स्मृति शेष : मिलाप कोठारी

By: Sunil Sharma

Updated On:
20 Jun 2019, 08:40:39 AM IST

  • पाठक सदैव सर्वोपरि

(गतांक से आगे)

मिलाप ने डीडवाना के नमक के ठेकेदारों की समस्याओं को उठाया। सरकार उनके साथ न्याय नहीं कर रही थी। वह उनका मामला हाईकोर्ट तक ले गया। जोधपुर का दिवाली संस्करण इतनी मेहनत कर निकाला कि उसमें न केवल क्षेत्र बल्कि राजस्थान की रेल सेवा तथा कई ऐसे ऐतिहासिक विषय थे, जो उससे पहले प्रकाश में नहीं आए, प्रकाशित किए। जोधपुर का दिवाली संस्करण जयपुर से इक्कीस था। जोधपुर संस्करण अत्यधिक लोकप्रिय होने लगा। वहां की प्रिंटिंग को भारत सरकार का राष्ट्रपति अवॉर्ड मिला।

पत्रकारिता में मिलाप, कुलिशजी से भी अधिक खुलेपन में विश्वास रखता था। जगन्नाथ पहाडिय़ा मुख्यमंत्री थे, पहली बार जोधपुर की यात्रा पर आ रहे थे। उसने उनके आगमन से पूर्व प्रथम पृष्ठ के पहले दो कॉलम में अपने नाम से क्षेत्र के मामले और समस्याओं पर लेख प्रकाशित किया। कुलिशजी ने उन दो कॉलम में लिखे जाने पर आपत्ति की। वहां केवल संपादक ही लिख सकता है। मेरे बाद पत्रिका का संपादक नियुक्त होने पर पत्रिका में कई ऐसे सुधार किए, जिनका संबंध बाजारवाद से था। उसने जयसिंहजी कोठारी जो स्वयं शेयर का व्यापार करते थे और पत्रिका में शेयर मार्केट पर कॉलम लिखते थे। वह उसने बंद कर दिया। उसका मानना था कि जो कॉलमिस्ट स्वयं व्यापार करे वही उस पर टिप्पणी करे, यह अनुचित है। उसने शेयर भाव छापने बंद कर दिए। उसका तर्क था कि जो शेयर का व्यापार करते हैं उसके पास जानकारी प्राप्त करने के अन्य स्त्रोत हैं। ऐसे ही टेलीविजन का प्रोग्राम बंद कर दिया। इन पर पत्रिका के स्टाफ में भी आपत्तियां हुईं। उन विषयों पर मीटिंग में उसकी आलोचना की गई कि इसके पाठक हैं इसलिए छापना चाहिए। बैठक में कुलिशजी और मैं भी था। पाठकों की दृष्टि से हमारी सहमति थी। जयसिंहजी के कॉलम लिखने पर मैं मिलाप से सहमत था। मैं रिटायर हो गया था लेकिन मुझे भी आमंत्रित किया।

जब वह जोधपुर में था तब आर्मी के संबंध में वह कई समाचार छापना चाहता था। मैंने कहा कि परम्परागत रूप से फौज की कोई खबरें नहीं छापते हैं। फौज का ब्रीफिंग छप सकता है। वह इस विचार से सहमत नहीं था। इस प्रकार पत्रकारिता में कई परम्परागत विचारों से वह असहमत था। उसका विचार था कि जो समाचार पाठक को जानने का हक है, उसे रोका नहीं जाना चाहिए। पत्रिका का व्यापारिक दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। वह समय से बहुत आगे की सोचता था। वह पुरातनवादी परम्पराओं को तोडऩा चाहता था।

ऐसे ही राष्ट्रीय प्रश्नों और जवाहरलाल नेहरू की कई नीतियों के वह विरुद्ध था। जैसे तिब्बत चीन को सौंपना, कश्मीर के मामले को यूएनओ में ले जाना, युद्ध को बीच में रोकना आदि महत्त्वपूर्ण विषय थे। कुलिशजी भी उसके विचारों के ही थे। उन्होंने समय-समय पर उन प्रश्नों की आलोचना भी की थी। रिपोर्टरों के समाचारों पर नाम देने के पक्ष में भी वह नहीं था। वह उनके कामों की प्रशंसा कर प्रोत्साहित भी नहीं करता था। ऐसे विषयों पर उसने विचार भी प्रगट नहीं किए। इसके कारण भी ज्ञात नहीं हैं। लेकिन वह अच्छा एवं सुलझा हुआ संपादक था। उसके विचारों से अधिकांश पत्रकार सहमत थे। वह कांग्रेस शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार का घोर आलोचक था। बोफोर्स कांड पर उसने अपने कॉलम ‘मंथन’ में खूब लिखा। उसका मंथन अतिलोकप्रिय था। उस पीढ़ी के पाठक आज भी मिलाप तथा उसके मंथन को याद करते हैं। उनकी कलम तीखी और राष्ट्रीय हित में थी।

स्वास्थ्य के कारणों से संपादक के पद से हटने के बाद जब स्वस्थ हुआ तो पुन: लिखने लगा। उसके लेखों की बहुत प्रशंसा होती थी। बाद में उसने लिखना हमेशा के लिए बंद कर दिया और स्वाध्याय में लग गया। दो पुस्तकें लिखीं। अनेक कविताएं लिखीं। कविताओं की डायरी पता नहीं कहां गई। उसे भी याद नहीं है। सुमन्द के उपनाम से लिखता था।

मिलाप पत्रकारिता में ऐसे रम गया था कि अधिकांश को यह पता ही नहीं था कि वह इंजीनियर है। बाबरी मस्जिद गिराने के बाद उसने पत्रिका में कई लेख लिखे थे। उसका पहला लेख मस्जिद ढहाने के बाईस दिन बाद, 28 दिसम्बर 1992 को छपा था। उसका शीर्षक था ‘समूचे राष्ट्र में जड़ता व्याप्त’। उसके प्रथम पैरे का मैं उल्लेख करता हूं, जिससे यह समझ आएगा कि वह किस प्रकार सोचता था। उसने लिखा, ‘6 दिसम्बर को अयोध्या में हुई कार सेवा’ ने समूचे भारत की जड़ता भंग कर डाली है। जड़ता इसलिए कि ब्रिटिश भारत व स्वाधीन भारत की अब तक की सभी सरकारों ने जितने एवं जिस प्रकार के अनाचार-अत्याचार किए, यहां सभी राजनीतिक दलों ने इस राष्ट्र को जिस प्रकार से ठगा और लूटा, यहां के बुद्धिजीवियों ने जितना दिग्भ्रमित किया, उस सबके परिणामस्वरूप उत्पन्न हुई हृदय विदारक परिस्थितियों में भी राष्ट्रीय से लेकर व्यक्तिगत स्तर तक हम जिस निरपेक्ष और निर्लिप्त भाव से जी रहे हैं वह जड़ता नहीं तो और क्या है? लेख में जड़़ता पर विशद वर्णन किया है। उसके अंतिम पैरे का अंतिम वाक्य, ‘अयोध्या ने इसी जड़ता को भंग किया है।’

उन अड़तीस लेखों की पुस्तक अब भारत को उठना होगा का प्रथम संस्करण जुलाई, 1993 में प्रकाशित हुआ। दूसरा जुलाई 1994 में और तीसरा फरवरी 2000 में। पुस्तक की जबर्दस्त मांग रही थी। इन लेखों का परिशोधन कर अंतिम ‘पुनश्च’ के नाम से छह वर्ष बाद जुलाई 1994 में प्रकाशित हुई थी। उसमें उसने लिखा कि पिछले छह वर्षों में बहुत कुछ बदल चुका है। केन्द्र में कांग्रेस की सरकार का पहले संयुक्त मोर्चे की दो सरकारों ने और फिर विशुद्ध गैरकांग्रेसी और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने स्थान ले लिया है। ...भारत की ओर देखने की न किसी को फुर्सत है और न इच्छा।...‘हालत बिगड़ी ही है सुधरी नहीं।’

पुस्तक में प्रकाशित लेख ही उसके विचारों को प्रगट कर देते हैं। धर्मगुरुओं के लिए लिखा कि वे भी दिग्भ्रमित हैं। रामराज्य कैसे हो? न जात-पांत न छुआछूत, शोषण से मुक्ति दिलाना है तो जाति की सीमा से लांघ कर ही सोचना होगा। देश की सभी व्यवस्थाओं में आमूल-चूल परिवर्तन जरूरी, भारत में इस्लाम सुरक्षित, हिन्दू-मुस्लिम द्वेष नेहरू के कारण, नेहरू ने जन-जन को बांटा। पहले शिक्षा प्रयोजन तय हो, अंग्रेजी के बजाय संस्कृत क्यों नहीं, शिक्षा समाज के सुपुर्द हो। रोग-शोक की जननी आधुनिक वास्तुकला। जल के दुरुपयोग को रोकना जरूरी, जल का दुरुपयोग रोग का कारण भी, विवेकपूर्ण जल नीति बने। आयुर्वेद अपनाना होगा, आयुर्वेद लाचार क्यों है। शासन और वैयक्तिक सम्बंधों, समाज की प्रतिष्ठा, संगठित वर्ग दुराग्रही हो गया। उपरोक्त सभी विषयों पर लेख है। विज्ञान, प्रकृति और आईंस्टीन का समीकरण अंतिम नहीं है विषयों पर उसने कलम चलाई है, राजनीति पर कई लेख लिखे हैं। उसने कहा, राजनीति में प्रतिस्पर्द्धा हो किन्तु शत्रुता नहीं, छाया मंत्रिमंडल बनना चाहिए। राजनीति धर्म आधारित हो। लेख में धर्म की विशद व्याख्या की है। मैं संक्षेप में लिख रहा हूं। उसका मत है कि ‘मनुष्य को मर्यादित आचरण का मार्ग बताने वाला धर्म ही है। राजनीति के बारे में लिखा, समग्र रूप में राजनीति और छल-छद्म, हिंसा व अनाचार अब पर्याय बन चुके हैं। ऐसे वातावरण में राजनीति से धर्म के सम्बंध विच्छेद किए जाने के प्रयास क्यों नहीं होना चाहिए?’ अधिकारों के शोर में कर्तव्य की उपेक्षा, व्यवस्था को मर्यादित करना जरूरी है। मर्यादा युक्त विधान बने। स्वावलम्बन टाला नहीं जा सकता। पत्रकार अपराध की शिक्षा न दें। समाचार में यह बताया जाता है कि अपराध कैसे किया गया। मिलाप का सोचना है कि इससे अन्य अपराध करना सीखते हैं। इस पर भी उसने विशद टिप्पणी की है। व्याख्या जाने बिना उसे नहीं समझा जा सकता।

पुस्तक के कवर के अंतिम पृष्ठ पर लिखा है कि भारत क्या था और इंडिया क्या है, इसे समझने के लिए बुनियाद की ओर झांकना आवश्यक है। लेखक का पाठकों से अनुरोध है कि उसके विचारों से सहमत या असहमत हो यह जरूरी नहीं है। आवश्यकता है कि विचारों का आडोलन-उद्वेलन हो क्योंकि आज तो हम स्वार्थी भी नहीं रहे, प्रार्थी बनकर रह गये हैं। यह पुस्तक उसके दर्शन और उपरोक्त विषयों पर चिन्तन आधारित है। 

पुस्तक द्वारा अपने विचार प्रगट करने को तीस वर्ष हो रहे हैं। लेकिन कुछ भी नहीं बदला। कांग्रेस की सरकार के बाद पिछले साढ़ चार वर्षों से भाजपानीत सरकार है। कहने को एनडीए की सरकार है, वास्तव में भाजपा की ही है। उसी की नीतियों का क्रियान्वयन किया जा रहा है। पार्टी लेवल पर हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने तथा समाज को कई टुकड़ों में बांट दिया है। पार्टीजनों के व्यवहार के कारण भारत में पाकिस्तान बन गया है। समाज में इतनी घृणा व्याप्त है कि बिना विभाजन के विचारों का बंटवारा हो चुका है। व्यवस्था भारतीय है। संविधान भारत का है। मतदान करने जाते हैं लेकिन मन बंटे हुए हैं। संभवत: पहले विभाजन को देख कर नये की मांग न हो। भारतीय लीग का निर्माण न हो। संविधान है, शासन के तीनों अंग हैं। किन्तु जातिवाद इतना प्रबल है कि हिन्दू समाज अपने आप में विभाजित है और अपने उत्थान का मार्ग जाति संगठन में ही दिखता है। सामाजिक ताना-बाना बुरी तरह से बिखर गया है। देश, समाज की जगह व्यक्ति ने ले ली है और हरेक अपनी तरक्की का मार्ग स्व में ही देखता है। शासन व्यवस्था लचर हो गई है। भ्रष्टाचार शासन में नीचे से लेकर तीनों अंगों में बुरी तरह छाया हुआ है। भारत को भूल चुका है। इंडिया ही नहीं विश्व की नकल और आधुनिकीकरण में लिप्त है। स्वास्थ्य शिक्षा के लिए भारतीय पद्धति स्वीकार ही नहीं है। आयुर्वेद, होम्योपैथी, यूनानी में विश्वास है, किंतु उपचार एलोपैथी से ही कराता है। जातिवादी और व्यक्तिवादी समाज में भारत की सोचना ही नहीं जानता। मिलाप ने अपनी लेखमाला और पुस्तक के बाद पुनश्च में स्वयं ने स्वीकारा है कि हालत बिगड़ी ही है सुधरी नहीं।

मिलाप ने यदि लिखना बंद नहीं किया होता तो वह कारणों पर पुनर्विचार करके पाठकों के सामने प्रस्तुत करता। लेकिन अफसोस है कि वह जब कोई निर्णय करता तो उसे बदलता नहीं। कहता कि पुनर्विचार के लिए सारा देश है। उस पर विचार कर ले। मगर राजनीतिक दृष्टि राष्ट्रवाद से अतिराष्ट्रवाद, धर्म पर और जाति पर आधारित हो गई है।

‘छोटी सी बात’ पुस्तक का प्रकाशन मई, 2005 में हुआ था। यह भी लेखमाला का पुस्तकाकार है। यह लेखमाला राजस्थान पत्रिका में 4 जून 2000 में प्रारंभ हुई और अंतिम 21 अप्रेल, 2002 में प्रकाशित हुई थी। उसके बाद उसने नहीं लिखा। यह लेखमाला व्यक्ति की रोजमर्रा जीवन जीने के सलीके से सम्बन्धित है। इस पुस्तक की स्वानुभूति 23 जुलाई 2002 है। पुस्तक के शीर्ष से हो इसकी सार्थकता प्रगट होती है।

(राजस्थान पत्रिका के पूर्व सम्पादक विजय भंडारी की अप्रकाशित पुस्तक ‘भूलूं कैसे’ में मिलापजी के जीवन और कृतित्व पर लिखे गए अध्याय से)

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