केन्द्र व राज्य के पालों में झूलती कृषि समस्याएं

Sunil Sharma

Publish: Sep, 11 2017 04:24:00 (IST)

Opinion

कृषि ऋणग्रस्तता सहित कृषि राज्य का विषय है। राज्य में कृषि विकास के लिए राज्य सरकारें उपाय करती हैं

- रामपाल जाट, किसान नेता, किसान पंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष

कृषि ऋणग्रस्तता सहित कृषि राज्य का विषय है। राज्य में कृषि विकास के लिए राज्य सरकारें उपाय करती हैं। लगता है कि इस तर्क के आधार पर वित्त मंत्रअरुण जेटली ऋणमुक्ति के विषय पर केंद्र सरकार की ओर से पल्ला झाड़ रहे हैं।

किसानों की आत्महत्या से संबधित 14 संासदों द्वारा पूछे गए अतांराकित प्रश्न संख्या 2061 का 14 मार्च 2017 को सरकार द्वारा लोकसभा में उत्तर दिया कि कृषि राज्य का विषय है और राज्य सरकारें राज्य में कृषि विकास के लिए उचित उपाय करती है। इसी तरह 6 दिसंबर 2016 को भी केंद्र सरकार ने अतारांकित प्रश्न के उत्तर में कहा था, कृषि ऋणग्रस्तता सहित कृषि राज्य का विषय होने के कारण राज्य में कृषि का विकास करने के लिए राज्य सरकारें उपयुक्त उपाय करती हैं तथापि भारत सरकार पर्याप्त नीति उपायों और बजटीय समर्थन के माध्यम से राज्यों के प्रयासों को पूरा करती है।

ऐसा लगता है कि इन तर्कों को आधार बनाकर देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ऋण मुक्ति के विषय पर केन्द्र सरकार की ओर से पल्ला झाड़ रहे है। लेकिन, उल्लेखनीय यह भी है कि 2008-09 में केन्द्र सरकार ने ही 70 हजार करोड़ रुपए से अधिक की ऋण मुक्ति किसानों को दी थी। साथ ही, उत्तर प्रदेश विद्यानसभा के चुनावों में प्रधानमंत्री द्वारा किसानों के लिए ऋण मुक्ति की घोषणा पर जोर दिया गया था। केंद्र सरकार के तर्क को ही मानें तो जब देश का प्रधानमंत्री घोषणा करे तो उसका सीधा अर्थ एक राज्य के नहीं बल्कि सम्पूर्ण देश के किसानों के लिए है।

इस तर्क पर भी गौर फरमाएं कि सरकार की रणनीति कृषि को व्यवहार्य बनाकर किसानों के कल्याण पर ध्यान केन्द्रित करना है और कृषि व्यवहार्यता तभी संभव है जबकि खेती की लागत कम हो, कृषि उपजों की उत्पादकता बढ़े तथा किसानों को उनके उत्पाद के लिए लाभदायक मूल्य मिले। इस उदे्श्य के लिए सरकार ने स्वास्थ्य कार्ड योजना, नीम कोटेड यूरिया, परम्परागत कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री सिचाई योजना, राष्ट्रीय कृषि मंडी स्कीम, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना आदि संचालित की हैं। लेकिन, जब कृषि केन्द्र या समवर्ती सूची का विषय ही नहीं तो क्यों वह कृषि क्षेत्र के लिए योजनाएं एवं कार्यक्रम बना रहा है ? क्यों केंद्र के स्तर पर कृषि मंत्रालय बनाया हुआ है? भारत, राज्यों का संघ है।

इस बात को केन्द्रीय शासन सहज रूप से क्यों नही स्वीकार करता तथा क्यों नही राज्यों पर विश्वास करता? राज्य की खाद्य आवश्यकताओं का आकलन राज्य ही बेहतर कर सकता है लेकिन आयात-निर्यात कार्य केंद्र के जिम्मे है इसलिए पिछले दिनों केंद्र सरकार ने 1.36 लाख टन दालों आयात अनुबंध किया और 36 हजार टन आयात होने पर पांच राज्यों ने ही इसे खरीदा। राज्य की कृषि उत्पाद आवश्यकता का विषय भी राज्य का है तो राज्यों के लिए दाल खरीद को केंद्र क्यों आगे आया? क्या यह संवैधानिक विसंगति नहीं है?

Web Title "Indian farmers problem and govt"

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