रीवा. कौन बच्चा नहीं चाहता की त्योहार में उसके पास जो कपड़े हों वह किसी से कम न हों। सभी तो यही चाहते हैं कि उनके पास भी सब की तरह नए एवं अच्छे कपड़े हों। अच्छे कपड़े रहेंगे तभी तो चेहरे पर खुशी और मुस्कान रहेगी। हंसी - खुशी के साथ वह भी अन्य साथियों के साथ त्योहार में शरीक हो सकेगा लेकिन यह सब तभी हो सकता है जब पर्याप्त रुपए हों। त्योहार में तो हर कोई शरीक होना चाहता है चाहे वह गरीब हो या अमीर। बड़ा हो या छोटा। बकरीद से एक दिन पहले मंडी में चारों ओर चहल-पहल है, सैकड़ों व्यापारी अपने जानवरों के साथ मौजूद हैं।

उसी मंडी में एक छोटा सा बालक भी है। जो अपना बकरा लेकर बेंचने आया है। उसे देखकर मुंशी प्रेमचंद्र की कहानी ईदगाह की याद आ जाना लाजमी है। मंडी में वह अपना बकरा बेंचकर ढ़ेर सारे रुपए पाएगा। फिर उससे नए कपड़े खरीद कर बकरीद में सब के साथ शरीक होगा। आखिरकार वह दिन आ ही गया और सब की तरह वह भी रविवार को अपने बकरे के साथ मंडी में पहुंचा। पुराने कपड़े पहने अपने जानवर के साथ ग्राहक का इंतजार कर रहा है। वह अपने जानवर की खूबी बताता है। जिससे जानवर के प्रति ग्राहक आकर्षित हों और उसे अच्छा दाम मिल सके और वह सबके साथ बकरीद मना सके। मंडी में जैसे ही कोई सख्स प्रवेश करता है, अरशद आशा भरी निगाह से उसी की ओर एकटक देखने लगता है। अपने बकरे को सहलाता है। ग्राहक मंडी में मौजूद अन्य बकरे के साथ मोल - भाव करने लगते हैं तो उसका चेहरा मुरझा जाता है वह कुछ समय के लिए हताश हो जाता है। बकरे खरीदने के लिए आया वह सख्स जब आगे बढ़ता है तो आशा है कि उसका बकरा बिकेगा। जिससे मिले रुपए से वह अपने लिए नए कपड़े खरीदेगा और बकरीद मनाएगा। आखिर हुआ भी ऐसा ही बकरा बिका तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं। मानों उसे सारी जन्नत की खुशी मिल गई हो।

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।