क्षमापना पराये को भी बना देती है अपना

By: Ritesh Ranjan

Published On:
Sep, 12 2018 01:13 PM IST

  • पुत्र यदि दुराचारी है तो यह मां का दोष है, पुत्र यदि मूर्ख है तो पिता का दोष है, पुत्र यदि कंजूस है तो वंश का दोष है और पुत्र यदि दरिद्र है तो यह स्वयं पुत्र का ही दोष है। पर्यूषण पर्व क्षमापना पर्व के नाम से जाना जाता है। क्षमापना पराये को भी अपना बना देती है।

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा प्रभु महावीर मातृ भक्त थे, माता-पिता का अपने प्रति मोह देखकर मां के गर्भ में ही वीर ने संकल्प लिया कि माता-पिता की हाजिरी में, मैं संयम अंगीकार नहीं करूंगा। सिद्धार्थ राजा के यहां प्रभु वीर का जन्म होते ही धन-धान्य आदि की वृद्धि होने से माता-माता ने प्रभु वीर का नाम वर्द्धमान रखा।प्रभु वीर का साहस भी अद्भुत था, इंद्र का संशय मिटाने के लिए एक अंगूठे मात्र से मेरू पर्वत को कंपायमान कर दिया था, प्रभु चरण का स्पर्श पाकर मेरु पर्वत भी अपने आप को धन्य मानने लगा। आमलकी क्रीड़ा करते हुए बाल्यावस्था में ही राक्षस बनकर आए क्रूर देव को परास्त करके अपने मित्रों के समक्ष अपनी शूरवीरता एवं दीक्षा के बाद भिक्षा के लिए आए ब्राह्मण को अपना देवरूप प्रदान कर अपनी दानवीरता का परिचय दिया। तपस्या के साथ अनेकों उपसर्ग सहन करके प्रभु तपवीर भी बने। अपनी ज्ञानवीरता के प्रभाव से अपने ही अध्यापक का संशय दूर किया। अपनी संतान को सशक्त बनाने के लिए पांच वर्ष तक पुत्र का लालन-पालन करना चाहिए, जब दस वर्ष का हो जाए तो उसे नियंत्रण में रखना चाहिए तथा जब वह सोलह साल का हो जाए,तब उसके साथ मित्र जैसा बर्ताव करना चाहिए। जिस तरह हंसों की सभा में बगुले शोभायमान नहीं होते, वैसे ही विद्वानों की सभा में मूर्ख शोभायमान नहीं पाते। इसलिए वे माता-पिता वैरी और शत्रु हैं, जो अपनी संतान को सुसंस्कारों की शिक्षा से सुशिक्षित नहीं करते। पुत्र यदि दुराचारी है तो यह मां का दोष है, पुत्र यदि मूर्ख है तो पिता का दोष है, पुत्र यदि कंजूस है तो वंश का दोष है और पुत्र यदि दरिद्र है तो यह स्वयं पुत्र का ही दोष है। पर्यूषण पर्व क्षमापना पर्व के नाम से जाना जाता है। क्षमापना पराये को भी अपना बना देती है।
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शुभ चिंतन से होता है हर समस्या का समाधान
चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि आत्मा में प्रशम गुण नहीं आता तब तक मोक्षगुण और परम सुख का अनुभव नहीं हो सकता। सम्यक दृष्टि, ज्ञानी, ध्यानी और तपस्वी भी उस सुख का अनुभव नहीं ले सकते जिस सुख का अनुभव शांत आत्मा ही कर सकती है। शम का अर्थ है शांत और प्रशम का अर्थ है विशेष शांत। कषाय ,तृष्णा, लालसा से मन में उद्वेग उत्पन्न होता है। भावों में उग्रता, उत्तेजना और चंचलता आती है और जब तक यह उत्तेजना बनी रहती है तब तक शांति नहीं मिलती। जिसका मन अंशात होता है उसे संगीत, भोजन, मान-सम्मान और दूसरे कामें में सुख का अनुभव नहीं होता। नीचे चूल्हे की जलती आग से ऊपर शीतलता कैसे आ सकती है। प्रशम भाव आने से जो आत्मिक सुख और आनंद प्राप्त होता है वो ज्ञान ध्यान से भी श्रेष्ठ है। सबसे पहले प्रशम की ही साधना करना चाहिए। साध्वी स्नेह प्रभा ने ब्रह्मचर्य का महत्व बताते हुए कहा कि ये तपों में सर्वश्रेष्ठ तप है। ब्रह्मचर्य की साधना बिना किसी मजबूरी से नहीं बल्कि आत्मबल की दृढ़ता से की जाए तो कई लब्धियां और सिद्धियां प्राप्त होती हैं क्योंकि इसका पालन करना दुष्कर है। इंद्रियों के समूह और मन को शांत रखना ही ब्रह्मचर्य कहलाता है । मात्र एक ब्रह्मचर्य के नष्ट होने से ही सभी गुण जैसे उत्तम तप, ज्ञान, दर्शन, चारित्र, सम्यकत्व और विनय सब नष्ट हो जाते हैं। जो विषय वासना के प्रवाह को नहीं तैर पाते वो संसार के प्रवाह को तैर कर मोक्ष रूपी किनारे पर नहीं पहुंच पाते।

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Sep, 12 2018 01:13 PM IST