भारत में टिड्डी,साइबेरिया में गर्मी और अमरीका में सहारा की धूल के पीछे ये है बड़ी वजह

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Updated: 06 Jul 2020, 12:12 AM IST

-क्या लॉकडाउन के दौरान कार्बन उत्सर्जन में कमी एक भ्रम था
-लॉकडाउन में कार्बन डाइ ऑक्साइड का स्तर तीस वर्षों में सबसे ज्यादा ( Carbon dioxide levels in lockdown are highest in thirty years)
26 से 82 सेंटीमीटर तक समुद्रों का जलस्तर बढ़ सकता है सदी के अंत तक (The sea level can rise from 26 to 82 cm by the end of the century)
8046 किलोमीटर दूर सहारा से अमरीका पहुंचा धूल का गुबार अटलांटिक की वायु प्रणाली के कारण

जयपुर. कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन के दौरान व्यापार, कारखाने और यात्राएं बंद रहने से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एतिहासिक गिरावट दर्ज की गई। कई स्थानों पर पर्यावरण में फर्क साफ नजर आया। यातायात के भार से मुक्त शहरों में स्मॉग गायब था तो कचरा घटने से नदियां साफ हो गईं। लेकिन प्रकृति के सुधरने की ये विलक्षण दृष्टि क्या सिर्फ भ्रम था? पिछले महीने वाशिंगटन पोस्ट की एक रिपोर्ट में बताया गया कि लॉकडाउन के दौरान कार्बन डाइ ऑक्साइड का स्तर मानव इतिहास में सबसे अधिक रहा, संभवत: तीस लाख वर्षों में सबसे अधिक। ये मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन इस ग्रह को संकट में डालने के लिए पर्याप्त हैं।

क्या प्रकृति के ये संकेत किसी और आपदा की ओर इशारा कर रहे हैं? पिछले कुछ दिन की सुर्खियों पर गौर करें तो चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। मसलन सहारा के रेगिस्तान से विशाल धूल का गुबार अटलांटिक महासागर को पार कर 8046 किलोमीटर दूर प्यूर्टोरिको और फिर उत्तरी अमरीका के आसमान में छा गया, जिससे श्वास रोग के संक्रमण का गंभीर खतरा पैदा हो गया। वैसे तो यह एक सामान्य घटना थी, लेकिन वैज्ञानिक उ. अफ्रीका में जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न सूखे को इसकी वजह मान रहे हैं।

चक्रवातीय प्रणाली के कारण ही बढ़ रहा टिड्डियों का प्रकोप
पिछले दिनों पूर्वी अफ्रीका के देशों में फसलें चौपट करने के बाद टिड्डियों का झुंड दक्षिण में फसलों पर कहर बनकर टूटा। भारत के कई हिस्सों में भी टिड्डियों ने कहर मचाया। वैज्ञानिक टिड्डियों की उत्पत्ति का कारण हिंद महासागर के बढ़ते तापमान को मानते हैं। जिससे तैयार होने वाला मानसून और चक्रवातीय पैटर्न टिड्डियों के प्रजनन की मूल वजह है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्लूएमओ) के अनुसार शुष्क क्षेत्रों में टिड्डियां ज्यादा पनपती हैं।

...तो डूब जाएंगे दुनिया के कई शहर

उधर विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक अफ्रीका में वर्ष के अंत तक 8.5 बिलियन डॉलर का नुकसान हो सकता है। हालांकि भारत में टिड्डियों के हमले से पहले फसलों को समेट लिया गया था। जून के शुरू में साइबेरिया में रेकॉर्ड गर्मी बढ़ी, जिससे आर्कटिक क्षेत्र के पीटलैंड के जंगलों में आग धधक उठी। आर्कटिक, उस अनुमान से भी तेज गति से गर्म हो रहा है, जितना कार्बन डाइ ऑक्साइड व ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि के कारण सोचा था। दुनिया की कुल ऑक्सीजन का 22 फीसदी देने वाले अमेजन के वर्षावन, जिन्हें पृथ्वी के फेफड़े कहा जाता है, में भी वैज्ञानिकों ने पिछले वर्ष की तुलना में और भीषण आग की आशंका जताई है। फिर महामारी के कारण ब्राजील के अधिकारी अमेजन क्षेत्र में खननकर्ता और किसानों की ओर से अवैध रूप से किए जाने वाले विस्फोटों को रोकने में सक्षम नहीं है, जो जलवायु बदलाव का बड़ा कारक है।

रेकॉर्ड स्तर पर जा पहुंचा कार्बन डाइ ऑक्साइड का स्तर
417.2 पीपीएम (पार्ट पर मिलियन) पहुंच गई मई में कार्बनडाइ ऑक्साइड की दर। पिछले वर्ष से 2.4 ज्यादा। हवाई की मोना लोआ ऑब्जर्वेटरी के मुताबिक यह स्तर पिछले 30 लाख वर्षों में सर्वाधिक है। जबकि लॉकडाउन के दौरान कारखाने और गाडिय़ां बंद होने से ग्रीन हाउस गैसों में गिरावट आई।