जगन्नाथ रथयात्रा में श्री कृष्ण के साथ क्यों नहीं बैठती राधा और रुक्मणी

Tanvi Sharma

Publish: Jul, 04 2018 02:25:08 PM (IST)

बलराम और सुभद्रा के साथ श्री कृष्ण की रथयात्रा के पीछे प्रचलित है एक कथा

श्री जगन्नाथ जी की रथयात्रा पुरे संसार में प्रसिद्ध है। भगवान श्री कृष्ण के साथ राधा और रुकमणी का नाम जुड़ा होता है। वहीं हमने कई मंदिरों में देखा है तो कृष्ण के साथ राधा जी होती हैं। लेकिन फिर भी भगवान जगन्नाथ जी की इस रथ यात्रा के दौरान के उनके साथ ना राधा जी बैठती हैं ना ही रुक्मणी बल्कि उनके साथ इस भव्य महोत्सव के दौरान उनके साथ बलराम और सुभद्रा होते हैं। बलराम और सुभद्रा के साथ श्री कृष्ण की रथयात्रा के पीछे एक कथा प्रचलित है। आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे का राज़।

 

 

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द्वारिका में श्री कृष्ण रुक्मणी आदि राज महिषियों के साथ शयन करते हुए एक रात निंद में अचानक राधे-राधे बोल पड़े और इसी समय वहां मौजूद महारानियां आश्चर्य में पड़ गईं। रुक्मणी ने अन्य रानियों से बात की और बोलीं के आखिर हमारी इतनी भक्ति सेवा के बाद भी श्री कृष्ण के मुख से हमारे नाम के बजाय राधा का नाम निकला और गोपकुमारी राधा को श्री कृष्ण क्यों नहीं भुला पाए। हालांकि पर श्रीकृष्ण ने अपना मनोभाव प्रकट नहीं होने दिया। राधा की श्रीकृष्ण के साथ रहस्यात्मक रास लीलाओं के बारे में माता रोहिणी भली प्रकार जानती थीं। इसलिए सभी जानकारियों को प्राप्त करने के लिए सभी महारानियों ने अनुनय-विनय की। पहले तो माता रोहिणी ने टालना चाहा लेकिन महारानियों की ज़िद के कारण वे बताने को मान गईं और बताने लगी, सुनो, सुभद्रा को पहले पहरे पर बिठा दो, कोई अंदर न आने पाए, भले ही बलराम या श्रीकृष्ण ही क्यों न हों।

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माता रोहिणी के कथा शुरू करते ही श्री कृष्ण और बलरम अचानक अन्त:पुर की ओर आते दिखाई दिए। सुभद्रा ने उचित कारण बता कर द्वार पर ही रोक लिया। अन्त:पुर से श्रीकृष्ण और राधा की रासलीला की वार्ता श्रीकृष्ण और बलराम दोनों को ही सुनाई दी। उसको सुनने से श्रीकृष्ण और बलराम के अंग अंग में अद्भुत प्रेम रस का उद्भव होने लगा। साथ ही सुभद्रा भी भाव विह्वल होने लगीं। तीनों की ही ऐसी अवस्था हो गई कि पूरे ध्यान से देखने पर भी किसी के भी हाथ-पैर आदि स्पष्ट नहीं दिखते थे। सुदर्शन चक्र विगलित हो गया। उसने लंबा-सा आकार ग्रहण कर लिया। यह माता राधिका के महाभाव का गौरवपूर्ण दृश्य था।

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इसी सब के दौरान वहां अचानक नारद जी का आगमन हुआ और वे तीनों ही पहले की तरह हो गए। नारद ने ही श्री भगवान से प्रार्थना की कि हे भगवान आप चारों के जिस महाभाव में लीन मूर्तिस्थ रूप के मैंने दर्शन किए हैं, वह सामान्य लोगों के दर्शन के लिए भी पृथ्वी पर हमेशा स्थापित रहे। नारद जी की इस इच्छा पर भगवान श्री कृष्ण ने तथास्तु कह दिया। बस इसी कारण जगन्नाथ पुरी में प्रभु श्री कष्ण के साथ बहन सुभद्रा और भाई बलराम रहते हैं।

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Web Title "Jagannath rath yatra 2018 : jagannath rath yatra myths and rituals"