विलुप्त होती काष्ठ कला

By: Moti ram

Published On:
Mar, 08 2015 09:59 PM IST

  • कांठल की थेवा कला के साथ ही वर्षों से ख्यात रही काष्ठकला अब विलुप्ति के कगार पर है। तकनीकी युग में अब ना तो इसके कद्रदान बचे हैं और ना ही सरकारी स्तर पर कोई विशेष सहायता। 
कांठल की थेवा कला के साथ ही वर्षों से ख्यात रही काष्ठकला अब विलुप्ति के कगार पर है। तकनीकी युग में अब ना तो इसके कद्रदान बचे हैं और ना ही सरकारी स्तर पर कोई विशेष सहायता। 

इससे काष्ठकला अब अपना अस्तित्व खोती जा रही है। रियासत काल से चली आ रही और आजादी के चार दशक तक लकड़ी की सुगमता के चलते ये व्यवसाय काफी फला। पिछले एक दशक से लकडिय़ों की कमी और तकनीकी युग के हावी होने के बाद ये कला गर्त में जाने लगी है। 
इससे जुड़े कारीगर अब भी इक्का-दुक्का ही रह गए हैं। यहां लकड़ी के अभाव में कई लोगों ने इस व्यवसाय को छोड़ दिया है। कई कारीगरों ने तो यहां से पलायन कर दिया है। वहीं कई लोगों ने इस व्यवसाय को छोड़ दिया है। इस कला को सरकारी स्तर पर संरक्षण की दरकार है।

समिति का गठन किया 
प्रतापगढ़ की काष्ठ कला को बचाए रखने और संरक्षण के लिए कुछ वर्षों पहले हस्त कला गृह उद्योग नाम से समिति का भी गठन किया था। इसके बाद सरकार की ओर से रुझान कम हो गया। इससे कागजों में ही रह गई है।

पेड़ कटाई पर रोक  
काष्ठकला में काम आने वाली लकड़ी पहले उपलब्ध कराईजाती थी। इसकी आड़ में अन्य पेड़ों की कटाई होती है। इसे देखते हुए जंगल में कटाई को देखते हुए इस पर रोक लगा दी है। इस संबंध में उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जाएगा। वैसे सरकार ही इस बारे में कुछ कर सकती है। 
डॉ. रामलाल विश्नोई,  उपवन संरक्षक, प्रतापगढ़ 

50 में से रहे 10
दो दशक पहले तक इस कला से जुड़े करीब पचास करीगर थे। जो अब दस ही रह गए हैं। इन कारीगरों की क्षेत्र में एक विशेष पहचान भी थी। समय के साथ काम कम हो गया। इससे कई करीगर तो यहां से पलायन कर गए, जबकि कई कारीगरों ने अन्य व्यवसाय को पकड़ लिया। जिसके फलस्वरूप अब गिनती के दस करीगर ही इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। काष्ठकला से जुड़े परिवारों के युवा वर्ग तो अब इस व्यवसाय से दूर हो गए हैं। 

कांठल की चौपड़ मारवाड़ तक मांग
काष्ठकला से जुड़ेे कारीगर कल्याण कुमावत ने बताया कि यहां बनने वाले  चौपड़ तो मारवाड़ तक खासी पहचान रखते हैं। इससे वहां इनकी मांग भी काफी रहती है। कुमावत का कहना है कि यहां से चौपड़ बनाकर वे उदयपुर भेजते हैं। उदयपुर से बीकानेर, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर आदि तक जाते हैं। इन स्थानों पर कांठल के चौपड़ की विशेष मांग रहती है। उदयपुर में एक व्यापारी इनसे चौपड़ बनवाता है। 

वन विभाग उपलब्ध कराता था लकड़ी 
यहां के कारीगरों के परिवारों को दो दशक पूर्व तक वन विभाग की ओर से लकड़ी उपलब्ध कराई जाती थी। लेकिन बाद में विभाग ने हाथ खिंच लिए। जिससे कारीगरों को यहां के जंगलों से लकड़ी मिलना मुश्किल हो गई। इसके बाद से कारीगरों का रुझान भी कम होता गया। इसके बाद  नतीजतन जिले से काष्ठ कला विलुप्त होती जा रही है। 

इनका होता निर्माण 
कांठल में बनी काष्ठ की वस्तुओं की दूर-दूर तक मांग रहती थी। इसमें खिलौने, बेलन-चकले, मूसल, डांडिया, वॉल लेम्प, चकरी, ऐश-ट्रे, गिलास, कृषि औजारों के हत्थे, पलंग, सौफे आदि के पाये और हत्थे बनाए जाते हैं। वैसे अब फर्निचर के पाये और डिजाइन के लिए गिल्लियां अधिक बनाईजाती है। ईश्वरलाल कुमावत ने बताया कि अब नई पीढ़ी तो इस कला को सीख ही नहीं रही है। 

Published On:
Mar, 08 2015 09:59 PM IST

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