देवी देवताओं की लगी अदालत, भंगाराम मांई ने किया इंसाफ , जात्रा में देवी -देवता जुटे

By: Badal Dewangan

Published On:
Sep, 09 2018 04:40 PM IST

  • जात्रा का अपना एक धार्मिक महत्व है जिसके तहत् ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले क्षेत्र के सारे देवी देवताओं को साल में एक बार शनिवार के ही दिन अपने अपने कार्यों का ब्यौरा भंगाराम मांई के समक्ष देना होता है ।

केशकाल. नगर में आयोजित होने वाले भंगाराम जात्रा में क्षेत्र के सारे देवी देवताओं ने शनिवार को शिरकत की। जात्रा में बस्तर महाराजा कमलचन्द भंजदेव सहित अनुसूचित जनजाति आयोग अध्यक्ष जी.आर.राणा, केशकाल विधायक संतराम नेताम एवं पूर्व विधायक सेवकराम नेताम, विधायक भोजराज नाग, नगर पंचायत अध्यक्ष आकाश मेहता, जनपद अध्यक्ष जगनाथ नाग के अलावा कोण्डागांव जिला कलेक्टर नीलकण्ठ टेकाम, सहायक आयुक्त शोरी, एसडीएम धनंजय नेताम बड़ी संख्या में ग्रामीण जन उपस्थित थे।

जात्रा का अपना एक धार्मिक महत्व है जिसके तहत् ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले क्षेत्र के सारे देवी देवताओं को साल में एक बार शनिवार के ही दिन अपने अपने कार्यों का ब्यौरा भंगाराम मांई के समक्ष देना होता है । तत्पश्चात् यहां उनके कार्यों के हिसाब से उन्हे दण्ड अथवा सम्मान से नवाजा जाता है। मुगंबाडी स्थित कुंवर पाठ के मंदिर से बाजा-गाजा के साथ अगवानी करते हुए केशकाल थाना पहुंचे जहां से वे भंगाराम मंदिर के लिए रवाना हुए । मंदिर परिसर पहुंचने पर पूजा-अर्चना के बाद देवी देवताओं की अदालत लगाई गई है। जिसमें देवी देवताओं पर लगे आरोपों की गंभीरता से सुनवाई होती है जिसके बाद फैसला सुनाया जाता है । आम अदालतों की भांति यहां पर भी नैसंिर्गक न्याय किया जाता है। अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाता है, आरोप के अनुसार फैसला होता है। यहां प्रतिनिधि के रूप में पुजारी, गायता, सिरहा, ग्राम प्रमुख, मांझी मुखिया, पटेल उपस्थित रहते है। पहले दिन फुल पान नारियल व धूप भेंट कर मांईजी की सेवा पूजा की जाती है । क्षेत्र से आए हुए देवों को रात्रि में ठहरना होता है फिर दूसरे दिन देवी-देवताओं को खुश करने के लिये बली और अन्य भेंट दी जाती है। बिना मान्यता के किसी भी नई देव की पूजा का प्रावधान नहीं है। जरूरत के मुताबिक अथवा ग्रामीणों की मांग पर उन्हें मान्यता दी जाती है। भंगाराम देवी मंदिर के पास ही एक ऐसा स्थान है जहां पर गांव-गांव से लाये सामाग्रियो ंको डाला जाता है। जिसे कारागार या जेल के रूप में माना जाता है।

इंसान ही क्या देवी-देवता अपना दायित्व का निर्वहन सही ढ़ंग से नही करते हैं । उन्हें भी आरोपों के कटघरें में खड़ा कर दंडित किया जाता है । वर्ष में एक बार लगने वाले इस मेले में महिलाओं का आना वर्जित है। जात्रा में आये समाज के कुछ लोगो से इस परंपरा के विषय में जानकारी लेने पर बताया कि यहां खान देवता के नाम से पूजित देव जिसे ग्रामीण देशी अण्डे का भेंट चढ़ाया करते जिसके पीछे यह मान्यता है कि बहुत समय पूर्व क्षेत्र में हैजे का जबरदस्त प्रकोप फैला जिससे निजात दिलाने मांई जी की ही प्रेरणा से डॉक्टर पठान जो कि नागपुर महाराष्ट्र के निवासी थे यहां आये और मांईजी के आशीष से उन्होने हैजे का उपचार करना प्रारंभ किया व उत्कृष्ट कार्य किया जिससे मांई जी ने उन्हें स-सम्मान अपने पास स्थान दिया तथा आज भी वे पठान देवता के नाम से यहां पूजे जाते है। इस जात्रा का धार्मिक महत्व मुख्यत: आदिवासी वर्ग से जुड़ा है।

Published On:
Sep, 09 2018 04:40 PM IST