मुहर्रम की मजलिसें और आलम ताजिया जलूस, खूनी मातम के साथ ताजिया सुपुर्दे खाक

By: Abhishek Gupta

Updated On: Sep, 21 2018 06:22 PM IST

 
  • इस बार गणेशोत्सव के साथ ही मुहर्रम की मजलिसें और आलम ताजिया जलूस भी चल रहे हैं, लेकिन धार्मिक एकता बरकार है।

फर्रुखाबाद. फर्रुखाबाद की गंगा जमुनी तहजीब में हर बार नई मिसाल कायम की जाती है। इस बार गणेशोत्सव के साथ ही मुहर्रम की मजलिसें और आलम ताजिया जलूस भी चल रहे हैं, लेकिन धार्मिक एकता बरकार है। मुस्लिम भाई आगे आकर गणेशोत्सव में अपनी हिस्सेदारी तय कर रहे हैं। आज शहर में खूनी मातम के साथ ताजिया सुपुर्दे खाक करने का जुलूस निकल रहा था। उसी समय शहर के मोहल्ला नूनहाई में किसी की शव यात्रा निकल रही थी, तो मातम कर रहे लोगों ने अपने जुलूस को रोककर शव यात्रा को पहले निकलने दिया।

मुहर्रम का चांद दिखाई देते ही शिया समुदाय गम में डूब गया। महिलाओं ने जेवर उतार कर सादा लिबास पहन लिया था। मजलिसों का दौर भी लोगों के घरों में शुरू हो गया था। मातमी जुलूस निकाल कर या हुसैन, हाय हुसैन की सदाएं बुलंद की गई। शहर के मोहल्ला घेरशामू खां, जीआईसी गली, बूरा वाली गली, घुमना, चौक, पक्का पुल, टाउन हाल से होता हुआ कर्बला पंहुचकर समाप्त हुआ। अजादारों ने नौहाख्वानी व मातम किया। या हुसैन, हाय हुसैन की सदाएं बुलंद कीं। मौलाना सदाकत हुसैन सैथली ने नवासा-ए-रसूल हजरत इमाम हुसैन की कर्बला में शहादत का वाक्या बयान किया।

मातम करने वाले ये पैग़ाम दे रहे थे कि इमाम हुसैन व उनके परिवारीजन व साथियों का जो ख़ून कर्बला में बहाया गया उनके लिये हमारा ये ख़ून नज़राना-ए-अकीदत के तौर पर हाज़िर है। नौहाख्वानी के ज़रिये कर्बला ज़ुल्म की दास्तान काव्यात्मक रूप में ब्यान की गई जिसे सुनकर जुलूस में शामिल अकीदतमंदों के अलावा सुनने वाले अन्य मज़हब के लोगों की भी आंखें नम हो गई। खूनी मातम से शहर की सड़कों पर खून ही खून दिखाई दे रहा था। वहीं तिकोना चौकी के पास बच्चों के सिर पर चाकू से निशान लगाए गए। जो हुसैन के नबासे की याद में लगाये जाते हैं। खूनी मातम का समय सुबह से 12 बजे तक का रखा गया था, क्योंकि गणेश विसर्जन भी पुलिस को कराना था। जब तक जुलूस कर्बला की तरफ नहीं पहुंच गया, तबतक कोई भी विसर्जन यात्रा शुरू नहीं कराई गई थी।

Published On:
Sep, 21 2018 06:22 PM IST

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