संत मलूक दास के उपदेश आज भी है प्रासंगिक

Sunil Sharma

Publish: Apr, 14 2017 11:08:00 (IST)

Religion and Spirituality

अजगर करे न चाकरी पंछी करै न काम, दास मलूका कह गए सब का दाता राम

मध्य युगीन हिन्दी साहित्य में सन्त परम्परा की अन्तिम कड़ी के रूप में प्रसिद्ध सन्त शिरोमणि मलूक दास के दोहे मानवीय मूल्यों को स्थापित करने तथा सामाजिक सरसता को बनाये रखने में आज भी बहुत प्रासंगिक है। सन्त मलूक दास का जन्म पुरातन में वत्स देश की राजधानी रही वर्तमान कौशाम्बी जिले के ऐतिहासिक स्थान 'कड़ा' में सम्वत् 1631 में वैशाख बदी पंचमी को हुआ था। 108 वर्ष का लम्बा जीवन जीकर इस सन्त ने वैशाख बदी चतुर्दशी सम्वत् 1739 को इस संसार से महा प्रयाण किया।

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भक्ति भावना से अभिभूत अपनी जिन अभिभूतियों को इस सन्त ने पदनात्मक रूप मे गाया। वे दोहे इतने लोकप्रिय साबित हुए कि दूर दूर तक कुछ भी न जानने वाले किसान मजदूरों से भी उन्हे आज भी सुना जाता है। अजगर करे न चाकरी पंछी करै न काम। दास मलूका कह गए सब का दाता राम।। मलूकदास का यह दोहा सम्पूर्ण विश्व मे अपनी सारगर्भिता को लेकर साहित्यकारों के बीच कौतुहल का विषय बना हुआ है। उपरोक्त दोहे को लेकर लोग इस संत को न केवल याद करते हैं, बल्कि उनकी स्मृति को अपने जेहन मे सहेज कर रखे हुए हैं।

मलूकदास के इस दोहे को अनेक हिन्दी विद्वानो ने अकर्मण्यता से पुरित बताया। आचार्य राम चन्द्र शुक्ल ने तो इसे काहिलों का मूलमंत्र बताया है। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी ने इस दोहे को घोर भाग्यवादी रचना के रूप मे स्वीकार करते हैं, लेकिन इस दोहे मे प्रयुक्त होने वाले शब्दों का अभिप्राय केवल अजगर और पंछी से नही है। उसके साथ मलूक भी जुड़े हुए है। अजगर की अकर्मण्यता पंछी की योग्यता मनुष्य की कार्यशीलता का पृथक पृथक अस्तित्व इस जगत मे है, लेकिन परमात्मा की ओर से उनकी कृपा व दानशीलता में कोई पक्षपात नही किया जाता।

इस संत का समूचा जीवन दया और करुणा से ओत प्रोत रहा है। इसलिए आजीवन यह परोपकार एवं दीन दुखियो की सेवा व दु:ख निवारण मे तल्लीन रहे। बाह्रा आडम्बरों पर विश्वास न करके दूसरे के दु:खों और अभावों को गहराई से महसूस करते थे। भूखों को भोजन कराना, सर्दी मे कंपकपाते गरीब साधू सन्तों को वस्त्र और कम्बल बांटना कडा गंगा स्नान करने वाले यात्रियों के मार्ग में पडे कंकड़, पत्थरों को साफ करना उनकी नित्य की ईश्वर सेवा बन गई थी। पत्थर पूजने के बजाए वह दु:खी इन्सानों के दु:ख निवारण को परमात्मा तक पहॅुचने का सुगम मार्ग मानते है। "भूखेहि टूक प्यासहि पानी,यहै भगति हरि के मन मानी। दया धरम हरिदे बसै बोले अमृत, तेई ऊंचे जानिए जिनके नीचे नैन।।"

मलूकदास इस भौतिक संसार को निष्पल बताते हुए कहा कि यहाँ के सभी रिश्ते नाते झूठे हैं। सद गति के लिए राम से नाता जोडना चाहिए। "कह मलूक जब ते लियो राम नाम की ओट, सावत हो सुखनींद भरि डारि भरम की वोट।" मलूकदास संसारिक सुखों में आसक्त ने होने की सलाह देते हुए कहते है कि संसारिक वस्तुओं में क्षणिक सुख है लेकिन परोक्ष में दु:ख बहुत है।

Web Title "Sant Maluk Das story in Hindi "

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