सीमित धरा पर बढ़ता जनभार, संकट में जीवन का आधार

By: Nilesh Kumar Kathed

Published On:
Jul, 11 2019 12:44 PM IST


  • चित्तौड़ शहर की बीस सालों में करीब 65 फीसदी बढ़ गई आबादी
    समाप्त हो रही वनभूमि, खतरे में पर्यावरण

    जनसंख्या का भार बढ़ता जा रहा , प्राकृतिक संसाधन संकट में


चित्तौैडग़ढ़. दुनिया में वीरभूमि के रूप में पहचानी जाने वाली चित्तौडग़ढ़ शहर की धरा वहीं है लेकिन उस पर रहने वाले जनसंख्या का भार बढ़ता जा रहा है। इसके चलते प्राकृतिक संसाधन संकट में है। वन व कृषि क्षेत्र आवासीय भूमि में तब्दील हो रहा है तो पेड़ कटने से पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है। कभी दुर्ग के परकोटे में सिमटा हुआ चित्तौड़ शहर अब गंभीरी नदी की पुलिया की सीमा पार करते हुए क्रंकीट के जंगल में बदल चुका है। शहर का एक हिस्सा सेगवा-बोजुन्दा गांव तक पहुंच रहा है तो दूसरा हिस्सा पुठौली व नरपत की खेड़ी की सीमा में पहुंच रहा है। दुर्ग के पीछे के क्षेत्र घटियावाली तक सूरजपोल तक शहर की बस्तियां आबाद हो रही है। करीब ४१.८ वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले चित्तौड़ शहर की आबादी गत दो दशक में तेजी से बढ़ी है। इस अवधि में शहर की आबादी करीब ६५ फीसदी तक बढ़ गई। शहर की आबादी १९९१ में ७१ हजार ५६९ थी जो बीस वर्ष बाद २०११ में १ लाख १६ हजार ४०४ तक पहुंच गई। अनुमान है कि वर्तमान में शहर की आबादी करीब एक लाख ३० हजार तक हो चुकी है। जनसंख्या घनत्व भी प्रति वर्ग किलोमीटर २ हजार ७८८ तक पहुंच गया है। सीमित धरती पर बढ़ते जनसंख्या भार का सीधा असर विकास पर हो रहा है। कृषि भूमि सीमित हो रही है तो विकास के नाम पर क्रंकीट के जंगल खड़े करने से पेड़ भी कटते जा रहे है। ऐसे में जल संकट से लेकर खाद्यान्न तक का संकट सामने आ रहा है।
क्यों हुआ शहर में आबादी विस्तार
चित्तौड़ शहर की आबादी तेजी से बढऩे के पीछे मुख्य कारण बढ़ता औद्योगिकीकरण है। गत दो दशक में शहर के आसपास कई औद्योगिक इकाईयां स्थापित हुई है। ऐसे में उनमें हजारों लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त होने से देश के विभिन्न क्षेत्रों से यहां लोगों का बसने के लिए पहुंचना शुरू हो गया। मार्बल उद्योग में बड़ी संख्या में रोजगार सृजन होने से भी शहर में जनसंख्या विस्तार तेजी से हुआ।
कृषि भूमि बदल गई आवासीय में
पिछले दो दशक में आबाद शहर की कई बस्तियां ऐसी भूमि पर बसी हुई जो पहले कृषि के काम आती थी। खेती की जमीन पर क्रंकीट के मकान खड़े कर देने से खाद्यान्न व सब्जी उत्पादन पर भी अप्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव पड़ा। सीमित धरा पर बढ़ते आबादी के भार का दुष्प्रभाव ये हुआा है कि शहर में कुछ वर्षो पहले जिन क्षेत्रों में कृषि भूमि थी उसे आवासीय एवं व्यवसायिक में रूपान्तरित कराया जा रहा है।
विकास के नाम चढ़ा दी पेड़ो की बली
कॉलोनियों में रोड विस्तार, शहर की सड़कों चौड़ा करने आदि के नाम पर भी पेड़ो की बलि चढ़ी। पेड़ो को काट देने का दुष्प्रभाव शहर के पर्यावरण पर भी पड़ा। सीमित धरा पर भी खण्ड वृष्टि के हालात बनने के पीछे इसी तरह के कारण जिम्मेदार माने जाते है। शहर में तेजी से बढ़ी आबादी के कारण बसी नई कॉलोनियों में कृषि भूमि समाहित होने के साथ हजारों वृक्षों को भी काटा गया।
दो दशक में दोगुणा हो गए वार्ड
शहर में बढ़ती जनसंख्या के कारण नगर का क्षेत्रफल भले सीमित हो लेकिन आबादी का भार बढ़ता जा रहा है। इसके चलते वार्डो की संख्या निरन्तर बढ़ रही है। शहर में दो दशक पहले करीब 30 वार्ड थे जो बाद में बढ़कर 35 हो गए। वर्ष 2014 में वार्ड संख्या 45 पहुंची एवं इसके बाद अब हाल ही नगर परिषद सीमा में 60 वार्ड मान पुनर्सींमाकन किया गया है।
बीस वर्ष में किस तरह बढ़ गई चित्तौड़ शहर की आबादी
वर्ष आबादी
1991 71569
2001 96219
2011 116406
स्रोत: जनगणना के आंकड़े

Published On:
Jul, 11 2019 12:44 PM IST

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