MP में अब पार्षद चुनेंगे महापौर और नगर पालिका-नगर परिषद अध्यक्ष!

By: Deepesh Tiwari

Published On:
Aug, 13 2019 03:18 PM IST

  • मंत्रिमंडल cabinet की उप समिति ने सुझाए संशोधन...

भोपाल@अरुण तिवारी की रिपोर्ट...

नगरीय निकाय चुनाव में इस बार कांग्रेस सरकार बड़ा बदलाव करने की चर्चा इस समय राजनैतिक गलियारों में जोर पकड़ती दिख रही है। इसके पीछे की वजह ज्यादा से ज्यादा नगरीय निकायों में कांग्रेस के कब्जा करने की मंशा को बताया जाता है। इसके तहत कमलनाथ मंत्रिमंडल की उप समिति ने नगर पालिक निगम और नगर पालिका अधिनियम में कुछ संशोधन भी सुझाए हैं।

इसके तहत सबसे बड़ा बदलाव महापौर और नगर पालिका-नगर परिषद के अध्यक्ष को चुनने में होगा। इन दोनों को अब तक जनता सीधे चुन रही थी, लेकिन समिति का सुझाव है कि महापौर और अध्यक्ष पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से कराया जाए।

इस संबंध में कांग्रेस के संगठन प्रभारी चंद्रप्रभाष शेखर ने कहा है कि हमने सरकार को इस मामले में प्रस्ताव दिया था कि अब पार्षद ही महापौर और नगर पालिका-नगर परिषद अध्यक्ष का चयन करें।

कांग्रेस के संगठन प्रभारी के अनुसार मुख्य कारण ये है कि सभी जगहें का पूर्ण विकास हो, क्योंकि जब महापौर आदि विधायक बन जाते हैं तो वे केवल अपने क्षेत्र का ही विकास करते हैं। जबकि अन्य क्षेत्र विकास की दौड़ में ऐसा करने से पिछड़ जाते हैं।

सूत्रों के अनुसार इसके अलावा दो बड़े बदलावों पर भी सहमति बन गई है। जिन्हें राज्य सरकार अध्यादेश लाकर लागू करेगी। समिति द्वारा मंशा मुख्यमंत्री कमलनाथ को बता दिए जाने के बाद अब आखिरी फैसला मुख्यमंत्री करेंगे।

वहीं इस संबंध में मंत्रीमंडल उपसमिति के अध्यक्ष सज्जन सिंह वर्मा का कहना है कि अधिनियम में संशोधन के लिए बनी कमेटी महापौर का चुनाव सीधे कराने समेत कई बातों पर विचार कर रही है। इस मामले में जल्द ही अंतिम निर्णय लेकर संशोधन कर दिया जाएगा।

जबकि मंत्रीमंडल उपसमिति के सदस्य प्रियव्रत सिंह के अनुसार महापौर का चुनाव पार्षदों के जरिए होने से आपस में कनेक्ट बना रहेगा। वर्ना अभी महापौर अलग चुनाव लड़ता है और पार्षद अलग। ऐसे में दोनों का आपस में कनेक्ट नहीं रहता है जिससे शहर का विकास प्रभावित होता है। इसके अलावा चुनाव पार्टी सिंबल के बजाय व्यक्ति आधारित होना चाहिए।

ये बताए जाते हैं कारण : reason behind the change ...
दरअसल मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय चुनाव इस साल के अंत तक होने हैं। ऐसे में अभी 16 नगर निगम के महापौर समेत अधिकांश नगर पालिका और नगर परिषद पर भाजपा के अध्यक्ष हैं, लेकिन चर्चा है कि प्रदेश में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस इन निकायों पर अपना कब्जा चाहती है।

इसी मकसद से अधिनियम में संशोधन के लिए सीएम कमलनाथ ने मंत्रीमंडल की उप समिति का गठन किया है। अब समिति से मिले प्रस्तावों को कैबिनेट की बैठक में लाया जाएगा। इसके बाद अध्यादेश भी लाया जाएगा।

ये हैं संशोधन और इसकी कारण: Amendment and its reason
: इस संशोधन के अनुसार महापौर और अध्यक्षों का चुनाव डायरेक्ट न होकर पार्षद करें।

कारण : बताया जाता है कि मंत्रियों की बैठक में बात आई कि यदि तय समय पर नगरीय निकाय चुनाव हुए तो कांग्रेस ज्यादातर सीटों पर हारेगी। महापौर और अध्यक्षों का चुनाव जनता करती है तो इसका फायदा भाजपा को मिल जाएगा।

: इस संशोधन के तहत पार्टी सिंबल के बजाय जिला पंचायत की तर्ज पर चुनाव हों।

कारण : इस मामले में भी कांग्रेस का मानना है कि प्रदेश में अभी सरकार बने कुछ महीने ही हुए हैं और इस दौरान कोई बड़ी उपलब्धि जनता के बीच नहीं गई है। ऐसे में यदि चुनाव बिना सिंबल के होते हैं तो इसका फायदा कांग्रेस को ज्यादा मिलेगा।

: वहीं आखरी व तीसरा संशोधन के अनुसार परिसीमन चुनाव के छह महीने पहले न होकर सिर्फ दो महीने पहले हो।

कारण : कहा जा रहा है कि कांग्रेस सरकार का मानना है कि छह महीने का वक्त लंबा होता है। ऐसे में सरकार जैसे ही कोई अच्छा काम कर जनता में अपनी छवि बनाती है तो उसके दो महीने के अंदर चुनाव कराकर इसका फायदा चुनाव में ले लिया जाए।

मतदाता सूची पुनरीक्षण का काम रोका,टल सकते हैं चुनाव: Elections can be postponed ...
सूत्रों के मुताबिक नगरीय निकाय चुनावों को राज्य सरकार ने फिलहाल टालने का मन बना लिया है। अब तक यह चुनाव नवंबर-दिसंबर में प्रस्तावित थे।

दरअसल, परिषद की पहली बैठक से नगर निगम या नगर पालिका-परिषद के कार्यकाल की गणना की जाती है। वहीं ज्यादातर निकायों की पहली बैठक फरवरी 2015 में शुरू हुई थी। ऐसे में इसका कार्यकाल भी उसी आधार पर माने जाने के चलते माना जा रहा है कि सरकार कुछ महीने चुनाव टालेगी।

मध्यप्रदेश में करीब 327 नगरीय निकायों में चुनाव होना है। वार्डों का परिसीमन और आरक्षण जिला कलेक्टर को करना था। जबकि महापौर-नगर पालिका अध्यक्ष का आरक्षण राज्य स्तर पर होना है। यह काम फिलहाल स्र्क गया है। वहीं राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता पुनरीक्षण का काम भी फिलहाल टाल दिया है।

इधर, कांग्रेस विधायक-मंत्रियों पर लागू होगा कोड ऑफ कंडक्ट : code of condect for congress ...
वहीं मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री और विधायकों पर संगठन का कोड ऑफ कंडक्ट लागू होगा। पार्टी को लोकसभा चुनाव की करारी हार से उबारने और लोगों के बीच कांग्रेस का भरोसा नए सिरे से बढ़ाने के लिए एआइसीसी चुने हुए जनप्रतिनिधियों के लिए आचार संहिता तैयार कर रही है।

इसके तहत विधायकों को न केवल जनता का विश्वास जीतना होगा, बल्कि उनके बीच जनप्रिय नेता की छवि भी बनानी होगी। पार्टी का मानना है कि जनप्रतिनिधि जनता के बीच चुनकर आते हैं, लोगों में उनका प्रभाव रहता इसीलिए इसकी शुरुआत विधायकों से की जा रही है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी इस कोड ऑफ कंडक्ट को कांग्रेस शासित सभी राज्यों में लागू करने जा रही हैं।

विधानसभा और लोकसभा चुनाव में हारे हुए नेताओं को भी क्षेत्र में सक्रिय रहने के लिए कहा जा रहा है। हारे उम्मीदवार भी जनता के बीच में विधायकों की तरह सक्रिय रहेंगे। जनता के कामों को सरकार के जरिए पूरे भी करवाएंगे। यदि सरकार में उनकी बात नहीं सुनी जाएगी तो वे इसकी शिकायत सीधे एआइसीसी को कर सकते हैं।

Published On:
Aug, 13 2019 03:18 PM IST

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