नेहरू ने संस्कृत को नहीं बनने दिया राष्ट्र भाषा, अब है मौका

  • बीएचयू में बोले पद्मविभूषण प्रो. मुरली मनोहर जोशी।
वाराणसी. संस्कृत को मेडिकल और इंजीनियरिंग फिल्ड जोड़ा जाना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक इसका ज्यादा विकास संभव नही है। यह कहना है पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री पद्मविभूषण प्रो. मुरली मनोहर जोशी का। वह सोमवार को बीएचयू में कालिदाससंस्थानम् वाराणसी के अध्यक्ष प्रो. रेवा प्रसाद द्विवेदी तथा प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी द्वारा सम्पादित च्च्अलंकारशास्त्रागम्ज्ज् नामक ग्रन्थ के  लोकार्पण समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माण के दौरान आंबेडकर जी ने राष्ट्र भाषा के लिए प्रस्ताव मांगा तो सभी ने संस्कृति भाषा पर मुहर लगा दी थी लेकिन जवाहर लाल नेहरु के हस्तक्षेप के कारण संस्कृत राष्ट्रभाषा नही हो सकी लेकिन अब संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए तथा इसका अध्ययन-अध्यापन प्रत्येक भारतवासी के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए।


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प्रो. जोशी ने कहा कि संस्कृत भाषा हमारे देश की सर्वोत्तम सम्पत्ति है। देश के प्रत्येक नागरिक को इसको अवश्य ही पढ़ना चाहिए। संस्कृत में जीवन के नियामक सफल उपदेश ही नही हैं, अपितु इसमें सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान-विज्ञान भी सन्नहित है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन का अभूतपूर्व केन्द्र है। इसमें अध्यापनरत प्रध्यापको की जिम्मेदारी बनती है कि वे संस्कृत के वर्तमान पाठ्यक्रम को और अधिक व्यावहारिक बनायें जिससे की इसमें निहित ज्ञानराशि का जन-जन तक प्रसार हो सके। उन्होंने कहा कि संस्कृत के उत्थान के लिए केंद्र स्तर पर कार्य होना चाहिए ताकि इस भाषा को आधुनिक विद्या के साथ जोड़ा जा सके।



बीएचयू में संस्कृत के समुन्नयन की संभावनाएं
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत के समुन्नयन की अभूतपूर्व सम्भावना है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष में संस्कृत पर आधारित अन्तर्वेषयिक शोध हेतु भारत अध्ययन केन्द्र की स्थापना की गयी है। श्री कमल मोरारका ने संस्कृत के समुन्नयन के लिए हर सम्भव सहायता प्रदान करने के अपने संकल्प को उजागर किया। एम.आर. मोरारका फाउण्डेशन मुम्बई द्वारा प्रदत्त आर्थिक अनुदान से साहित्यशास्त्रसमुच्चय ग्रन्थमाला के अन्तर्गत कालिदास संस्थान द्वारा इस ग्रन्थमाला के सात भागों का प्रकाशन किया जा चुका है जिनमें 22 से भी अधिक साहित्यशास्त्र के आचार्यों के ग्रन्थ सम्पादित हैं। सातवां भाग है अलंकारशास्त्रागम।


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आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी ने ग्रन्थ के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि अज्ञातनामा काव्यप्रभा टीका के साथ इस ग्रन्थ के प्रकाशन से सम्पूर्ण साहित्यशास्त्र की दिशा बदल गयी है। अब तक साहित्यशास्त्र में ध्वनिवाद को सर्वोपरि माना जाता रहा परन्तु अलंकारशास्त्रागम के प्रकाशन से यह तथ्य आधारहीन सिद्ध हो जाता है। अलंकारशास्त्रागम में साहित्यशास्त्र विषयक अनेक अभिनव सिद्धान्त उपस्थित हैं। जिन्हें प्रत्येक अध्येता को पढ़ना चाहिए। यह ग्रन्थ साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में अभिनव क्रान्ति का प्रवर्तक है। समारोह में 100 से अधिक विभिन्न शास्त्रों के मूर्धन्य संस्कृतविद्वानों का श्री कमल मोरारका द्वारा सम्मान किया गया। कालिदास संस्थान ने साहित्यशास्त्रागम के सातों ग्रन्थ सभी विशिष्ट अतिथियों को प्रदानकर उन्हें सम्मानित किया।


कार्यक्रम में प्रसिद्ध उद्योगपति पूर्व सांसद कमल मोरारका तथा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो0 यदुनाथ प्रसाद दुबे आदि उपस्थित रहे।