कम बच्चे होने से स्कूल दूसरी जगह हुआ मर्ज, शिक्षिका ने लगातार प्रयास कर बढ़ाई संख्या और उसी गांव में करा लिया शिफ्ट

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Published: 05 Sep 2021, 10:28 AM IST

ग्रामीणों में अलख जगाकर बढ़ाया शिक्षा स्तर, अब उत्साह से बच्चे ले रहे शिक्षा

शिक्षा

अनिल मालवीय, सीहोर. कहते हैं किसी कार्य को ईमानदारी से करें तो सफलता जरूर मिलती है। जिला मुख्यालय सीहोर से 17 किमी दूर रामाखेड़ी स्कूल में पदस्थ शिक्षिका सुधा गहलोत इसका बड़ा उदाहरण हैं। जिन्होंने पदस्थापना के बाद शिक्षा का स्तर तो सुधारा ही साथ में कम बच्चों के चलते दूसरे गांव में मर्ज (समोजित) हुए प्राइमरी स्कूल को अपने दम पर प्रयास कर वापस उसी गांव में शिफ्ट करा लिया। कोरोना के चलते अभी भले स्कूल बंद हो, लेकिन शिक्षिका रोजाना हमारा घर हमारा विद्यालय के तहत बच्चों को शिक्षा देकर भविष्य बनाने में जुटी है।

सीहोर इंग्लिशपुरा निवासी शिक्षिका सुधा गहलोत की चार सितंबर 2019 को करीब 550 की आबादी वाले रामाखेड़ी गांव के प्राथमिक स्कूल में पदस्थापना हुई थी। सुधा बताती हैं कि पदस्थापना के समय स्कूल में महज सात बच्चे दर्ज थे। एक तो ग्रामीण एरिया और दूसरा लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता की कमी से स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ाना किसी चुनौती से कम नहीं था। शिक्षिका ने शुरूआत से बहुत कोशिश की लेकिन मायूसी मिली। इधर 10 बच्चे से कम होने पर शासन ने जुलाई 2020 में इस स्कूल को बंद कर पास के ही ढाबला गांव में मर्ज कर दिया।

ऐसे किया प्रयास तो मिली सफलता
शिक्षिका ने बताया कि ढाबला से वापस रामाखेड़ी में स्कूल को शिफ्ट कराने का मन में संकल्प लिया और कवायद शुरू कर दी। जिस समय पिछले साल कोरोना की दूसरी लहर चरम पर थी, उस दौरान जान की परवाह किए बगैर गांव में पहुंच शासन की गाइड लाइन का पालन करते हुए लोगों में शिक्षा के प्रति अलख जगाई। शिक्षा का महत्व बताते हुए बच्चों को सरकारी स्कूल में प्रवेश दिनाने का कहा गया। पांच महीने तक परेशानी उठाकर चली जद्दोजहद के बाद छात्र संख्या 53 हुई तो शिक्षा विभाग, शासन को इसकी जानकारी भेजी। इसका सार्थक परिणाम यह हुआ कि शासन ने ढाबला में मर्ज हुए इस स्कूल को दिसंबर 2020 में वापस रामाखेड़ी में शिफ्ट कर चालू करने के आदेश जारी कर दिए।
बच्चों का जीवन सुधारना पहली जिम्मेदारी
सुधा बताती हैं कि सत्र 2021-2022 में रामाखेड़ी प्राइमरी स्कूल में 64 बच्चे दर्ज हैं। शासन की तरफ से अभी कक्षा एक से पांच तक (प्राइमरी स्कूल) को खोलने के आदेश जारी नहीं किए हैं। इस कारण रोजाना गांव में हमारा घर हमारा विद्यालय के तहत बच्चों को शिक्षा दी जा रही है। शिक्षिका ने बताया कि सुबह साढ़े 10 बजे पगांव हुंच जाती है और बच्चों को घर-घर जाकर या एक जगह कम बच्चों का ग्रुप बनाकर विषयवार पढ़ाती हैं। दो साल में किए प्रयास से गांव में शिक्षा का स्तर भी 80 प्रतिशत से ज्यादा हो गया है। शिक्षिका का कहना है कि बच्चों का जीवन सुधारना पहली प्राथमिकता है। जिसे सार्थक करने उनके साथ स्कूल में पदस्थ शिक्षक राजेंद्र परमार भी लगे हुए हैं।