कैलाश मानसरोवर से जुड़ी ये खबर आपको कर देगी सन्न, अब ऐसे कर पाएंगे आवेदन

By: Tanvi Sharma

Published On:
Sep, 01 2018 07:00 AM IST

  • कैलाश मानसरोवर से जुड़ी ये खबर आपको कर देगी सन्न, अब ऐसे कर पाएंगे आवेदन

12 जून से शुरु हुई कैलाश मानसरोवर यात्रा का अंतिम जत्था रवान हो चुका है और यात्रा 8 सितंबर को समाप्त होने जा रही है। इस बार दुर्गम मानसरोवर यात्रा में कुल 18 दलों ने भाग लिया था। जो की अलग-अलग चरणों में तीर्थ यात्रा के लिए रवाना हुए थे। कैलाश मानसरोवर की इस दुर्गम यात्रा में हर साल सैकड़ों श्रृद्धुलु भाग लेते हैं और तीर्थ यात्रा पर जाते हैं। यात्रा में शामिल यात्रियों के दल का भव्य रुप से स्वागत किया जाता है और उनका पारंपरिक रूप से ढोल नगाड़ों के साथ तिलक व माल्यार्पण किया जाता है। कुमाऊं मंडल विकास निगम के अधिकारी द्वारा बताया गया है की हर साल यात्रा जून से सितंबर माह तक चलती है। इस बार यात्रा आठ सितंबर को समाप्त होने वाली है। इस बार मानसरोवर यात्रा नाथू ला दर्रे मार्ग से की कई है।

kailash mansarovar

कैलाश मानसरोवर दुनिया का सबसे ऊंचा शिवधाम कहलाता है। पुराणों के अनुसार, कैलाश को शिवजी का घर माना गया है, यहां बर्फ ही बर्फ में भोले नाथ शंभू तप में लीन शालीनता से, शांत, निष्चल, अघोर धारण किए हुऐ एकंत तप में लीन है। धर्म व शास्त्रों में उनका वर्णन प्रमाण है। इस स्थान को 12 ज्येतिर्लिंगों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हर साल कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने के लिए हज़ारों साधु-संत, श्रद्धालु, दार्शनिक यहां भोलेनाथ के दर्शन के लिए एकत्रित होते हैं। यह जगह काफी रहस्यमयी बताई गई है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है। प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है।

कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियों का उद्गम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधू, सतलज व करनाली। कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमें से नदियों का उद्गम होता है, पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है। तिब्बतियों की मान्यता है कि वहाँ के एक सत कवि ने वर्षों गुफा में रहकर तपस्या की थीं, जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभ देव का यह निर्वाण स्थल अष्टपद है। कहते हैं ऋषभ देव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी। हिन्दू धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि कैलाश पर्वत मेरू पर्वत है जो ब्राह्मंड की धूरी है। उपर स्वर्ग है जिस पर कैलाशपति सदाशिव विराजे हैं नीचे मृत्यलोक है, इसकी बाहरी परिधि 52 किमी है। मानसरोवर पहाड़ों से घीरी झील है जो पुराणों में 'क्षीर सागर' के नाम से वर्णित है। क्षीर सागरकैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्‌या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे है।

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ऐसे होता है यात्रा के लिए चयन

कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए जाने वाले श्रद्धालुओं का चयन विदेश मंत्रालय करता है। मंत्रालय निष्पक्ष तरीके से कंप्यूटर आधारित प्रणाली के अनुसार ड्रॉ से यात्रियों का चयन करता है। चयन के बाद ही यात्रियों को उनका मार्ग और बैच नंबर दिया जाता है। आप अगर अपने किसी परिचित के साथ यात्रा करना चाहते हैं तो दोनों को एक ही बैच में रखने का विकल्प चुन सकते हैं। हालांकि यह विदेश मंत्रालय तय करेगा कि दोनों यात्रियों का बैच एक रखा जाए या नहीं। कंप्यूटरीकृत ड्रा में आपका नाम आने पर आपको ई-मेल आईडी या मोबाइल नंबर पर सूचना दी जाती है। वैसे मंत्रालय इसके लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी करता है, जिस पर फोन कर आप ड्रॉ में अपने नाम होने या न होने की जानकारी ले सकते हैं।

साल 2019 में होगा रजिस्ट्रेशन

कैलाश मानसरोवर यात्रा करना किसी सपने से कम नहीं है। बल्कि कई लोग तो बार-बार कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने के लिए आवेदन देते हैं, लेकिन कई वजहों के चलते वो कैलाश मानसरोवर नहीं जा पाते। अगर आप भी इस बार यात्रा पर नहीं जा पाए तो अगले साल आप जा सकते हैं। कैलाश मानसरोवर के लिए पहले से रजिस्ट्रेशन शुरू हो जाते हैं और विदेश मंत्रालय द्वारा पहले से ही जानकारी बता दी जाती है। आप विदेश मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 2019 में कैलाश मानसरोवर यात्रा का जून से पहले पंजीकरण करवा लें।

Published On:
Sep, 01 2018 07:00 AM IST