Wildlife Week News; भारत में क्यों मनाया जाता है वन्य प्राणी सप्ताह,  पढि़ए

भारत सरकार ने किसी भी वन्यजीव को लुप्त होने से बचाने के लिए 1952 में भारतीय वन्यजीव बोर्ड की स्थापना की थी
वन्य जीव सप्ताह पर विशेष

The Government of India established the Wildlife Board of India in 1952 to protect any wildlife from extinction.
Special on Wildlife Week

सुनील मिश्रा @सूरत. देश भर में इन दिनों वन्य जीव सप्ताह (Wildlife Week) मनाया जा रहा है। पृथ्वी पर जीव सृष्टि की सुरक्षा के लिए भारत में इसकी शुरुआत वर्ष1952 से हुई थी। इसी वर्ष भारत सरकार ने किसी भी वन्यजीव को लुप्त होने से बचाने के लिए भारतीय वन्यजीव बोर्ड (Wildlife Board of India ) की स्थापना की थी। तब से देश में हर साल 2 अक्टूबर से 8 अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह मनाया जाता है। वन्यजीव सप्ताह के दौरान वन्य जीवों और पर्यावरण सुरक्षा के उपाय सुझाए जाते हैं। कहा जाता है कि वन्य जीवों के बगैर मानव का अस्तित्व ही संकट में पड़ सकता है। वन्यजीवों का महत्व समझने और उनके संरक्षण के उपाय करने जरूरी हैं। दवाइयों के अधिक प्रयोग और जीव हत्या से कई पशु-पक्षी विलुप्त हो चुके हैं। इनमें गिद्ध प्रमुख है। अंतिम बार गिद्धों के झुण्ड को बाड़मेर में देखा गया था। आज मानव का मुफ्त सफाईकर्मी कहे जाने वाले गिद्ध लगभग विलुप्त ही हो गए हैं। आज के दौर में सिंह, बाघ आदि की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। कुछ जंगली जानवर तो संरक्षित अभयारण्यों में ही देखने को मिलते हैं। गौरतलब है कि यूएसए में नेशनल वल्र्ड लाइफ वीक 1838 से मनाया जा रहा है।

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वन्यजीव सप्ताह: बारिश दे गई भोजन- पानी की सौगात
सिलवासा. मानसून की विदाई के समय बारिश वन्यजीवों के लिए सौगात से कम नहीं रही। अंतिम चरण की बारिश ने जंगलों के तालाब, सराय, पोखर, नाले सभी भर दिए हैं। पानी से धरा की घास बरकरार है। बारिश से वन्यजीवों के भोजन एवं पानी की समस्या समाप्त हो गई है। जंगलों में घास हरीभरी दिखाई देने लगी है। चेकडेम एवं तालाबों में पानी भर गया है। पहाड़ों से गिरते झरने सुशोभित हो गए हैं। दमणगंगा व साकरतोड़ नदियां बहने लगी हैं। मानसून सक्रिय रहने से दपाड़ा डियर पार्क व वासोणा लॉयन सफारी के नाले व तालाब पानी से लबालब भर गए हैं। सुहावना मौसम व हरीतिमा से भरपूर डियर पार्क में जानवरों की हलचल बढ़ गई हैं। वनरक्षक बी के रोहित ने बताया कि सतमािलया अभयारण्य में सांभर, चीतल व नीलगाय मिलाकर कुल 371 शाक पशु प्राणी हैं। 310 हैक्टेयर भूभाग पर फैले सतमालियां की देखभाल एवं रख-रखाव वन विभााग करता है। इस बार इस अभयारण्य में 25 से 30 जानवर बढ़ गए हैं। बारिश से अभयारण्य में हरी घास की कमी नहीं हैं। मानसून के बाद जानवरों के लिए सतमालिया के 5-6 प्लॉट बनाकर हरी घास सुरक्षित रखी जाती है। एक प्लॉट की घास खा लेने पर दूसरे प्लॉट में जानवरों को छोड़ दिया जाता है। हरी-भरी लम्बी घास की खास किस्में मानसून में बोई जाती हैं। वर्तमान में पांच प्लॉट में भरपूर हरी घास खड़ी है। मानसून विदा होते ही जानवरों को सप्लीमेंट्री आहार देना शुरू कर दिया है।

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Sunil Mishra
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