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सालों बाद शुभ संयोगों में निकलेगी बाबा महाकाल की शाही सवारी, दर्शन मात्र से खुल जाएगा भाग्य

By Tanvi Sharma

Jul, 21 2018 01:06:23 (IST)

सालों बाद शुभ संयोगों में निकलेगी बाबा महाकाल की शाही सवारी, दर्शन मात्र से खुल जाएगा भाग्य

सालों बाद शुभ संयोगों में निकलेगी बाबा महाकाल की शाही सवारी, दर्शन मात्र से खुल जाएगा भाग्य

सावन के पवित्र माह में मध्य प्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में बाबा महाकाल की सवारी हर वर्ष निकाली जाती है। इस वर्ष सावन माह 28 जुलाई से प्रारंभ हो रहा है। सावन में भगवान महाकाल की सवारी का बहुत महत्व माना जाता है। सावन-भादौ मास में भगवान महाकाल की 6 सवारियां निकलेंगी। महाकाल की पहली सवारी 30 जुलाई को निकलेगी। वहीं दूसरी सवारी 6 अगस्त, तीसरी सवारी 13 अगस्त और चौथी सवारी 20 अगस्त को निकलेगी। भादौ मास में निकलने वाली पहली सवारी 27 अगस्त को और 3 सितंबर को शाही सवारी निकलेगी।

इस बार निकलने वाली शाही सवारी का महत्व बहुत ज्यादा माना जाएगा क्योंकी बाबा महाकाल की शाही सवारी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन निकलेगी। यह शुभ संयोग 11 साल बाद बनने जा रहा है। जिससे इसका महत्न और भी बढ़ गया है। इससे पहले ऐसा शुभ संयाग 2007 में में बना था। जब जन्माष्टमी के दिन शाही सवारी निकली थी। इस बार भी तारीख, तिथि और वार का भी संयोग एक समान बन रहा है। ज्येष्ठ अधिकमास की गणना से यह संयोग बन रहा है। इससे पहले 2007 में 3 सितंबर को सोमवार और भादौ कृष्ण अष्टमी थी। इस बार भी तारीख, तिथि और वार वैसा ही रहेगा। बता दें कि महाकाल मंदिर में श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल की सवारी निकलने की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। इस दौरान देश-विदेश से हजारों भक्त भगवान के दर्शन के लिए उमड़ते हैं।

इसलिए निकाली जाती है बाबा महाकाल की सवारी

बाबा महाकाल सवारी के जरिए अपनी प्रजा का हाल जानने निकलते हैं क्योंकि महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है। सवारी से पहले पुजारी मुघौटे सम्मुख रख महाकाल से इनमें विराजित होने का आह्वान करते हैं। पश्चात सवारी निकलती है। ऐसा इसलिए ताकि हर रूप में हर भक्त भगवान के दर्शन कर सके। खासकर वे जो वृद्ध, रुग्ण या नि:शक्तता की स्थिति में मंदिर नहीं आ सकते।

श्रावण-भादौ मास में भगवान महाकाल हर सोमवार को विभिन्न रूपों में विविध वाहनों पर सवार होकर भक्तों को दर्शन देने निकलते हैं। भक्त इन रूपों की एक झलक पाकर ही निहाल हो जाते हैं। पहले सोमवार को पालकी में चंद्रमौलेश्वर निकलते हैं। दूसरी सवारी में चंद्रमौलेश्वर हाथी पर और पालकी में मनमहेश विराजते हैं। इसके बाद क्रमश: नंदी पर उमा-महेश, गरुड़ पर शिव-तांडव, बैल जोड़ी पर होलकर, जटशंकर रूप में भगवान दर्शन देते हैं।

पालकी में भगवान के नगर भ्रमण की परंपरा अनादिकाल से मानी गई है। सिंधिया स्टेट के समय अन्य रूपों को सवारी में शामिल किया गया। प्रजा अपने राजा से मिलने के लिए इस कदर बेताब होती है कि शहर के चौराहे-चौराहे पर स्वागत की विशेष तैयारी की जाती है। शाम चार बजे राजकीय ठाट-बाट और वैभव के साथ राजा महाकाल विशेष रूप से फूलों से सुसज्जित चाँदी की पालकी में सवार होते हैं। जैसे ही राजा महाकाल पालकी में विराजमान होते हैं। ठंडी हवा के एक शीतल झोंके से या हल्की फुहारों से प्रकृति भी उनका भाव भीना स्वागत करती है स्थानीय प्रचलित भाषा में इसे सावन के ‘सेहरे’ कहा जाता है ।

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