वर्तमान में हो रहा है संस्कृत का हृास, संस्कृत ग्रंथों में है अपार ज्ञान समाहित

By: vikram ahirwar

Published On:
Apr, 29 2017 02:20 PM IST

  • - विरक्ताश्रम रामघाट पर स्वामी वामदेव ब्रहविद्यापीठ का हुआ शिलान्यास

मंदसौर/रतलाम.
अक्षय तृतीया के अवसर पर शुक्रवार को रामघाट स्थित विरक्ताश्रम की भूमि पर श्री केशव संत्सग मंडल न्यास द्वारा प्रस्तावित स्वामी वामदेव ब्रहविद्यापीठ का शिलान्यास समारोह आयोजित हुआ। इसमें निर्मल पंचायती अखाड़ा हरिद्वार के अध्यक्ष मंहत स्वामी ज्ञानदेवसिंह महाराज व वंृदावन के स्वामी विनोदानंद जी महाराज की उपस्थिति में शिलान्यास भूमिपूजन वैदिक विधि-विधान से पंडित उमेश शास्त्री वंृदावन ने सम्पन्न कराया।

इस अवसर पर स्वामी ज्ञानदेवसिंह ने कहा कि वेद के पठन पाठन में कोई समय की प्रतिबद्धता नहीं है परंतु फिर भी वर्तमान में संस्कृत का हृास होता जा रहा है। व्याकरण, शिक्षा, कल्प, निरूक्त, छन्द, ज्योतिष इत्यादि छ: वेदांगों के अध्ययन बिना देववाणी संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर पाना संभव नहीं है और जितने भी शास्त्र है वह सब संस्कृत में ही लिखे गए हैं एवं जब तक हम संस्कृृत का समोचित रूप से ज्ञानार्जन नहीं कर लेते तब तक हम अपनी संस्कृति एवं संस्कारों का ज्ञान भी प्राप्त नही कर सकते। शास्त्र ज्ञान के माध्यम से ही धर्म तथा संस्कृति की रक्षा हो सकती है। महापुरूषों के निर्देशानुसार उनके बताए मार्ग पर चलने में हमारा सबका कल्याण निहीत है। संस्कृत में व्याकरण का होना भी आवश्यक है संस्कृत ग्रंथों में ज्ञान का अथाह सागर समाया हुआ है। परंतु उसे प्राप्त करने का सुअवसर तभी प्राप्त हो सकता है जब हमें संस्कृत का ज्ञान प्राप्त हो। भगवान पशुपतिनाथ की कृपा से यहां पर ब्रम्हविद्या पीठ की स्थापना से लक्ष्य प्राप्त में अवश्य होगा।

टीवी की संस्कृति के स्थान पर बच्चों को दें संस्कृत के संस्कार
पं. उमेश शास्त्री ने कहा कि ब्रम्हविद्या पीठ की स्थापना बालकों को संस्कृति से जोडऩे में सहायक सिद्ध होगी। संस्कृत विहंगम ज्ञान है, कम्प्यूटर की तरह इसके सब अधिकारी है। मन में सीखने की प्रबल जिज्ञासा होनी चाहिए। वर्तमान में संस्कृत के पठन पाठन तथा सज्ञान के लिए प्रत्येक वर्ग आगे बढ़ रहा है। विदेशों में संस्कृत का प्रचार प्रसार हो रहा है। बच्चों में टेलीविजन के संस्कारों के स्थान पर संस्कृत के संस्कारों की आवश्यकता है। प्रहलाद बंधवार ने कहा कि संस्कृति को बचाने के लिए संस्कृत की बहुत आवश्यकता है। संस्कृत को जानने पहचाने के लिये संस्कृत विद्या पीठ का होना भी अनिवार्य है। कार्यक्रम को जगदीशचन्द्र सेठिया ने भी संबोधित किया। स्वागत उद्बोधन सत्यनारायण गर्ग ने दिया। संचालन ब्रजेश जोशी ने किया। आभार कारूलाल सोनी ने माना।  इस अवसर पर मदनलाल गेहलोद, नंदलाल गुप्ता, बंशीलाल टांक, संतोष जोशी, कल्याणमल अग्रवाल, सत्यनारायण सोमानी, हरीकिशन देवडा, राधेश्याम सिखवाल, प्रहलाद काबरा, जयप्रकाश गर्ग सहित कई लोग उपस्थित थे।

Published On:
Apr, 29 2017 02:20 PM IST