जागेश्वर में उमड़ता भक्तों का सैलाब, एक ही स्थान पर 108 शिवलिंग

By: Amit Pareek

Published On:
Aug, 27 2018 10:18 PM IST

 
  • सावन में यदि कोई ऐसा मंदिर मिल जाए जहां एकाध नहीं पूरे सौ से ज्यादा शिवलिंग नजर आ जाए तो फिर आस्था का सैलाब उमडऩा लाजिमी है। कुछ ऐसा ही नजारा देखना को मिलता है जागेश्वर महादेव मंदिर में। अल्मोड़ा (उत्तरांचल) से महज 35 किमी की दूरी पर स्थित इस धाम में 125 छोटे-बड़े मंदिर एक ही परिसर में निर्मित हंै। बारह ज्योतिर्लिंगों में से से एक यह शिव भक्तों के बीच आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है। खूबसूरत घाटी व देवदार के जंगी पेड़ों के बीच स्थित इस मंदिर में सर्वाधिक संख्या 108 शिव मंदिरों की है। मंदिरों से जुड़ी कई किंवदंतियां भी प्रसिद्ध हैं। सावन व शिवरात्रि के आस-पास यहां हर दिन हजारों श्रद्धालु जुटते हैं। साथ ही अपने में इतिहास समेटे ये स्थापत्य की अपनी कहानी खुद बयां करते हैं।


-सावन में हर साल जुटते हजारों श्रद्धालु

अमित पारीक

जानकारी के अनुसार इन मंदिरों का निर्माण 7वीं से 18वीं शताब्दी ईस्वी के बीच करवाया गया था। ये मंदिर शिव व अन्य देवी देवताओं को समर्पित है। इनमें योगेश्वर (जागेश्वर), मृत्युंजय, नवदुर्गा, सूर्य, नवग्रह, लकुलीश,केदारेश्वर, बालेश्वर, पुष्टिदेवी, कालिका, लक्ष्मी देवी प्रमुख हैं। भारतीय पुरातत्व विभाग के मुताबिक 7वीं से 14वीं शताब्दी के बीच कत्यूरी शासकों ने इन मंदिरों का निर्माण व पुनराद्धार करवाया था। उसके बाद 15वीं शताब्दी में चंद शासकों की ओर से मंदिर को दान-पुण्य दिए जाने की जानकारी मिलती है। ऐसी मान्यता है कि पहले ये मंदिर काठ (लकड़ी) के बनाए गए थे बाद में इनको पत्थर से निर्मित करवाया गया।

इसलिए नजर आते इतने शिवलिंग
जागेश्वर स्थित छोटे-छोटे शिव मंदिरों के बारे में बताया जाता है कि चंद राजा यहां आकर मनौती मांगा करते थे। उनके पूर्ण होने पर एक छोटा सा शिव मंदिर बनावा देते। इसी कारण परिसर में 108 छोटे शिवलिंग हैं।

अलग-अलग मुद्राएं आकर्षित करतीं
हर मंदिर के बाहरी हिस्से में कतिपय मुद्राएं आने वालों को रिझाती हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि ये निर्माण कत्यूरी राजाओं के काल में हुआ था। उस दौर के तीन शासक ईष्ट, देव, गण ने मंदिरों के बाहर खुद की अलग-अलग मुद्राओं में प्रतिमाएं उत्कीर्ण करवाईं। हालांकि कुछेक इतहिासकार इन्हें शिव की मुद्राओं से भी जोड़कर देखते हैं। महामृत्युंजय मंदिर जागेश्वर धाम का सबसे पुराना मंदिर बताया जाता है। इसकी दीवारों व खंभों पर 25 शिलालेख उत्कीर्ण हैं जो 7वीं से 10वीं शताब्दी के बीच बताए जाते हैं।

इसलिए भी मशहूर
स्थानीय पंडितों के अनुसार इस मंदिर में मनोकामना के लिए रूद्राभिषेक पाठ, कष्ट निवारण के लिए महामृत्युंज्य पाठ, व नवग्रह की शांति के नवग्रह पूजा होती है। एक ही स्थान पर इतनी पूजा होने के कारण बड़ी संख्या में लोग आते हैं। साथ ही दावा किया जाता है कि देश में महामृत्युंज्य का यही एकमात्र मंदिर है।

खास-खास
-जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी यहां भ्रमण किया था।
-तीन समय होती पूजा।
-5 मुख्य मंदिरों में 17वीं शताब्दी से पूजा-अर्चना हो रही है।
-मौसम, देखभाल के अभाव में कई मंदिर क्षतिग्रस्त हो चुके।
-मंदिर की पूजा-अर्चना,देखभाल ट्रस्ट की ओर से की जाती।
-मंदिरों के स्थापत्य पर बौध युग का प्रभाव नजर आता।
-राजस्थान के अलावा देश-विदेश से पूरे साल जाते शिव भक्त। सावन में विशेष माहौल रहता।

जयपुर. झोटवाड़ा स्थित कोनार्क एकेडमी के बच्चों ने स्वतंत्रता दिवस अनूठे अंदाज में सेलिब्रेट किया। बच्चों ने स्वतंत्रता दिवस से एक दिन पहले ही स्कूल के पास प्रांगण में पौधारोपण किया। बड़ी संख्या में पहुंचे बच्चों ने शिक्षिकाओं के सहयोग से पौधे लगाए। इस दौरान बच्चों के हाथों में हरियाली बढ़ाने संबंधी पोस्टर्स थे जिनके जरिए सभी को ग्रीनरी का महत्व समझया जा रहा था। स्कूल निदेशक प्रतिमा पटनायक ने इस अवसर पर हरियाली का महत्व समझाया। साथ ही सभी को पौधे लगाने के साथ उनके संरक्षण का भी संकलप्प दिलवाया।

 

 

Published On:
Aug, 27 2018 10:18 PM IST

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