इंसान बनाओ !

By: Shri Gulab Kothari

Published On:
Jun, 09 2019 09:08 AM IST

  • हमें जो बात कचोटती है, वह यह कि वे शेष देश के बच्चों को भी ‘भारतीय’ नहीं बनने देना चाहते।

गुलाब कोठारी

शिक्षा रूपी भूत-पूर्व-गुलामी का प्रेत पूरे देश पर मंडरा रहा है।क अंग्रेजीदां समूह है इस देश में जिसका आज भी देश के साथ कोई जुड़ाव नहीं है। न खान-पान अथवा रीति-रिवाज से और न ही आम आदमी से। वे अपने बच्चों को भी बाहर ही रखने का प्रयास करते हैं। हमें कोई सरोकार नहीं कि वे कहां जीते हैं। हमें जो बात कचोटती है, वह यह कि वे शेष देश के बच्चों को भी ‘भारतीय’ नहीं बनने देना चाहते। हमारे लिए तो मैकाले जिन्दा भी है और रक्तबीज की तरह फैलता ही जा रहा है।

शिक्षा नीति बनाने वालों को पहले यह तय करना चाहिए कि हर बच्चा भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि बने। यह भी लिखित में तय होना चाहिए कि क्या नहीं पढ़ाया जाएगा। हर बच्चे का सर्वांगीण विकास-शरीर, बुद्धि, मन और आत्मा-अनिवार्य होगा। दसवीं कक्षा तक देश का भूगोल, इतिहास, साहित्य, भाषा, संविधान, कृषि, पशुधन तथा राज्यों की अपनी विशेषताओं का ज्ञान कराया जाए। बिना किसी राजनीति के। छोटे बच्चों के लिए कहानियों की कक्षाएं अनिवार्य हों। पुराण कथाएं, लोक कथाएं, जातक कथाएं आदि देश-विदेश की कहानियों का समावेश किया जाना चाहिए। शिक्षा पहले अच्छे मानव तैयार करे। अंग्रेजी को उच्च शिक्षा के साथ जोड़ा जाए, किन्तु केवल भाषा की तरह। अंग्रेजी संस्कृति के साहित्य से शिक्षा को मुक्त रखा जाना चाहिए।

हमारा जीवन प्रकृति पर आधारित है। सूर्य हमारा पिता है। पांचवें पड़ाव पर हम माता-पिता से स्थूल शरीर धारण करते हैं। बुद्धि सूर्य से, मन चन्द्रमा से, शरीर पंच महाभूतों से उत्पन्न होते हैं। अन्न से शरीर की सातों धातुएं बनती हैं। मन बनता है। मन जीवन का मुख्य केन्द्र है। सारी इच्छाएं, सुख-दु:ख, अच्छा-बुरा, जीवन के सपने, रिश्ते-नाते, प्यार-घृणा, दया-करुणा आदि मन के ही विषय हैं। शिक्षा इन सबसे वंचित कर रही है। मन की, मानवता की चर्चा ही नहीं है। पेट भरने के अलावा भी जिन्दगी जीनी होती है, जिसके उतार-चढ़ाव की, बदलते सामाजिक परिवेश की, राष्ट्रवाद की सीख अनिवार्य होनी चाहिए। विदेशी संस्कृति को शिक्षा में निषेध कर देना उचित होगा। नीति निर्माण कार्य अधिकारियों के हाथ में रहेगा तो बदलाव संभव ही नहीं है। शिक्षाविदें को ही नीति निर्माताओं के पदभार सौंपे जाएं। आज तो जो अधिकारी शिक्षा विभाग में आता है, वही शिक्षाविद् बन जाता है। वही आधुनिक मैकाले का रूप ले लेता है।

शिक्षा का निश्चित उद्देश्य एवं स्तर भी तय किया जाना चाहिए। किस स्तर के बालक में कितनी योग्यता होनी चाहिए। आज स्नातक भी अच्छा पत्र नहीं लिख सके, तो क्या यह सम्पूर्ण देश का अपमान नहीं है? एक चपरासी की नौकरी के लिए एमबीए, इंजीनियर लाइन में लगें और किसी को भी शर्म नहीं आए! वाह, शिक्षा अधिकारियों को डूबकर मर जाना चाहिए। नकली शिक्षा के सहारे 90-95 प्रतिशत नम्बर प्राप्त करने की होड़ और फिर भी निकम्मेपन का रेकॉर्ड छात्र का तो जीवन उजाड़ देता है। आज कॉलेज, स्कूलें, अधिकारी मिलकर किस प्रकार का ‘शिक्षा उद्योग’ चला रहे हैं, कौन नहीं जानता। नेता अंधे थोड़े ही हैं। कई छप्पर में स्कूलें, कहीं अध्यापक नहीं, कहीं राजनीति और तबादले हावी हैं, तो अध्यापक पढ़ाई के अलावा दर्जनों तरह के दूसरे कार्यों में व्यस्त रहते हैं।

सत्तर वर्षों के शिक्षा के हृास का परिणाम है कि हर वर्ग अपने कर्म से च्युत हो गया। ब्राह्मण समाज को संस्कारवान बनाने को तैयार नहीं हैै। क्षत्रिय समाज रक्षा का भार उठाने को तैयार नहीं है। चारों ओर माफिया-मादक द्रव्य, शराब, हथियार, भू-बजरी, मिलावट आदि फैल रहे हैं। किसी को ‘विनाशाय च दुष्कृताम्’ याद ही नहीं है। वैश्य रूप कृषक आधुनिक चकाचौंध और फसल बढ़ाने की होड़ में जहर परोसकर प्रसन्न होना चाहता है। किसी स्नातक को शरीर का प्राकृतिक, पंच महाभूत का स्वरूप नहीं मालूम। अपने-अपने क्षेत्र का भूगोल नहीं मालूम। सौ वर्षों का इतिहास भी नहीं मालूम। स्त्री-पुरुष का प्राकृतिक सिद्धान्त नहीं मालूम। केवल शरीर रूपी डिब्बे को नर-नारी कह रहे हैं। ‘शक्ति-पौरुष-कर्मयोगी-पुरुषार्थ’ जैसे शब्द विदेशी हो गए।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमें यह तो पता होना ही चाहिए कि हम क्या सिखाना चाहते हैं, क्या नहीं सिखाना चाहते।
यह चिन्तन इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि हमारे परिवर्तन की गति बहुत बढ़ गई है। मानवता पीछे छूटती जा रही है। स्वयं मां-बाप भी बच्चों की शिक्षा में भागीदार नहीं बनते। सच तो यह है कि आज के माता-पिता भी तो इसी शिक्षा पद्धति से निकले हैं। जीवन के बारे में, संघर्षों और द्वन्द्वों के बारे में वे स्वयं भी तो अनभिज्ञ ही हैं। सन्तान तो पैदा हो ही जाती है, उसको संस्कार देना, पेट में अभिमन्यु अथवा कोई संगीतकार बनाना आज किस मां को आता है।

आज शरीर की जानकारी का अभाव ही देर से विवाह करने और आईवीएफ (कृत्रिम संतान उत्पत्ति) के थपेड़े खाने को मजबूर करता है। कोई बेटी मां के पास बैठकर भावी जीवन समझना ही नहीं चाहती। दादा-दादी कहानियां भूल गए।
ऐसी स्थिति में शिक्षा द्वारा समाज तथा देश के निर्माण की कल्पना कैसे की जाए! नेताओं और शिक्षकों की शैली से राष्ट्र पे्रम ही बाहर हो गया। समाज सुधारक लुप्त हो गए। बस, एनजीओ रह गए, जिनकी छवि व्यापारी जैसी अधिक हो गई। आदर्श पुरुष खो गए। शिक्षा नीति में अब छात्र के साथ-साथ अभिभावकों के बारे में भी स्थान होना चाहिए।

सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी बढऩी चाहिए। बिना खेल के मैदानों के स्कूलों को स्वीकृति नहीं मिलनी चाहिए। शिक्षा इस बात की गारंटी तो बने कि व्यक्ति समाज का अंग बनकर जी सके। जो कुछ समाज से प्राप्त करता है, उसको लौटाने के लिए संकल्पवान भी बना रहे। बच्चा माटी का लोंदा है, अध्यापक कुम्हार होता है। वही तय करे कि क्या बनाना है। कोरा विषय पढ़ाना ही ज्ञान की इतिश्री नहीं है। एक समय था जब स्कूल जाने वालों पर लोग हंसते थे। कहावत बन गई थी- ‘पढ़ग्या बेटा फारसी, घरकान् जूता मारसी।’ आज तो हम उधर ही जाते दिखाई पड़ रहे हैं। नई शिक्षा नीति भी पढ़ाई के स्थान पर प्रशासनिक बदलाव की ही बात कर रही है। समाज में उपयोगिता को लेकर नई नीति भी मौन है।

Published On:
Jun, 09 2019 09:08 AM IST

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