सागर. एक अनार सौ बीमार, यह कहावत गल्र्स कॉलेज की प्रयोगशाला पर फिट बैठती है। दरअसल कॉलेज में 65 साल पुरानी छोटी-छोटी लैब हैं और इनका प्रयोग करने वाली छात्राओं की संख्या हजारों में होती है। साफ है कि इतनी बड़ी संख्या में सौ फीसदी छात्राओं का प्रैक्टिकल करा पाना मूमकीन नहीं होता है। प्रबंधन भी मानता है कि ५० फीसदी छात्राएं बगैर प्रैक्टिकल किए रह जाती हैं। साइंस ग्रुप ऐसे विषय होते हैं, जिनमें थ्यौरी के साथ-साथ प्रेक्टिकल नॉलेज होना छात्रों के लिए जरूरी होता है। लेकिन शहर के एकमात्र महिला महाविद्यालय में इसकी अनदेखी हो रही है। यहां साइंस ग्रुप की छात्राओं को सिलेबस के अनुसार महज 50 फीसदी ही प्रैक्टिकल कराए जा रहे हैं। इतना ही नहीं 3 विभाग ऐसे हैं, जिनकी लैब तक नहीं बनी है। ऐसे में इन विभागों की सैकड़ों छात्राओं को महज थ्यौरी ज्ञान से ही संतोष करना पड़ रहा है।

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