जानें कानून: ट्रांज़िट एंटीसिपेटरी बेल और पर्सनल बांड पर रिहाई में क्या अंतर है

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Published: 24 Feb 2021, 02:35 PM IST

क़ानून की नज़र में इन दोनों के अन्तर को समझना सभी के लिए आवश्यक है

पर्यावरण कार्यकर्ता दिशा रवि के टूलकिट मामले में, शांतनु मुलुक और मुमबई की वकील निकिता जैकब के मामले में 'ट्रांज़िट बेल' और 'एन्टिसिपेटरी बेल' जैसे कानूनी शब्दों ने सभी का ध्यान अपनी और खींचा है। आखिर क्या होती है 'ट्रांज़िट बेल' और 'एन्टिसिपेटरी बेल' और कब कोई इसके लिए कानून का दरवाज़ा खटखटा सकता है। आइये जानते हैं। दरअसल दोनों को एक दुसरे के पर्यावाची के रूप में उपयोग किया जाता है। भारतीय न्यायालयो में समय समय पर इसकी व्याख्या की गई है। जब अदालत किसी ऐसे क्षेत्र में व्यक्तिको बेल देती है जो उसका कार्यक्षेत्र नहीं है जहां कोई अपराध या घटना हुयी हो। ट्रांज़िट या एंटीसिपेटरी बेल (Transit Bail or Anticipatry Bail) दरअसल, सीआरपीसी की धारा 438 (गिरफ्तारी की आशंका) के तहत उक्त व्यक्ति को बेल देने के कानूनी नियमों से संबंधित है।
ऐसे समझें: ट्रांज़िट या एंटीसिपेटरी बेल उस अवस्था में दी जाती है जब किसी व्यक्ति को अन्य राज्य की पुलिस द्वारा गैर-जमानतीय आरोप के तहत गिरफ्तार करने की आशंका हो, तब वह व्यक्ति गिरफ्तारी से बचने के लिए हाइकोर्ट या अपने क्षेत्र के सत्र न्यायालय में ट्रांजिट बेल की अपील कर सकता है।

निजी बॉन्ड के बाद भी कैद रखना, अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने हाल ही एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि अनिवार्य पर्सनल बॉन्ड भरे जाने के बावजूद किसी व्यक्ति को हिरासत में रखना निजी स्वतंत्रता के अधिकार की अवमानना है। इस मामले में दो लोगों को शांतिभंग में गिरफ्तार किया गया था। फैसले में माननीय न्यायलय ने कहा कि धारा 107 सीआरपीसी के तहत किसी भी आरोपी को शंति बनाए रखने के लिए सिक्योरिटी प्रदान करने अथवा एक बांड भरने की आवश्यकता होती है। यानी इस आधार पर यह मन जाएगा कि सीआरपीसी के तहत बांड में निहित शर्तों को पूरा करने के बाद भी अगर किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा जाता है तो यह क़ानून की नज़र में उक्त वयक्ति के संविधान से प्राप्त अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (निजी स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन मन जाएगा।


धारा 107: सीआरपीसी (CRPC) की धारा 107 के तहत सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कहा जा सकता है। ऐसा करने के बाद भी व्यक्ति को रिहा न करना अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 21 (निजी स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन है।