'Crack' से दक्षिण के सिनेमाघरों में लौटी रौनक, हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री के लिए भी अच्छे संकेत

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Published: 12 Jan 2021, 11:38 PM IST

  • तेलुगु सिनेमा के सितारे रवि तेजा की फिल्म देखने उमड़ी भीड़
  • 'मास्टर' की एडवांस बुकिंग ने भी बढ़ाई चेहरों की चमक
  • उत्तर भारत में अब भी साल की पहली हिट का इंतजार

-दिनेश ठाकुर
धर्मेंद्र की 'बहारें फिर भी आएंगी' में कैफी आजमी ने हौसले से भरपूर गीत रचा था- 'बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं खाली/ बहारें फिर भी आती हैं, बहारें फिर भी आएंगी।' यही हौसला साहिर लुधियानवी के गीत में झिलमिलाता है, जो 'सोने की चिडिय़ा' के लिए लिखा गया था- 'रातभर का है मेहमां अंधेरा/ किसके रोके रुका है सवेरा।' इसी सिलसिले में मंजूर हाशमी का शेर भी काबिले-गौर है- 'शाखें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएंगे/ ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएंगे।' नए साल में भारतीय सिनेमा के अच्छे दिनों की आहट सुनाई देने लगी है। दक्षिण से खबरें आ रही हैं कि तेलुगु सिनेमा के सितारे रवि तेजा की नई फिल्म 'क्रेक' के साथ तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के सिनेमाघरों में अर्से बाद रौनक लौट आई है। हालांकि सिनेमाघरों में 50 फीसद दर्शकों के साथ शो की इजाजत है। नौ जनवरी को सिनेमाघरों में उतरी यह एक्शन फिल्म अच्छी भीड़ खींच रही है।

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'मास्टर' 13 को सिनेमाघरों में
रजनीकांत के बाद तमिल सिनेमा के सबसे महंगे सितारे विजय की 'मास्टर' की एडवांस बुकिंग ने भी फिल्म कारोबार से जुड़े लोगों के चेहरों की चमक बढ़ा दी है। यह फिल्म 13 जनवरी को सिनेमाघरों में पहुंचेगी। पड़ोसी राज्यों के सिनेमाघरों में लौटी बहार को देखते हुए केरल में दस महीने से बंद सिनेमाघर भी 13 जनवरी से खुल रहे हैं।

दक्षिण से मिला बड़ा संकेत
दक्षिण की फिल्मी चहल-पहल से थोड़ी-बहुत ऑक्सीजन हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री को भी मिली है। हालांकि उत्तर भारत के कुछ राज्यों में सिनेमाघर अब भी बंद हैं। जहां 15 अक्टूबर से खुल गए थे, वहां अब तक वैसी चहल-पहल नजर नहीं आई, जैसी इन दिनों दक्षिण में है। दक्षिण से सबसे बड़ा संकेत यह मिला है कि कोरोना काल में भी लोग घरों से निकल कर सिनेमाघर पहुंच सकते हैं, बशर्ते फिल्म में दम-खम हो। कोरोना काल में ओटीटी प्लेटफॉर्म सिनेमाघरों के लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। लेकिन इस नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगा कि लोग सिनेमाघरों में जाना बंद कर देंगे। अस्सी के दशक में वीडियो के आगमन पर भी इसी तरह की आशंका जताई गई थी। सिनेमाघरों की सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। अंधेरे में 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' होते हुए फिल्म देखने का अलग आनंद है। यह सिनेमाघरों की माया को बरकरार रखेगा।

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कमजोर फिल्में नहीं करेंगी करिश्मा
उत्तर भारत में जहां-जहां सिनेमाघर खुले हैं, वहां पिछले तीन महीनों में अगर कोई फिल्म नहीं चली, तो इसके लिए कोरोना काल कम, फिल्मों का हुलिया ज्यादा जिम्मेदार है। 'शकीला' और '12 ओ क्लॉक' जैसी कमजोर फिल्मों से करिश्मे की उम्मीद का कोई आधार नजर नहीं आता। यह फिल्में जब भी आतीं, इनका यही हश्र होता।