Doctor's Day Special: मेडिकल कॉलेज में छात्राएं ज्यादा, लेकिन डॉक्टर कम ही बनतीं

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Published: 01 Jul 2020, 01:45 PM IST

बीते कुछ सालों में भारत में डॉक्टर बनने की लालसा लिए छात्राएं प्रवेश तो लेती हें लेकिन बहुत कम इस पेशे का अपना पाती हैं

भारत में स्वास्थ्य सेवाओं के साथ ही चिकित्स्कों की भी ज़बरदस्त कमी है। आज भले ही डॉक्टर्स डे हो लेकिन स्त्री पुरुष का भेदभाव यहां भी काम नहीं है। बात करें देश की तो हाल ही प्रकाशित 'भारत में स्वास्थ्य के लिए मानव संसाधन' नामक एक पत्र के अनुसार, देश में मौजूद सभी एलोपैथिक डॉक्टरों में से केवल 17 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 6 प्रतिशत डॉक्टर्स ही महिलाएं हैं। यह आंकड़ा ग्रामीण क्षेत्रों में और भी भयावह है जहां प्रति 10 हज़ार पर केवल 1 एक महिला एलोपैथिक चिकित्सक मौजूद हैं। जबकि शहरी भारत में महिला चिकित्स्कों का यह अनुपात प्रति 10 हज़ार पर 6.5 है।

महिला डॉ की भारी कमी

हार्वर्ड विश्वविद्यालय (Harward University) के शोधकर्ताओं ने एक शोध में पाया कि पुरुष डॉक्टरों की तुलना में महिला डॉक्टर की देखरेख में रहने वाले मरीजों के ठीक होने की संभावना अधिक होती है। वहीं 30 फीसदी मरीज इलाज से फायदा होने के कारण वापस अस्पताल नहीं आते। लेकिन भारत जैसे देश में महिला डॉक्टर और नर्सों की भारी कमी है। 'भारत में स्वास्थ्य और मानव संसाधाान' विषय से प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार बीते पांच सालों की बात करें तो पुरुषों की तुलना में 4500 महिला डॉक्टर फील्ड में आई हैं।

प्रवेश में आगे, डिग्री में पीछे

वहीं मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश लेने के मामले में भी महिलाओं ने 51 फीसदी के साथ पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। लेकिन स्नातक होने के बाद इनमें से ज्यादातर डॉक्टरी को अपना पेशा नहीं बना पातीं। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं। पारिवारिक दबाव और कार्यस्थल पर महिला विरुद्ध माहौल उन्हें दसरे पेशा चुनने के लिए विवश करता है। इंडियन जर्नल ऑफ जेंडर स्टडीज में प्रकाशित एक शोध पेपर के अनुसार मेडिकल कॅरियर पुरुषवादी है क्योंकि यहां काम का समय अधिक है और महिलाएं घर और कॅरियर के बीच संतुलन नहीं बनाए रख पातीं।