने जीवन में आत्मसात कर लेना चाहिए।


स्वागत भाषण पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष डा.अखिलेन्द्र त्रिपाठी ने किया। इस अवसर पर पहली महिला छात्रसंघ अध्यक्ष प्रिया चौबे, महामंत्री नरेन्द्र कुमार मिश्रा
पूर्व छात्रसंध अध्यक्ष डा.गिरजानंद चौबे, अध्यापक संघ अध्यक्ष प्रो.आशुतोष मिश्रा, प्रो.सदानंद शुक्ल, प्रो.हर प्रसाद दीक्षित, डा.जनकनंदनी शरण बाबा, काशी विद्यापीठ के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष संदीप सिंह आदि लोग उपस्थित थे।