यौन अपराध और स्वास्थ्य विज्ञान

By: युवराज सिंह

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Published: 15 Jul 2016, 04:14 PM IST

लाइफस्टाइल

नई दिल्ली। पिछले दिनों राजस्थान सहित पूरे देश में अबोध बच्चियों के साथ हुए यौन अपराध समाज को शर्मसार कर देने वाले हैं। समाज में यौन अपराधों  की क्रूरता दिन-ब-दिन अमानवीय स्तर छूती जा रही है। पुलिस, प्रशासन और न्याय का रोल किसी भी अपराधिक घटना के हो गुजरने के बाद ही शुरू होता है। याने मूलतः यौन अपराध को होने से पहले रोका नहीं जा सकता। कठोरतम न्याय व्यवस्था का भय ही शायद ऐसे अपराधों को थोड़ा कम कर सकता है।

व्यवस्थात्मक परिवर्तन राजनैतिक और सामाजिक दृढ इच्छाशक्ति के बिना संभव नहीं हो सकता है। यह एक दीर्घ कालिक प्रक्रिया है जिससे कि तुरन्त यौन अपराधों को रोकने की मंशा पूरी नहीं हो सकती। ऐसे में समाज की स्वयं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण बन जाती है। पिछले दिनों खबरों में जन सहयोग से घटना को अंजाम देने से पहले ही यौन अपराधी को धर दबोचने की खबरों ने थोड़ी सांत्वना भी दी। यह सजगता समाज के लिए सकारात्मक है।

स्वास्थ्य विज्ञान की दृष्टि यौन अपराध की मानसिकता विभिन्न प्रकार के मनोरोगों का समूह है। इसलिए चिकित्सा क्षेत्र यौन अपराधों को कम करने में सहायक हो सकता है। विदेशों में आदतन यौन अपराधियों पर इस प्रकार के सफल प्रयोग
किए जा रहे हैं। भारत में भी इस संभावना पर जरूर विचार किया जाना चाहिए। नवजात और अवोध बच्चियों के लिए यौन आक्रमण शारीरिक रूप से जानलेवा  होता है वहीं विभिन्न शोध रिपोर्ट के अनुसार यौन आक्रमण का शिकार हुई कम उम्र की लड़कियों के मस्तिष्क में स्थायी विकृतियां उत्पन्न हो जाती हैं जिसके कारण वे शेष जीवन में कभी भी सामान्य जीवन जीने की स्थिति में नहीं आ पाती हैं। यौन हमले के कारण हृदय और सम्पूर्ण  रक्तवाहिनियां, किडनी,  आंतें, आंखों की पुतलियां आदि याने शरीर का सम्पूर्ण मानसिक और शारीरिक तंत्र भी आघात का शिकार होता है।

मस्तिष्क में संग्रहित स्मृतियों से उपजे प्रेम, घृणा, अवसादए तिरस्कार, ग्लानि, प्रतिशोध, प्रतिहिंसा आदि असहज भाव अनियंत्रित रूप से बार बार बदलते हैं। जिनके कारण शिकार हुई लड़की के भावनात्मक व मानसिक रोगों के साथ हार्मोन
डिसोर्डर्स और आॅटोइम्यून डिसोर्डर्स से होने वाले गंभीर रोगों का शिकार होने की संभावना बहुत अधिक हो जाती है।

मानव मस्तिष्क के चिन्हित विभिन्न केन्द्र और संरचनाएं यौन अपराध से  सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। कोर्टिको लिम्बिक सिस्टम ही यौनिच्छा सबंधी सभी तरह की भावनाओं, अतिरिक्त या विकृत यौन लालसा, व्यक्तिगत व्यवहार, प्रेरणाओं, आनन्द की अनुभूति और बार बार यौन स्मृतियां  की प्रेरणा के द्वारा आपराधिक तौर पर यौन कार्य में प्रवृत्त होने की मनःस्थिति तैयार करता है। मस्तिष्क के टेम्पोरल लोब और फ्रंण्टल लोब के कोर्टिक्स की असामान्य रचना और क्रिया के
कारण व्यक्ति के व्यक्तित्व में बदलाव आता है जिसके कारण यौन उत्तेजनाएं मस्तिष्क पर इतना हावी हो जाती हैं कि शेष सभी प्रकार की मानवीय संवेदनाएं, लज्जा और सामाजिक विवेक की कमी हो जाती है। उसके व्यक्तिगत व्यवहार से सामाजिक लज्जा, पश्चाताप की भावना और भद्रता की भावना कम हो जाती है। ऐसे में अपराधी निःसंकोच बड़े से बड़ा, घृणित से घृणित असंवेदनशील अपराध कर जाता है।

ये भी हैं कारण
मस्तिष्कगत विभिन्न जैव रसायन जिन्हें न्यूरोट्रांसमीटर कहते हैं; जैसे डोपामाइन, सेरोटोनिन, नोरएपिनेफ्रिन। ये यौन क्रिया के समय आनन्द की अनुभूतियों को महसूस करवाते हैं। मस्तिष्क में इनकी अधिकता यौन उन्माद को जन्म देती है।  मस्तिष्कगत रोग जैसे  मस्तिष्क में चोट, डिमेंशिया, मल्टीपल स्क्लेरोसिस, हंटिंग्टन डिजीज आदि के परिणाम स्वरूप व्यक्ति के यौन व्यवहार में विकृतियां आ जाती हैं। पीडोफिलिक डिसोर्डर में फ्रोण्टो टेम्पोरल डिमेंशिया और बाइलेटेरल हिप्पोकेम्पल स्क्लेरोसिस की स्थिति मिल सकती है।

हीबेफीलिया याने 15 से 19 साल की नवयुवतियों से आदतन यौन दुव्यवहार करे वाले व्यक्तियों के मस्तिष्क में व्हाइट मैटर अपेक्षाकृत कम होता है। यौन सक्रियता उत्पन्न करने वाले हार्मोन्स के समूह को एण्ड्रोजन कहते हैं। ये हार्मोन्स मनुष्यों में यौन इच्छाओं, आवेगों  और क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। रक्त में इनकी अधिकता हाइपर सेक्सुअलिटी या सेक्सुअल एडिक्शन का कारण बनती है। सभी प्रकार के यौन अपराध  न्यूरो साइकोलाॅजिकल डिसोर्डर हैं। असामान्य यौन इच्छाओं
के प्रकार अनगिनत हो सकते हैं। समाज की सुरक्षा और किशोरवय लडकियों की सुरक्षा के मद्दे नजर इन यौन मानसिक विकृतियों की जानकारी सार्वजनिक होना बेहद आवश्यक है। मुख्य यौन व्यवहार संबंधी मनोविकारों को हम इस तरह समझ सकते हैं।

विकृत  मनोविकृति के तहत व्यक्ति एक साथ बहुत से लागों से प्रेम व्यवहार में व्यस्त रहते है। तात्कालिक आवश्यकताओं के अनुसार बार बार प्रेमिकाएं बदलते हैं। ऐसे मनोरोगी निम्न, मध्यम और उच्च; सभी बुद्धिवर्ग में मिल जाते हैं। इस विकार से ग्रस्त लोग अक्सर कम उम्र या नवयौवनाओं को आसानी से भावनात्मक शिकार बना लेते हैं। इनकी शिकार किशोरियां यौन शोषण के साथ साथ भावनात्मक शोषण की शिकार भी बनती हैं। इस प्रकृति के यौन अपराध दुनिया की किसी अपराध पंजिका के रिकाॅर्ड्स में भी दर्ज नहीं हो पाते क्योंकि इन दोषों का शिकार हुई लड़कियां कम उम्र और भावनात्मक भागीदारी के कारण लम्बे समय तक यह समझ ही नहीं पातीं कि वो यौन शिकार बना ली गई हैं। समय बीतने पर जब पता चलता है तब तक इनके हाथ से उनका सामान्य भावनात्मक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन छिन चुका होता है। ऐसे मनोरोगी अक्सर अकेलेपन और खालीपन के भय से ग्रस्त होते हैं। इसलिए कल्पनाओं में यौनसुखों का आनन्द लेकर राहत महसूस करते हैं।

अमेरिकन साइकेट्रिकल मैनुअल आॅफ मेंटल डिसोर्डर्स में सेक्स के लिए व्यक्ति की अतिसक्रियता को मनोरोग में गिना है। इस मनोविकृति के तहत मनोरोगी को बार-बार और अधिक तीव्रता से जुनून की तरह यौन क्रियाओं की इच्छा होती है। ऐसे
लोगों का यौन व्यवहार उनके नियंत्रण में नहीं रहता है। ऐसे मनोरोगी वैयक्तिक, पारिवारिक या सामाजिक प्रतिबद्धताओं का विचार ना करके सिर्फ इच्छा पूर्ति के बारे में ही विचार करते हैं। इसलिए हर तरह का जोखिम उठा लेने को तैयार हो जाते
हैं।  ऐसे मनोरोगी कम उम्र के बच्चों, नौकरानी, घर या कार्यक्षेत्र में कमजोर स्थिति वाले कर्मचारियों या सहकर्मियों को शिकार बनाते हैं। यह भावनात्मक विकृतियों के समूह से जुड़े मनोरोगी असामान्य यौन कल्पनाएं करता है, उनके अनुसार तीव्र इच्छा और आवेग का अनुभव करता है और इन आवेगों के अनुसार शिकार खोजकर बार बार असामान्य यौन व्यवहार करता है।

मनोरोग और आयुर्वेद
भारतीय पौराणिक शास्त्रों में आपराधिक यौन संबंधों को आसुर, राक्षस और पैशाचिक वृत्तियों के तौर पर माना जाता था। ज्आसुरज् याने स्त्री को खरीदकर यौन संबंध बनाना, ज्राक्षसीयज् याने बलपूर्वक यौन संबंध बनाना और ज्पैशाचिकज् याने स्त्री की शारीरिक या मानसिक दुर्बलता का फायदा उठाकर या उसे नशा देकर उसका असांज्ञानात्मक स्थिति में यौन संबंध बनाना। आयुर्वेद में हजारों वर्ष पहले मानव के मानसिक स्वास्थ्य का बारीकी से विश्लेषण कर दिया था। जिसमें वात पित्त
कफ इन तीन शारीरिक दोषों की अधिकता या न्यूनता के आधार पर 3 तरह की मानसिक प्रकृतियों का वर्णन किया गया है। ये तीन तरह की प्रकृतियां हैं सात्त्विक, राजसिक व तामसिक। इनमें सात्त्विक प्रकृति को शुद्ध गुण के रूप में माना गया
है जबकि शेष दो प्रकार की प्रकृतियों को दोषयुक्त प्रकृति माना गया है।

रज और तम की अधिकता वाले व्यक्तियों को हम उनके व्यवहार से आसानी से पहचान सकते हैं इसलिए यदि समाज जागृत हो और अपनी जिम्मेदारियों का वहन अच्छे से करे तो इन मनोरोगियों को अपराध करने के अवसर कम उपलब्ध हो सकते हैं। समाज अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकता है।  राजसिक प्रकृति के स्वभावों के 5 भेद किए हैं; असुर, राक्षस, पिशाच, प्रेत, सर्प, शाकुन। रजोगुणी प्रकृति वाले व्यक्ति बुद्धिमान तो होते हैं लेकिन वे अपनी बुद्धि और चातुर्य का स्वार्थवश दुरुपयोग करने वाले होते हैं। वे कामी, क्रोधी, लम्पट, असहिष्णु, निर्लज्ज, निर्दयी, चंचल चित्त वाले, कपटी, छली स्वभाव वाले होते हैं। इनका अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं होता और बुद्धिमान होने के कारण सक्षम भी होते हैं। इसलिए येन
केन प्रकारेण इन्द्रिय सुखों के उपभोग में ही अपनी सारी ऊर्जा व्यय करते हैं। इन्हीं राजसिक मनोवृत्ति वाले व्यक्तियों में लव एण्ड सेक्स एडिक्शन या हाइपरसेक्सुअलिज्म के मनोरोगी मिलते हैं।

तामसिक प्रवृत्ति - तमोगुण की अधिकता के 3 भेद किए हैं; पशु, मत्स्य,वानस्पत्य। तमोगुणी प्रवृत्ति के व्यक्ति पूर्णतया विवेकशून्य होते हैं। मूर्खता, अज्ञान, निन्दित व्यवहार, दूसरों की वस्तुएं बलपूर्वक छीनने आदि की वृत्ति इनमें सामान्य होती है। ऐसे ही तमोगुणी व्यक्ति अग्रेसिव सेक्स, नेपिओफिलिया, पीडोफिलिया, हिबेफिलिया याने बलात्कारी या नवजात बच्चों, अबोध बच्चों के साथ घृणित व असंवेदनशील यौन कुकृत्य करने वाले मनोरोगी होते हैं।

अपराधियों की सामाजिक पहचान:-
इनके व्यवहार से हम इनके मनोविकारों को पहचान सकते हैं। इसलिए ऐसे लोगों के व्यवहार पर यथासंभव नजर रखना और सही समय पर इनके व्यवहार नियंत्रण के उपाय करना हर व्यक्ति का सामाजिक दायित्व होना चाहिए क्योंकि सामाजिक अपराधों का खामियाजा कब किसे भुगतना पड़ सकता है यह कहा नहीं जा सकता। अन्ततः इनपर नियंत्रण समाज को ही करना होता है।

1. इनमें भावनाओं पर आत्मनियंत्रण की कमी होती है। आत्मसम्मान और सामाजिक लज्जा का भाव कम होता है।

2. इनकी भाषा में यौन संबंधों से संबंधी शब्दों की बहुतायत मिलेगी। इनके हास्य और बातचीत यौन विषयों पर अधिक केंद्रित होते हैं। इनके सामान्य संपर्क विपरीत लिंगियों से अपेक्षाकृत अधिक होते हैं।

3. विपरीत लिंगियों के आसपास रहना पसन्द करते हैं, यहां तक कि बेवजह भी इनसे नजदीकी और निरंतर संपर्क बनाए रखने का प्रयास करते हुए मिलेंगे।

4. अपनी यौन उपलब्घियों की चर्चाओं को लोगों के सामने विजय केरूप में पेश करते हुए मिलेंगे। अपने यौन दुःसाहस का श्रेष्ठता के रूप में बखान करते हुए मिलेंगे।

5. ऐसे लागों के एक समय में एक से अधिक प्रेम व यौन संबंध होते हैं।

6. आसानी से बार बार प्रेम संबंध व यौन संबंध बदलते हैं।

7. दिन का अधिकतर समय यौन प्रबंधन संबंधी चिंताओं में बिताते हैं। इन्हें फोन या अन्य संचार माध्यमों से यौन वार्ताओं का शौक होता है।

8. इनकी मित्रता अक्सर अपने समान ही यौन संकेतों की भाषा और व्यवहार वाले लोगों से होती है।

यौन अपराध रोकने के उपाय:-
यौन अपराधियों को कानूनन सजा देना एक प्रचलित और अत्यावश्यक व्यवहार है। लेकिन अधिकतर उदाहरणों में देखा जाता है कि ऐसे अपराधी या तो सजा से बच जाते हैं और परिणामस्वरूप सज के भय से मुक्त होकर आदतन अपराधी बन जाते हैं। या फिर सजा मुक्त होते ही पुनः पहले से बड़े अपराध करने लगते हैं।

1. सजगतापूर्वक बचाव - यौन अपराधों में बढ़ती क्रूरता के कारण ऐसे यौन व्यवहार के रोगियों की पहचान करना, उन्हें चिन्हित करके उनके व्यवहार को उचित माध्यमों से नियंत्रित करना, अपराधों की रोकथाम करना आज हमारी सामाजिक, राजनैतिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती जा रहा है। वर्तमान जीवनशैली की जिम्मेदारियों के बोझ ने हर व्यक्ति को सामाजिक जिम्मेदारियों से काटकर मात्र वैयक्तिक जीवन जीने को मजबूर कर दिया है। समाज के अधिकांश लोगों के अपने व्यक्तिगत दायरों में सिमट जाने के कारण अपराधी बेखौफ हो गए हैं। हर व्यक्ति सजग होगा तो यौन अपराधियों
को अपराध करने के अवसर कम मिलेंगे।

पीडोफीलिक रोगियों से बचाने के लिए अनजान बच्चों को बेवजह चाॅकलेट आदि देकर आकर्षित करते लोगों पर विशेष निगरानी रखने की आवश्यकता होती हैं। क्योंकि इस प्रकार के मनोरोग के शिकारी अबोध होने के कारण स्वयं अपना बचाव करने में सक्षम नहीं होते। जबकि लव एण्ड सेक्सुअल एडिक्शन और इफीबोफीलिया आदि के मनोरोगियों से बचाव के लिए किशोर उम्र के बच्चों को स्कूल - काॅलेज के पाठ्यक्रम में विशेष रूप से यौन व्यवहार की विकृतियों की जानकारी दी जा सकती है। यौन मनोरोगियों की जानकारी को पाठ्यक्रम में शामिल करके उनसे बचाव के विषय में विशेष रूप से पढ़ाया जाना आवश्यक किया जाना चाहिए ताकि बच्चे और किशोर मानसिक रूप से स्वयं सुदृढ होसकें और विपरीत परिस्थियों का स्थिर बुद्धि से मुकाबला कर सकें।

2. मनोवैज्ञानिक उपचार - सामान्यतया यौन अपराधियों को अपराध की मासिकता से अलग कर देना स्थायी रूप से संभव नहीं है। फिर भी मनोवैज्ञानिक दबाव या मनोवैज्ञानिक उपचार या ब्वहदपजपअम इमींअपवतंस जीमतंचल ;ब्ठज्द्ध आदि के द्वारा कुछ समय के लिए अस्थायी परिवर्तन जरूर इनके व्यवहार में देखे जा सकते हैं।

उपरोक्त लिखे गए मनोरोगों के रोगियों के मस्तिष्क से उनकी यौन पसंद की प्राथमिकता को तो संभवतया नहीं बदला जा सकता लेकिन मनोवैज्ञानिक उपचार द्वारा इनके व्यवहार में भावनात्मक मनोवैज्ञानिक बदलाव आंशिक रूप से किए जरूर जा सकते हैं।

3. औषध उपचार - जिस प्रकार चेचक, पोलियो व विभिन्न शारिरिक रोगों से बचाव के लिए टीकों का उपयोग किया जाता है उसी प्रकार यौन अपराधियों की चिकित्सा के लिए अनुसंधान केन्द्र बनाकर उपयुक्त औषधियों द्वारा उपचार किया जाने के संबंध में प्रयास किए जा सकते हैं।- रेखा शर्मा
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