चार बच्चों की मार्मिक कहानी, जिन्हें चंद रुपयों के लिए अपनों ने छोड़ा, फिर शुरु हुआ उनका शारीरिक शोषण

By: Deepshikha

Updated On: Jun, 12 2019 08:09 AM IST

  • विश्व बाल श्रम निषेध दिवस आज

जया गुप्ता / जयपुर. World Child Labor Prohibition Day :

(पिछले कुछ दिनों में चूड़ी के कारखानों से छुड़वाए गए बालश्रमिक टाबर संस्था को गृह में रह रहे हैं। बच्चों ने वहीं अपनी आपबीति बताई )

 

पापा ने एक हजार में सेठ को बेच दिया : इमामुद्दीन, 15 वर्ष

मेरा गांव बिहार में है। गांव में मैं स्कूल जाता था। घर पर मम्मी-पापा और बड़े भाई-बहनों के साथ रहता था। दो साल पहले गांव का एक सेठ पापा को एक हजार रुपए देकर मुझे जयपुर ले आया। सेठ ने कहा था कि वो मुझे स्कूल भेजेगा और काम करवाएगा। हर महीने दो हजार रुपए भी देगा। यहां आने के बाद कभी स्कूल की शक्ल भी नहीं देखी। सेठ ने चूड़ी बनाने के काम में लगा दिया। सेठ 12-15 घंटे काम करवाता था। नाक से खून आ जाता, फिर भी उसको दया नहीं आती थी। कुछ दिन पहले पुलिस ने छुड़वाया। तभी से यहीं रह रहे हैं। यहां समय पर खाना मिलता है।

 

 

भूखे पेट करना पड़ता दिनभर काम : कैलाश कुमार, 14 साल

मेरा घर भी बिहार में ही है। मैं और मेरा दोस्त एक सेठ के साथ जयपुर आए थे। सेठ ने यहां लाकर किसी दूसरे सेठ के यहां काम पर लगवा दिया। वहां एक छोटा सा कमरा था। जिसमें हम 18 लोग काम करते थे। एक छोटी सी टेबल पर पैर मोड़कर बैठते थे। बहुत दिक्कत होती थी। जब तक रोजाना का टारगेट पूरा नहीं होता था, तब तक सेठ काम करवाता था। उससे पहले खाना भी नहीं मिलता था। भूखे पेट ही काम करना पड़ता था।

 

पिता ने दूसरी शादी कर किया बेगाना : मो- आशिक, 14 साल

केस 3 - मेरे परिवार में पापा-मम्मी और चार भाई-बहन है। पापा ने दूसरी शादी कर ली। हमारे घर में कमाने वाला कोई नहीं था। मैं ही सबसे बड़ा हूं, इसीलिए जयपुर आ गए। यहां भट्टा बस्ती में चूडी के कारखाने में काम करता था। वहां सेठ कभी पढऩे नहीं भेजता था। पढऩा तो दूर नहाने भी नहीं देता था। कितनी भी गर्मी हो, हफ्ते में एक बार नहाने देते थे। नहीं नहाने से मुझे खुजली की बीमारी हो गई। मालिक डॉक्टर के पास भी नहीं लेकर गया। वो तो पुलिस आ गई और यहां ले आए। यहां डॉक्टर को दिखाया, दवाई दिलवाई। अब ठीक हूं।

 

स्कूल कभी भेजा नहीं, काम इतना कि बीमार हो गया : मो. चांद, 13 साल

केस 4- मम्मी-पापा ने जयपुर काम करने और पढऩे भेजा था। गांव का एक आदमी जयपुर आता-जाता है। वहीं आदमी मुझे भी लेकर आया था। उसने कहा था कि यहां काम मिलेगा, पैसे भी मिलेंगे और दिन में स्कूल भी जाऊंगा। स्कूल कभी देखा ही नहीं। उसने एक कारखाने में लगाया। कारखाना मालिक बहुत खराब था। कपड़े भी नहीं बदलने देता था। सप्ताह में एक ही बार कपड़ा बदलते थे। मुझे बीमारी भी हो गई थी।

 

 

ये महज चार बच्चों की कहानी नहीं हैं, बल्कि कच्ची उम्र में किताब की जगह कारखाने में झोंक दिए गए हर बच्चे की कहानी हैं। जिस उम्र में माता-पिता बच्चों को किताबें देते हैं। उन्हें पढ़-लिखकर आगे बढ़ाते हैं। देश के करोड़ों मासूम बच्चे कारखानों, ईंट के भट्टों, होटलों में काम में झोंके जा रहे हैं। इनमें से कई बच्चे तो ऐसे हैं, जिन्होंने अपने जीवन में कभी स्कूल ही नहीं देखा।

 

 

Published On:
Jun, 12 2019 07:30 AM IST

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