रामगढ़ के राजपरिवार का आजादी के बाद कई चुनावों में रहा दबदबा, विरोधियों के हर प्रयास को नाकाम कर लहराते रहे विजय पताका

By: Prateek Saini

Updated On:
14 Mar 2019, 04:08:12 PM IST

  • राजा कामाख्या नारायण सिंह ने रामगढ़ अधिवेशन में गांधी के चरणों में राज समर्पण की घोषणा की थी...

     

(रांची,रामगढ़): अंग्रेजों से देशी को आजादी मिलने के वक्त पूरे भारत में कई सौ राजे-रजवाड़े थे। उनमें सबसे छोटा राजा एवं इस्टेट नागपुर खुर्द (छोटानागपुर) था। वर्ष 1368 से 1955 तक इस वंश के 19 राजाओं का 587 वर्ष तक शासन रहा। रामगढ़ राज परिवार के रूप में विख्यात इस राज परिवार के अंतिम शासक राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह हुए। देश को जब आजादी मिली और तो एकीकृत बिहार में पूरे छोटनागपुर इलाके में राजा कामाख्या नारायण सिंह का दबदबा रहा। एक समय ऐसा भी था, कि इस राजपरिवार का जिसे भी आशीर्वाद प्राप्त होता,उसे चुनाव में जीत मिल जाती थी।

 

ब्रिटिश सरकार ने दी थी राजाबहादुर की उपाधि

राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह पहले आम चुनाव 1952 से लेकर लगातार अपने जीवन के अंतिम क्षण 1970 तक विधानसभा के सदस्य रहे। कई चुनाव में कामख्या नारायण सिंह एक साथ कई क्षेत्रों से जीतने वाले एक एकाकी नेता थे। स्वतंत्रता की लड़ाई में कामाख्या नारायण सिंह ने महात्मा गांधी का साथ दिया और रामगढ़ में ऐतिहासिक राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन भी कराया था तथा गांधीजी के चरणों में राज समर्पण की घोषणा की थी। इन्हें ब्रिटिश सरकार ने राजाबहादुर की उपाधि दी थी और 52 नाल बंदूक अपनी सुरक्षा के लिए ये रख सकते थे।

 

1946 में किया नई पार्टी का गठन

कामाख्या नारायण सिंह आजादी मिलने के पहले तक कांग्रेस में रहकर जनजागरण में जुटे थे, लेकिन कहा जाता है कि कांग्रेस के तत्कालीन वरिष्ठ नेता जवाहर लाल नेहरू से जब वे एक बार मिलने गए थे, तो नेहरू ने उन्हें काफी देर इंतजार करवाया, जिससे क्षुब्ध होकर वे नेहरू से बिना मिले ही वापस लौट गए और 1946 में छोटानागपुर संताल परगना जनता पार्टी का गठन किया। बाद में 1960 में उन्होंने अपनी पार्टी का राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी में विलय कर दिया।

 

 

बिहार में 1962 तक उनकी पार्टी के सात सांसद हो गए और 50 विधायक के साथ राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता बने। 1967-68 में बिहार में जब पहली बार गैर कांग्रेसी दलों की सरकार बनी, तो राजा रामगढ़ की पार्टी की अहम भूमिका थी। उनके परिवार के ही भाई कुंवर बंसत नारायण सिंह, माताश्री शशांक मंजरी देवी, धर्मपत्नी ललिता राजलक्ष्मी, पुत्र टिकैट इंद्र जितेंद्र नारायण सिंह कई बार सांसद और विधायक बने। वहीं राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह, कुंवर बसंत नारायण सिंह, ललिता राजलक्ष्मी बिहार सरकार में मंत्री बने। उनके सहयोग से चुनाव जीते कैलाशपति सिंह (हजारीबाग) और गोपीनाथ सिंह (रंका-पलामू) बिहार सरकार में मंत्री बन गए थे। पुराने हजारीबाग जिले यानी चतरा, हजारीबाग, कोडरमा, गिरिडीह, रामगढ़ और बोकारो में जिस किसी को इस राजपरिवार का समर्थन मिला, वह चुनाव जीतने में सफल रहा।

 

कांग्रेस ने बनाई विरोध में लहर फिर भी लहराया रामगढ़ी परचम

आजादी के पहले और बाद में जिस समय पूरे देश में कांग्रेस की तूती बोलती थी, उसके दिग्गज नेता राजा बहादुर कामाख्या नारायण सिंह के विरूद्ध कैंप करते थे, फिर भी ये चुनाव जीत जाते थे। उनका प्रभाव इतना था कि उनकी पार्टी के उम्मीदवार धनबाद सहित आरा और छपरा से भी चुनाव जीतते थे।

 

Updated On:
14 Mar 2019, 04:08:12 PM IST

खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।