क्या आप जानते हैं किस तरह भगवान गणेश ने तोड़ा था कुबेर का घमंड

By: Deepak Sahu

Published On:
Sep, 22 2018 01:29 PM IST

  • यहां पर छोटे-छोटे बच्चों ने अपने हाथों से भगवान की प्रतिमा की स्थापना की है।

रायपुर. देश भर में इन दिनों गणेशोत्सव की धूम मची हुई है। ऐसा माहौल छत्तीसगढ़ में भी देखा जा रहा है। चारों तरफ भक्तिमय माहौल देखने को मिल रहा है। शहर की हर एक गली में गणेश भगवान की प्रतिमा देखने को मिल रही हैं। जहां क्लब पराइसो में गणेशजी का आगमन आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां पर छोटे-छोटे बच्चों ने अपने हाथों से भगवान की प्रतिमा की स्थापना की है। जिसे देखने शनिवार को करीब 100 से अधिक बच्चे पहुंचे। यह पंडाल गणेश और कुबेर की लड़ाई को दर्शाते हुए निर्मित किया गया है।

क्या थी गणेश जी और कुबेर की लड़ाई की वजह
इस दौरान उनके साथ आए शिक्षकों ने गणेश के बाल लीलाओं का वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कुबेर धन के देवता माने जाते है। उन्हें अपने धन और ऐश्वर्य का घमंड था। इसलिए वह इसका प्रदर्शन बार - बार करते रहते थे।

एक बार उन्होंने एक नए महल का निर्माण करवाया था। जिसका प्रदर्शन वह भगवान भोले नाथ के सामने करना चाहते थे। इसलिए वह अपने महल में भोजन का आमंत्रण देने कैलाश पर्वत पहुंचे थे। जहां भगवन शिव ने उनकी मन की बात पहले ही समझ ली।

lord Ganesha

जब कुबेर ने उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा कि मैं नहीं आऊंगा। लेकिन मेरा छोटा पुत्र गणेश जरूर जाएगा। कुबेर उनकी बात मानकर अपने महल लौट गए। दुसरे दिन गणेश जी अपने मूषक पर सवार होकर उनके महल पहुंचे। कुबेर ने उन्हें अपने महल दर्शन के लिए कहा। लेकिन गणेश जी ने मना करते हुए कहा - मैं यहां भोजन करने आया हूं। आप भोजन लगवाएं, मुझे भूख लगी है। जिसके बाद कुबेर ने अपने महल के समस्त सेवकों को भोजन बनाने और परोसने में लगा दिया।

जिसके बाद गणेशजी ने भोजन शुरू किया। लेकिन उनकी भूख खत्म नहीं हुई। वास्तविकता यह थी कि गणेशजी का पेट माता पार्वती के हाथ से एक कौर खाना खाकर ही भरता था। यहां मां के अभाव में उन्हें पेट भरने का आभास ही नहीं हो रहा था। आखिर में कुबेर ने हाथ जोड़कर माफी मांग ली और भोजन परोसने में असमर्थता जता दी। गणेशजी बहुत नाराज हुए और बोले कि तुम तो एक व्यक्ति को भरपेट भोजन तक नहीं करा सकते, फिर तुम्हारे इस धन-ऐश्वर्य और स्वर्ण की लंका का क्या मोल? पहले भोजन की व्यवस्था तो कर लेते, फिर निमंत्रण देते। गणेशजी के वचन सुनकर कुबेर शर्म से पानी-पानी हो गए। उधर कैलाश पर्वत पर ध्यानस्थ शिवजी ने इस पूरे प्रकरण का भरपूर आनंद लिया।

Published On:
Sep, 22 2018 01:29 PM IST

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