Kerala: मुद्दे जुदा-जुदा, लेकिन दर्द साझा है

By: Dilip Chaturvedi

Updated On: 09 Apr 2019, 03:40:50 PM IST

  • केरल: ट्रेन की जनरल बोगी में यात्रियों की कहानी - अपनी जुबानी...

अनंत मिश्रा, अलप्पुझा से

केरल की राजधानी में दो दिन बिताने के बाद रुख किया अलप्पुझा की तरफ। ख्याल आया सफर क्यों न रेल से किया जाए? वो भी सामान्य दर्जे में, ताकि आम लोगों के मुद्दों को भी समझा जा सके! नेता-बुद्धिजीवी अपने तरीके से बात करते हैं लेकिन जनता क्या कहती है? पहुंच गया रेलवे स्टेशन और पकड़ ली नेत्रवती एक्सप्रेस!

सुबह पौने दस बजे ट्रेन ने राजधानी का स्टेशन छोड़ा। डिब्बा पूरा भरा हुआ था। गाड़ी रवाना हुई तो कुछ यात्री अखबार पढऩे में व्यस्त हो गए तो कुछ मोबाइल में। मेरी बात सामने बैठे 75 वर्षीय बुजुर्ग से शुरू हुई। मेरी बातों से वे समझ गए कि केरल से बाहर का हूं। परिचय दिया तो तिरुवनंतपुरम निवासी एम. महादेवन अय्यर कोच्चि ने अखबार समेटकर बताया कि एयरपोर्ट पर सुरक्षा में तैनात अपने पुत्र से मिलने जा रहे थे।

मुद्दों की बात चली तो पिछले साल आई राज्य की भयंकर बाढ़ की चर्चा छेड़ बैठे। बोले, 'नौ महीने हो गए, अब तक हालात सामान्य नहीं हुए हैं। अब तो एमिकस क्यूरी की रिपोर्ट भी आ गई। भयंकर बाढ़ के लिए सरकार की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराया है। सरकार अपने तर्क दे रही है तो विपक्ष राजनीति करने में व्यस्त है।' तभी पड़ोस में बैठीं 50 वर्षीय धनलक्ष्मी भी बोल उठीं, 'चुनाव आते हैं तो जनता की याद सबको आती है। पांच साल न किसी को महिलाओं की सुरक्षा याद आती है और न सुविधाओं की।' पेशे से शिक्षिका धनलक्ष्मी एर्नाकुलम जा रही थीं। कहने लगीं, चुनाव न हों तो न किसी को किसान याद आते हैं और न युवा।' चुनाव की चर्चा छेड़ी तो पड़ोस के कम्पार्टमेंट से भी दो-चार आ गए। कोच्चिवेल्ली निवासी ए. रविन्द्रन तैश में भरे लगे, कहने लगे, 'नोटबंदी ने बर्बाद कर दिया हम जैसे लोगों को।' कंस्ट्रक्शन कंपनी में काम करने वाले रविंद्रन यहीं चुप नहीं रहे। मुझसे ही सवाल पूछ बैठे, 'आप ही बताओ, कितना काला धन बाहर आया। चुनाव के मौसम में करोड़ों रुपए नकद पकड़े जा रहे हैं, लेकिन आम आदमी परेशान है।

इतने में चाय-कॉफी बेचने वाला आ गया। बातों का सिलसिला रुक-सा गया। फिर चुनाव की बात छिड़ी, पूछ लिया, 'कहां से हो?' बोला, 'बिहार का हूं। वोट देने भी नहीं जा पाऊंगा। राजनीति से हमें क्या मतलब। हम तो चाहते हैं ट्रेनें यों ही खचाखच भर कर चलती रहें। हमारी 'जिंदगी की गाड़ी' भी चलती रहेगी।' बात में दम था। देश की मजबूती से पहले हर आदमी अपनी जिंदगी सुरक्षित चाहता है। कायनकुलम स्टेशन पर गाड़ी रुकी तो कुछ सवारियां उतरीं और कुछ नए यात्री आ गए। कायनकुलम स्टेशन से दो स्टेशन आगे जाने के लिए चढ़े ए. नसीर भी शरीक हो गए, मुद्दों की बहस में। उनका लड़का आबूधाबी में निर्माण कंपनी में काम करता है। केंद्र सरकार के कामकाज पर चर्चा छेड़ी तो कहने लगे, 'और कुछ तो पता नहीं, पर हां, पांच साल में पासपोर्ट-वीजा के नियम आसान हुए हैं। लड़का बताता है कि आना-जाना आसान हुआ है।'

सबरीमला मुद्दा, रफाल और राष्ट्रवाद पर किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई। वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लडऩे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिलीं। स्टेशन आने वाला था, बातों-बातों में तीन घंटे कैसे निकल गए, पता ही नहीं चला। तीन घंटे में एक चाय और दो कॉफी पी गया लेकिन पता ही नहीं चला कि पैसे किसने दिए। बताया कि मैं राजस्थान से हूं तो राज्य की राजनीति पर मुझसे भी एकाध सवाल कर लिए गए। सफर ऐसे गुजरा मानो किसी टीवी चैनल पर जनता के 'मन की बात' सुन रहा हूं। गाड़ी धीमी होने लगी थी। दो मिनट में अलप्पुझा आ गया। सबसे विदा ले नीचे उतर गया। केरल की आगे की राजनीति जो समझनी थी।

Updated On:
09 Apr 2019, 03:40:49 PM IST

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