राजस्थान के इस अस्पताल में रोगी हो जाते हैं चंपत...

By: Dinesh Kumar Sharma

Updated On: 10 Sep 2019, 04:59:28 PM IST

  • करौली. यहां चिकित्सालय में आधे- अधूरे उपचार के बीच बंक मारने वाले मरीज न केवल व्यवस्थाओं को बिगाड़ रहे हैं बल्कि वे कानूनी दृष्टि से कभी समस्या भी बन सकते हैं।

करौली. यहां चिकित्सालय में आधे- अधूरे उपचार के बीच बंक मारने वाले मरीज न केवल व्यवस्थाओं को बिगाड़ रहे हैं बल्कि वे कानूनी दृष्टि से कभी समस्या भी बन सकते हैं।

चिकित्सालय प्रशासन को ऐसे मरीजों पर अंकुश लगाने का उपाय नहीं सूझ रहा जबकि इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इस वर्ष में ऐसे मरीजों की संख्या 15 हजार से पार पहुंच चुकी हैं। करौली चिकित्सालय में सुरक्षा प्रबंध ऐसे नहीं है कि भर्ती मरीजों की चौकसी की जा सके। वार्डो में भी स्टाफ सीमित है।

ऐसे में भर्ती हुए अनेक मरीज बिना चिकित्सक के डिस्चार्ज किए आधे अधूरे उपचार के बीच (एब्सकोंड) चंपत हो जाते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो कुछ देर गायब होने के बाद फिर पलंग पर आ लेटते हैं। इस वर्ष जनवरी से अगस्त तक के ऐसे रोगी 15 हजार से अधिक है। यह संख्या कुल भर्ती मरीजों के लगभग आधे के बराबर है। यह संख्या कुल भर्ती मरीजों के लगभग आधे के बराबर है।

चिकित्सालय सूत्रों के अनुसार जनवरी से अगस्त 2019 तक 33 हजार से अधिक मरीज वार्डों में भर्ती हुए। इनमें से 15 हजार 480 रोगी ऐसे थे, जो बिना बताए ही अस्पताल ये चंपत हो गए।

हो सकती है समस्या
अस्पताल में भर्ती मरीज का गायब होना कानून की दृष्टि से गंभीर समस्या बन सकता है। रिकॉर्ड में भर्ती किसी मरीज द्वारा अपराध कर देने पर वह खुद का बचाव कर सकता है। अनेक शातिर होते हैं जो रिकॉर्ड में खुद को भर्ती दिखाकर अपराध कर डालते हैं। किसी भर्ती मरीज के साथ हादसा हो जाने पर भी कानूनी जटिलता सामने आ सकती है। ऐसी आशंका के बाद भी मरीजों के बंक मारने पर अंकुश नहीं लग पा रहा।

ज्यादा है आंकड़ा
कुछेक महिनों की स्थिति देखें तो चंपत का आंकड़ा डिस्चार्ज से भी कहीं ज्यादा है। अप्रेल माह में 2252 रोगी डिस्चार्ज हुए, जबकि 2546 बिना डिस्चार्ज ही अस्पताल से चलते बने। मई में भी जहां 2553 रोगी पूरा उपचार कराकर डिस्चार्ज होकर गए तो 3181 रोगी बंक मार गए। अगस्त माह में भी कमोबेश यही स्थिति रही। 2476 डिस्चार्ज हुए तो 2446 बिना बताए घरों को चले गए।


समस्या खूब, लेकिन नहीं देते ध्यान
चिकित्सालय के वार्डो में पलंगों की संख्या सीमित होने से ऐसे मरीज व्यवस्था को बिगाड़ रहे हैं। साधारण मरीजों को भी भर्ती कर लेने से वार्ड ओवरलोड हो रहे हैं। स्वयं चिकित्साकर्मी कहते हैं कि काफी संख्या में ऐसे रोगी भर्ती किए जाते हंै, जिनका आउडडोर से उपचार किया जा सकता है। कुछ मरीज भी बाहर से आते हैं तो वे अन्य स्थान पर दवा लेकर आराम करने की बजाय अस्पताल में आराम करके चलते बनते हैं। मुख्यमंत्री नि:शुल्क दवा योजना के चलते अस्पताल में मुफ्त में उपचार होता है। इस कारण गांवों से आए रोगियों की मंशा केवल एक-दो ड्रिप लगवाने और कुछ देर आराम करने की रहती है। चिकित्सक भी घर पर फीस लेकर रोगी को अस्पताल में भर्ती होकर बोतल (ड्रिप) चढ़वाने की सलाह देते हैं। ड्रिप पूरी होते ही रोगी चल देता है। इस स्थिति से वार्डों में पलंगों के लिए मारामारी मचती है और वार्ड के चिकित्साकर्मियों पर काम का दबाव रहता है।

फैक्ट फाइल
माह कुल इनडोर एब्सकोंड
जनवरी 2291 880
फरवरी 2459 859
मार्च 3639 1407
अप्रेल 4997 2546
मई 5852 3181
जून 4776 2314
जुलाई 4104 1847
अगस्त 5224 2446

समाधान नहीं
अनेक रोगी ऐसे होते हैं जिन्हें भर्ती की जरुरत नहीं होती, लेकिन वह व उसके परिजन दबाव बनाते हैं, भर्ती नहीं करने पर विवाद और शिकायत होती है। ऐसे में भर्ती करना मजबूरी हो जाता है। जो रोगी बिना कहे चले जाते हैं, उनका पता चलते ही तत्काल टिकट पर समय अंकित कर लिख देते हैं। समस्या तो है लेकिन समाधान हमारे पास नहीं।
डॉ. दिनेश गुप्ता, पीएमओ, सामान्य चिकित्सालय, करौली

Updated On:
10 Sep 2019, 04:59:27 PM IST

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