350 परिवारों को 1949 में मिली थी आजादी

By: Vinod Nigam

Updated On:
17 Aug 2019, 09:03:02 AM IST

 
  • 1947 के बंटवारे के बाद भाटिया समाज के लोगों पर पाकिस्तानियों का टूटा था कहर, दो साल के बाद किसी तरह पहुंचे भारत और कानपुर में बनाया घर।

     

कानपुर। देश भर में आजादी का पर्व भले ही 15 अगस्त 1947 को मनाया जाता है लेकिन कानपुर के कृष्णानगर में रहने वाले करीब 350 हिन्दू परिवारों को आजादी 1949 में मिली थी। जब ये लोग पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान इलाके से अपनी जान बचाकर किसी तरह से भारत की सरहद के अंदर आए और वहां से सीधे उद्योनगरी में शरण ली। यहां के एक जमीदार ने इन्हें 209 बीघे जमीन दी, जिसमें नागर जी सोसाइटी की नींव रखी गई। इनलोगों ने शहर में व्यवसाय किया और वर्तमान में सोसाइटी में रहने वाले लोगों की गिनती रईसों में होती है।

डेरा इस्माइल खान से आए थे कानपुर
शहर के कृष्णानगर स्थित श्रीनागर जी सोसाइटी में करीब 350 से ज्यादा परिवार रहते हैं। अधिकतर खुद का व्यापार करने के साथ ही समाजसेवा के कार्य से भी जुडे हैं। पूर्व पार्षद मदन लाल भाटिया बताते हैं कि उनका जन्म तो कानपुर में हुआ था। लेकिन आजादी के वक्त बंटवारे के दौरान हमारा परिवार पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान इलाके में रहता था। यहां पर करीब 20 हजार से ज्यादा हिन्दू परिवार रहते थे। बंटवारे के बाद पाकिस्तानियों में हिन्दू समाज पर हमले होने लगे। इसकी आग डेरा इस्माइल खान तक पहुंच गई। उस दौरान सैकड़ों लोगों की हत्या कर दी गई। घरों को लूट लिया गया। बहू, बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया।

पठानों ने की थी मदद
जिस वक्त पाकिस्तानी के जेहादी एक धर्म के लोगों को चुन-चुन कर मार रहे थे, तभी हमारे समाज के नागर जी 350 परिवारों के साथ गांव छोड़ दिया और एक पहाड़ी पर शरण ली। पांच माह तक हमारे परिजन पहाड़ पर रहे और वहां के पठान परिवारों ने हमारी मदद की। जेहादियों से छिपाकर भोजन पहुंचाते और 1959 को आठ ट्रकों के जरिए सभी को सरदह तक पहुंचाया। यहां पाकिस्तानी सेना और कबिलाईयों से बचने के लिए हमारे परिजनों को जंगल में पूरे एक सप्ताह का भूखे रहना पड़ा था और फिर वह घड़ी आ गई, जब हम अपनी भारत माता की धरती पर कदम रख पाए।

हमें भी भारत बुला लो
पाकिस्तान से आए लालू भाटिया (90) बताते हैं, वह 1949 में जब से आए तब से पाकिस्तान नहीं लौटे। उन दिनों को याद कर बताते हैं, पाकिस्तान में फरमान जारी हो गया था ‘मुसलमान बनो या देश छोड़ो’। हमारे समाज के लोगों ने उनके सामनें सरेंडर नहीं किया और कुछ लोग लड़ते हुए जान गवां दी तो हम जैसे लोग किसी तरह से वहां से भागकर भारत आ गए। कहते हैं, हमारे पड़ोस के मित्र राजू भाटिया व उनके दो बेटे आतंक की भेंट चढ़ गए। पाकिस्तानी भारत के लोगों से बहुत नफरत करते हैं। बताते हैं, कुछ लोग अभी भी कराची में हैं। फोन से बात होती है तो वह यही कहते हैं कि हमें भी भारत बुला लो।

श्रीनागर दल की स्थापना
पूर्व पार्षद कहते हैं कि पाकिस्तानियों द्धारा दिए गए जख्म को भुलाकर हमारे लोगों ने खुद के पैर में खड़ा होने की बीणा उठाया। श्रीनागर जी ने 1987 नागर दल की स्थापना की। हमारे संगठन ने गरीब, बेघर, शिक्षा से वंचित लोगों को आगे बड़कर मदद की। श्रीनागर जी के नेतृत्व में कई स्कूलों की स्थापना करवाई गई। जहां बच्चों को निशुल्क शिक्षा के साथ अन्य साजो समान मुहैया कराया जाता है। गरीब बेटियों की हरवर्ष समाज के लोग झादी करवाते हैं।

370 हटाना सही फैसला
मदन भाटिया कहते हैं कि 1949 की दर्दभरी यादों को भुलाकर भारत और कानपुर को आगे ले जाने के लिए समाज अपनी भूमिका पूरी इमानदारी से निभा रहा है। कहते हैं, पाकिस्तानियों के अंदर नफरत और जेहाद भरा है और एकदिन इस देश को यही लोग निगल जाएंगे। धारा 370 के बारे में पूर्व पार्षद कहते हैं कि सरकार का ये फैसला एतिहासिक है। अब जम्मू-कश्मीर में आतंक के बजाए चिमनियों से धुआं निकलेगा। रही बात पीआके की तो हम कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रहते जल्द ही यहां पर तिरंगा फहराएगा।

अब दे रहे रोशनी
पूर्व पार्षद ने बताया कि हमारे संगठन ने 2006 से नेत्रदान की शुरूआत की थी। हमारे समाज के 156 लोगों ने मरणोपरान्त अपने नेत्रदान किया। जिसके कारण 300 लोग अब देख सकते हैं। बताते हैं, अब संगठन से अन्य समाज, धर्म के लोग जुड़ रहे हैं और इस पुण्य के कार्य में बड़चड़ कर हिस्सा ले रहे हैं। इसमें हमें डाॅक्टर, शासन व प्रशासन की भी अहम सहयोग मिल रहा है। पूर्व पार्षद ने लोगों से अपील की है कि ज्यादा से ज्यादा नेत्रदान कर लोगों को रोशनी दें।

Updated On:
17 Aug 2019, 09:03:02 AM IST

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