तीन पीढिय़ों से चला आ रहा झूलोत्सव में बिखर रही संस्कृति की छटा

By: Sanket Shrivastava

Published On:
Aug, 12 2019 11:59 PM IST

  • दयाशंकर श्रीवास्तव का जन्म 1905 में हुआ, तब उनके पिता वृंदावन लाल श्रीवास्तव ने भगवान श्रीराधा-कृष्ण के झूले अपने रहली स्थित निवास में पहली बार बिठाकर आयोजन की शुरूआत की।

दमोह. सन् 1857 की गदर के समय इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ से रानी बहू जो विधवा थी अपने एक बेटे रामसहाय को लेकर रहली में आकर बस गई थीं। वह अपने साथ भगवान श्रीराधा-कृष्ण के एक विग्रह लेकर आई थी। रामसहाय के पुत्र वृंदावन लाल श्रीवास्तव से दो पुत्र कामता प्रसाद श्रीवास्तव और दया शंकर श्रीवास्तव थे।
छोटे बेटे दयाशंकर श्रीवास्तव का जन्म 1905 में हुआ, तब उनके पिता वृंदावन लाल श्रीवास्तव ने भगवान श्रीराधा-कृष्ण के झूले अपने रहली स्थित निवास में पहली बार बिठाकर आयोजन की शुरूआत की। तब से ही श्रीवास्तव परिवार की यह परंपरा अनवरत् जारी है। वृन्दावन लाल एक अच्छे कलाकार थे भगवान का मंदिर उन्होंने लकड़ी का और कांच का अपने हाथ से ही बनाया था। भगवान का सिंहासन भी उन्हीं के हाथ का बनाया हुआ है। जो आज भी छटा बिखेर रहा है। मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1988 में हुआ जयपुर के मक्खन मिस्री द्वारा सीमेंट चूना उड़द बेल के मिश्रण से कांच लगाकर बनाया गया। परिवार वर्ष 1932 में दमोह आया और तब से यह परंपरा दमोह में प्रारंभ हो गई। पहले यह कार्यक्रम एक दिन का होता था, श्रावण पवित्रता एकादशी पर रामायण का पाठ होता था। लेकिन में कार्यक्रम तीन दिवस के हो गए जिसमें प्रथम दिवस रामायण का पाठ दूसरे दिन शास्त्रीय संगीत की महफि ल तीसरे दिन सुगम संगीत की महफि ल होने लगी। स्व. एड. अजीत श्रीवास्तव ने परंपरा को चार दिन का कर दिया और एक दिन साहित्यकारों का जमावड़ा भी श्रीराधा-कृष्ण के दरबार में होने लगा। स्थानीय तथा देश के और दमोह नामी-गिरामी शास्त्रीय व सुगम संगीत के कलाकार दामोदर राव पाठक, चंद्रकांत सोनवलकर, प्रभाकर सोनवलकर, प्राची करमरकर, सुनन्दो भट्टाचार्य, वर्षा वाड्डगे, सपना चिले, प्रदीप-नितिन अग्रवाल, धनंजय भट्ट, मनोहर सिंह, केशव हर्षे इस झूलोत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुके हैं। इनमें से कई तो राष्ट्रीय स्तर पर अपना नाम स्थापित करने में सफ ल रहे। साहित्यकार झुन्नीलाल वर्मा, दिनकर सोनवलकर, विजय वाते, नैय्यर दमोहीए, डॉ प्रेमलता नीलम, आसिफ अंजुम,रंगकर्मी राजीव अयाची ने वृन्दावन बिहारी लालजी को अपनी लेखनी समर्पित की है। आज भी हरियाली तीज से पडऩे वाले झूले रक्षाबंधन को खोले जाते हैं। श्रावण एकादशी से प्रारंभ धार्मिक, सांस्कृतिक, संगीत व साहित्यिक कार्यक्रम चार दिन तक लगातार चलते हैं। जिसमें दमोह का हर वर्ग हिस्सेदारी करता है। लोग आते हैं भगवान के दर्शन कर अपनी विशिष्टता का प्रदर्शन करते हैं। आज एक सौ चौदह वर्ष बाद भी यह परंपरा श्रीवास्तव परिवार के वंशज अनुनय श्रीवास्तव बरकरार रखे हुए हैं। यह झूलोत्सव दमोह शहर की एक सांस्कृतिक धरोहर है। जिसे हर कोई संजोकर रखने के लिए आज भी लगातार सहयोग कर इसे जिले के बड़े समारोहों में इसे देखता है।

 

Published On:
Aug, 12 2019 11:59 PM IST

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