लिवर पर हेपेटाइटिस-बी का हमला

By: मुकेश शर्मा

|

Published: 24 Jun 2018, 05:16 AM IST

तन-मन

लक्षण कैसे सामने आते हैं?

बुखार, थकान, भूख न लगना, उल्टी, पेटदर्द, काले रंग का मल-मूत्र, जोड़ों का दर्द, पीलिया जैसी समस्याएं होती हैं।
लक्षणों के अलावा पुष्टि कैसे होती है?

रक्त की जांच से पहचान की जाती है।

क्या रोगग्रस्त व्यक्ति स्वस्थ दिखता है?

कुछ मरीज ऐसे भी होते हैं जिन्हें तुरंत लक्षण महसूस नहीं होते और वे बाहर से स्वस्थ दिखते हैं। ऐसे मरीज अनजाने में खुद के साथ दूसरों में संक्रमण फैला सकते हैं। लंबे समय से पीडि़त मरीज को तो लक्षण महसूस होते रहते हैं जैसे पेट में पानी भरने, खून की उल्टियां, वजन घटने, भूख न लगने या किसी अन्य परेशानी में ली जाने वाली दवा से अचानक पीलिया होकर लिवर फेल होने की समस्या भी हो सकती है। कई बार हेपेटाइटिस-बी वायरस का संक्रमण इतना तीव्र होता है कि व्यक्ति को संक्रमण होते ही पीलिया की शिकायत हो सकती है।

हेपेटाइटिस-बी की पहचान देरी से होने पर कैसी जटिलताएं होती हैं?

रोग कुछ दिनों का भी होता है जिसका समय रहते इलाज संभव है लेकिन यदि लंबे समय से लिवर में सूजन हो तो १५-२० प्रतिशत मरीजों को लिवर सिरोसिस की समस्या भी हो सकती है जिसका सिर्फ प्रत्यारोपण ही इलाज है। इसके बाद मरीज सामान्य जीवन जी सकता है। लेकिन जिन्हें सिरोसिस की परेशानी हो जाए तो उनमें लिवर कैंसर की आशंका भी रहती है। हेपेटाइटिस-बी के एेसे मरीज जो शराब के आदी हैं उन्हंे सिरोसिस जल्दी हो सकता है।

क्या रोग को रोका जा सकता है?

हां, सही व सरल तरीका है हेपेटइटिस-बी वैक्सीन। बच्चे को अन्य टीकाकरण के साथ हेपेटाइटिस-बी का टीका जन्म के बाद, डेढ़, ढाई व साढ़े तीन माह तक लगाया जाता है। बड़ों को टीके १-१ माह के अंतराल में तीन बार लगते हैं। महिलाओं में यदि हेपेटाइटिस-बी पॉजिटिव आता है तो उसे गर्भधारण के पहले या प्रसव के बाद ही यह लगाते हैं वर्ना गर्भावस्था के दौरान स्थिति गंभीर होने का डर रहता है।

संक्रमण होने से बचाएगी सावधानी

हेपेटाइटिस-बी के बढ़ते संक्रमण में चीन के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। अब तक लगभग ४ करोड़ लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। इससे बचाव के लिए किसी भी अस्पताल में इलाज से पहले जांचें कि वहां सफाई हो व प्रयोग में ली जा रही सुई नई हो।

रक्त चढ़वाने से पहले सुनिश्चित करें कि रक्त कहीं संक्रमित तो नहीं? पुरुष शेविंग के लिए नए रेजर या ब्लेड का इस्तेमाल करें व यदि बाहर शेविंग कराते हैं तो वहां भी नए या डिस्पोजेबल रेजर का प्रयोग करें। यदि दांत से जुड़े किसी भी रोग का इलाज ले रहे हैं तो औजार-उपकरण साफ व जीवाणुरहित हों।

क्या है इलाज?

जिन्हंे हाल ही संक्रमण हुआ हो उनका इंजेक्शन और दवा से इलाज होता है। सालभर चले इस इलाज में मरीज के लिवर की स्थिति के अनुसार ही हफ्ते में एक इंजेक्शन लगाया जाता है। जो लोग लंबे समय से पीडि़त हैं उन्हंे संक्रमण की गंभीरता के आधार पर दवाएं देते हैं। एेसे लोग हेपेटाइटिस-बी नेगेटिव आए उन्हें वैक्सीनेशन के बाद हर पांच साल मंे इंजेक्शन लगाए जाते हैं।

कैसे फैलता है वायरस

किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में जब हेपेटाइटिस-बी से संक्रमित रक्त, वीर्य या कोई तरल प्रवेश कर जाए तो यह रोग होता है। निम्न तरीकों से इसका संक्रमण फैल सकता है-


जन्म के दौरान बच्चे को संक्रमित मां से।

संक्रमित रेजर, टूथब्रश, सुई, इंजेक्शन या संक्रमित इंजेक्शन का एक से ज्यादा लोगों के प्रयोग करने से।
संक्रमित व्यक्ति के खून या खुले घाव के सीधे सम्पर्क में आने से।
रोगग्रस्त व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाए जाने से।

हफ्तों से ताउम्र असर

हेपेटाइटिस-बी वायरस के संक्रमण से लिवर में सूजन की परेशानी होती है। यह कुछ हफ्तों से लेकर महीनों, वर्षों तक या ताउम्र रह सकती है। असाध्य होने पर सिरोसिस हो सकता है।

किन्हें लगता है टीका?

१९ वर्ष से कम आयुवर्ग के युवाओं व बच्चों को।
ऐसा व्यक्ति जिसका साझेदार इस रोग से ग्रस्त हो।
ऐसे लोग जो इंजेक्शन (मेडिकल उपकरणों से भी) दवा लेते हों, सिरिंज शेयर करते हों।
संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में रहने वाले।
अस्पताल में मौजूद डॉक्टर, नर्स, व अन्य मेडिकल स्टाफ।
हीमोडायलिसिस रोगी।

टीका सुरक्षित है या नहीं?

भारत में अब तक लगभग दस करोड़ लोग टीके लगवा चुके हैं। इस वैक्सीन से किसी प्रकार का दुष्प्रभाव या एलर्जी नहीं होती। लेकिन जिन्हें खमीर से एलर्जी है या पहले किसी टीके से एलर्जी की दिक्कत हो चुकी है तो उन्हें टीका लगवाने से पहले डॉक्टर से सलाह ले लेनी चाहिए।

वैसे विशेषज्ञ खून की जांच के बाद ही टीके को लगाते हैं। वैक्सीन रोग से लडऩे के लिए शरीर मंे एंटीबॉडीज का निर्माण करती है जिससे कुछ लोगों में दो-तीन दिन तक हल्का बुखार, हाथ-पैरों में दर्द व नाक बंद होने की समस्या हो सकती है।


जांच कैसे होती है?


हेपेटाइटिस-बी मरीजों की रक्त जांच व लिवर फंक्शन टैस्ट किया जाता है ताकि संक्रमण की गंभीरता व कितना लिवर क्षतिग्रस्त हुआ, पता चल सके। टैस्ट पॉजिटिव आने पर और कई जांचें होती हैं।

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।