प्रकृति का हरापन जिसके खून में घुला है

By: Tasneem Khan

Updated On: 10 Sep 2019, 05:23:01 PM IST

  • प्रकृति का हरापन जिसके खून में घुला है

जयपुर। यह हैं अनुपमा तिवारी। राजस्थान की ट्री वुमन। जो अब तक दस हजार के करीब पेड़ लगा चुकी हैं। छायादार, फलदार, जो जिन पर पंछी चहचहाते हैं, राही थक कर छाया पाते हैं। वो इन पेड़ों को लगाकर भूल नहीं जाती। अपनी डायरी में नोट इन हजारों पेड़ों के पास बारी—बारी जाती हैं और इनकी देखरेख करती हैं। जहां पौध मुरझा जाती, वो नर्सरी से नए पौधे खरीद लगा देती और आज जयपुर के साथ टोंक जिले में लगे पेड़, जिन्हें वो अपने बच्चे कहती हैं, वो इन शहरों के निवासियों के लिए भरपूर आॅक्सीजन दे रहे है। अनुपमा जानी—मानी कवयित्री भी हैं, लेकिन उनका व्यक्तित्व समाज सेवा और प्रकृति प्रेम के साथ कई उंचा है। वे कहती हैं कि बीस बरस पहले कवितायेँ लिखनी शुरू कीं। मेरी कविताए मेरे आसपास के जीवन और प्रकृति का आधार बनीं। इनका घर पेड़ों का घर है। यहां चीकू, अनार, अमरुद और नीबू का पेड़ लगे हैं, जो चिड़ियों के स्वागत ले लिए हैं। इनके छत पर वेस्ट मेटीरियल से रूफ टॉप गार्डन इन्होंने बनाया। उसके लिए सब्जी मंडी में जा कर सब्जी के छिलके उठा लाती, गन्ने वाले से एक गिलास गन्ने का जूस पीती और उसके पास रखे छिलके कट्टे में स्कूटर के आगे रखकर घर ले आती, बाटी बनाने वाले ढाबे से राख लाई और फिर खाद बनाई। इस खाद की नींव पर अब छत पर बैंगन, भुट्टे, करेले, भिण्डी, टमाटर, ग्वार की फली खूब लगीं। जब भी जून की गर्मी में अनुपमा घर वालों को जब नहीं दिखती तो छत पर काम करते मिल जाती हैं। अपने पौधों को सहेजती है।
सुबह सवेरे अपने घर के आसपास की सड़कों का कचरा समेट या तो गड्ढा खोदकर डाल देती है, या फिर जला देती है। उन्हें देख कॉलोनी के लोग भी पूरी गली की सफाई सुबह खुद ही करते हैं।
सबसे पहले गाँव कुन्दनपुरा में जा कर पचास पेड़ लगाए थे। वो आज बड़े हो गए। वो आज भी अपने बच्चों को संभालने के लिए वहां जाती हैं। अनुपमा इस सबका लेखा जोखा भी रखती हैं, जिससे इनका फ़ॉलोअप हो सके। पेड़ों की देखभाल हो, इसके लिए उन्होंने ये पेड़ पुलिस चौकी, अपने ऑफिस, स्टेडियम के बाहर, बस स्टैंड, सरकारी, निजी कॉलेज, सरकारी अस्पताल, पार्क, सड़क के किनारे, लोगों के घरों और तालाब की पाल पर लगाए हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जगह पेड़ों को पालना बहुत ही कठिन काम है। इन्हें बचाने के लिए तो कई बार इनकी लोगों से झड़प तक भी हो गई।
उन्होंने पाँच साल पहले एक घर की चारदीवारी के अन्दर एक गुलमोहर और एक नीम का पेड़ लगाया था। गुलमोहर में लाल सुर्ख फूल आ गए और दोनों पेड़ों की जब शाखाएं सड़क पर आ गईं तो एक व्यक्ति ने उसकी छाया में त्रिपाल तान कर सब्जी की दुकान लगा ली और अनुपमा को इससे अपने लगाए पेड़ सार्थक नजर आए, जो किसी के काम आ रहे हैं।

अनुपमा कहती हैं कि जब मैं पेड़ लगाती हूँ तो कई बार लोग मुझसे पूछते हैं। आपको क्या फायदा है। मैं कहती हूँ, हर किसी को हवा, आॅक्सीजन मिलेगी, पक्षियों को घोंसले बनाने की जगह मिलेगी, जानवरों और लोगों को छायाँ मिलेगी, इससे बड़ा फायदा जीवन में क्या चाहिए।

Updated On:
10 Sep 2019, 05:23:00 PM IST

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