VIDEO : मिट्टी में मिलने से अच्छा है ‘देहदान’, जानिए इस अनुकरणीय कार्य की हकीकत

By: Suresh Hemnani

Updated On:
11 Sep 2019, 12:27:53 PM IST

  • - मेडिकल कॉलेज पाली में पहला देहदान

    Body donation in medical college :
    - इससे पहले तीन शहरवासियों ने अन्य शहरों में की थी देह दान

पाली। Body donation in medical college : ‘उनकी ये ही इच्छा थी कि प्राण त्यागने के बाद उनकी पार्थिव देह किसी के काम आएं। इसका सम्मान रखते हुए उनकी देह मेडिकल कॉलेज में दान में दी, ताकि ये देह भविष्य के चिकित्सकों के प्रेक्टिस [ Doctor practice ] में काम आ सके।’ यह बात गुंदोचिया बास निवासी पुष्पादेवी कांकरिया ने पत्रिका से बातचीत में बताई। उनका कहना है कि अपनी इच्छा से भी उन्होंने बच्चों को अवगत करवा दिया है। देवलोकगमन होने के बाद उनकी देह भी मेडिकल कॉलेज में दान की जाएं।

दरअसल, पाली की धरा पर नेत्रदान [ Eye donation ] के तो कई मामले सामने आते रहते है, लेकिन मेडिकल कॉलेज विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए देहदान करने का पाली मेडिकल कॉलेज में यह पहला मामला है। हालांकि, इससे पहले तीन शहवासियों ने अन्य शहरों में देहदान किया है।

शहर के गुंदोचिया बास निवासी उद्यमी शांतिलाल (73) पुत्र अचलदास कांकरिया की इच्छाओं का सम्मान करते हुए उनकी पार्थिव देह परिजनों ने मेडिकल कॉलेज पाली में दान कर समाजसेवा का उत्कृष्ट संदेश समाज में दिया है। मृतक के पुत्र विशाल कांकरिया का कहना है कि सोमवार रात सवा दस बजे हृदयगति रुकने से उनके पिता शांतिलाल का निधन हो गया। माता पुष्पादेवी की आज्ञा से पिता शांतिलाल के नेत्र दान में देने के साथ ही पार्थिव देह भी पाली मेडिकल कॉलेज में दी।

काम-काज छोड़ धर्म-ध्यान में लगाया मन
विशाल कांकरिया ने बताया कि उनके पिता उद्यमी थे। करीब 15 वर्ष पूर्व शांतिलाल ने फैक्ट्री जाना बंद कर दिया। उसके बाद वे ही पूरा कामकाज देखने लगे। पिता शांतिलाल व माता पुष्पादेवी अपना समय धर्म ध्यान में बिताने लगे थे।

2008 में शुरू हुई थी देहदान की शुरुआत
पाली शहर में मरणोपरांत देहदान करने की शुरुआत वर्ष 2008 में हुई थी। तब समाजसेवी डॉ. कीर्ति भाई बख्शी ने सबसे पहले देहदान करने की घोषणा की थी। उनके निधन के बाद परिजनों ने उनकी देह जोधपुर मेडिकल कॉलेज को सौंपी थी। उनकी प्रेरणा से कई लोगों ने अपने संकल्प पत्र भरकर मेडिकल कॉलेज में जमा करवाए थे। इसके बाद 20 सितम्बर 2013 को हाउसिंग बोर्ड निवासी चम्पालाल पुनमिया का भी देहदान हुआ था।

एक शपथ पत्र और हो गया देहदान
देहदान करने के लिए अब पाली से बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। पाली मेडिकल कॉलेज में ही देहदान किया जा सकता है। इसके लिए इच्छुक परिजनों को एक शपथ पत्र देना होता है तथा मेडिकल कॉलेज में एक फॉर्म भरना होता है। उसके बाद देहदान करने पर मेडिकल कॉलेज की ओर से देहदान करने वाले परिजनों को बॉडी प्राप्त करने करने के पत्र के साथ सम्मान पत्र दिया जाता है। इसके लिए मेडिकल कॉलेज प्रिंसिपल के.सी. अग्रवाल व मेडिकल कॉलेज के एनाटोमी विभागाध्यक्ष डॉ. निखा भारद्वाज से संपर्क किया जा सकता है।

भामाशाह के साथ देहदानियों की भूमि बन रहा पाली
पाली जिला दानदाताओं व भामाशाहों के नाम से जाना जाता है। वहीं अब ये देहदानियों की भूमि भी बनता जा रहा है। मेडिकल कॉलेज खुलने के बाद हालांकि पाली में ये पहला देहदान है, लेकिन इससे पहले यहां के तीन लोगों ने देहदान किया है। मेडिकल कॉलेज भी इस देहदान को लेकर पूरी तरह तैयार है।

अब तक 25 हो चुके संकल्प
पाली जिले के लोग देहदान करने में भी पीछे नहीं हैं। देहदान करने के लिए संकल्प पत्र भरने व घोषणा करने वालों की कतार लगी है। मेडिकल कॉलेज खुलने के बाद दो साल में करीब 25 लोगों ने देहदान करने का संकल्प जताया है। मेडिकल कॉलेज को अपना संकल्प पत्र भी भिजवाया है।

यों रखा जाता है सुरक्षित
देहदान करने वाले के शरीर को सुरक्षित रखने के लिए मेडिकल कॉलेज में पूरी व्यवस्था है। पार्थिव शरीर में विभिन्न केमिकल मिलाकर एक सॉल्युशन बनाया जाता है। मेडिकल कॉलेज की शरीर रचना विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. निखा भारद्वाज ने बताया कि उस सॉल्युशन को नसों के माध्यम से नसों से शरीर में भर दिया जाता है। उसी सॉल्युशन से भर टैंक में शरीर को रखा जाता है। इसको दस साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। मेडिकल विद्यार्थियों को अध्ययन करवाने के लिए इसको निकाला जाता है। थोड़े समय के लिए निकालने पर इसको खुले में ही रखते हैं। अधिक समय के लिए निकलने पर इसे डीफ्रिज (मोर्चरी कूलर) में रखा जाता है।

ब्रेन डेड और कोमा में अंतर?
जब शरीर के बाकी अंग काम कर रहे हों, लेकिन ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया हो और फिर से उसके काम करने की संभावना नहीं हो तो उसे ब्रेन डेड माना जाता है। हालांकि, कोमा से इंसान सामान्य स्थिति में वापस आ सकता है, लेकिन ब्रेन डेड होने के बाद ऐसा नहीं होता।

क्या है अंगदान
किसी दूसरे को अंग देना ही ऑर्गन डोनेशन यानी अंगदान है। आंखों को छोडकऱ शेष अन्य अंगों के मामले में यह तभी मुमकिन है, जब उस शख्स के दिल की धडकऩें चलती रहें, भले ही उसके ब्रेन ने काम करना बंद कर दिया हो।

इन अंगों का होता है ज्यादा दान
अंगदान की बात करें तो किडनी, आंखें, लंग्स, हार्ट, लीवर का ट्रांसप्लांट ज्यादा होता है, जबकि पैनक्रियाज, छोटी आंत और त्वचा का दान कम ही होता है।

कौन नहीं कर सकता
हैपेटाइटिस बी और सी, एचआइवी पॉजीटिव, सिफलिस और रैबीज जैसी बीमारियों से पीडि़त लोग ऑर्गन डोनेट नहीं कर सकते।

अंगदान से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
-देहदान शख्स की मौत के बाद ही होता है। ब्रेन डेड को भी मौत के बराबर माना जाता है।
-जिंदा रहते हुए इंसान दो में से एक किडनी का दान कर सकता है।
- लीवर में से एक छोटा-सा हिस्सा भी दान किया जा सकता है।
-मरणोपरांत सबसे ज्यादा आंखों का दान होता है।
- एक दिन के बच्चे से लेकर 90 साल के बुजुर्ग भी अंगदान कर सकते हैं।
- 18 साल से 65 साल तक की उम्र में अंगदान करना सबसे बेहतर माना जाता है।
-अंगदान करने से पहले कई चीजों की मैचिंग कराई जाती है। मसलन, किडनी के मामले में एचएलए, लीवर और हार्ट के मामले में ब्लड गु्रप की मैचिंग कराई जाती है।
-किडनी या लीवर का दान अमूमन करीबी रिश्तेदारों से होता है, जिनमें पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन, बेटा-बेटी शामिल होते हैं। इनसे किडनी लेने में परेशानी है तो दादा-दादी, नाना-नानी, मामा, मौसी, चाचा, ताऊ, पोता-पोती, चचेरे-ममेरे भाई-बहन किडनी दान कर सकते हैं।

Updated On:
11 Sep 2019, 12:27:53 PM IST

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