वे देव जिनसे यमराज के भाई को तक लगता है डर!

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Updated: 27 Jun 2020, 09:22 PM IST

- ये सभी देवता देते हैं इनके दोषों से राहत
- शुभ कर्म करने वालों को यमराज के भाई देते हैं अपना खास आशीर्वाद

आदिपंच देवों में से एक सूर्य देव कुल दस संतानें मानी जाती हैं। इनके पुत्रों में यमराज और शनिदेव हैं। इसके अलावा यमुना, वैवस्वतमनु, तप्ति, अश्विनी भी सूर्यदेव की ही संतानें हैं।

सूर्यपुत्र व यमराज के भाई शनिदेव को शास्त्रों में न्‍यायाधीश की उपाधि से नवाजा गया है, जिनके पास हमारे सभी कर्मों का लेखाजोखा रहता है। वह हर व्‍यक्ति को उसके कर्मों का फल देते हैं। वहीं ज्‍येष्‍ठ मास की अमावस्‍या को शनिदेव की जयंती मनाई जाती है।

वहीं शनिदेव के बारे में कहा जाता है कि उनका गुस्‍सैल स्‍वभाव और ग्रहदशा किसी को भी बर्बाद कर सकती है। लेकिन जानकारों के अनुसार जहां एक ओर शनि न्याय के तहत लोगों को दंड देते हैं, वहीं शुभ कर्म करने वालों को अपने खास आशीर्वाद से भी नवाजते हैं।

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पंडित सुनील शर्मा के अनुसार शनिदेव केवल उन्‍हीं लोगों को परेशान करते हैं, जिनके कर्म अच्‍छे नहीं होते। शनिदेव न्‍याय के देवता हैं। यही वजह है कि भगवान शिव ने शनिदेव को नवग्रहों में न्‍यायाधीश का काम सौंपा है। मगर क्‍या आप जानते हैं कि वे शनिदेव जिनके प्रकोप से सारी दुनिया डरती हैं, वह खुद भी कुछ का सम्मान करते हुए उनसे डरते हैं…

पौराणिक कथाओं के अनुसार शनिदेव भगवान सूर्य और उनकी दूसरी पत्‍नी छाया के पुत्र हैं। बताया जाता है कि एक बार गुस्‍से में सूर्यदेव ने अपने ही पुत्र शनि को शाप देकर उनके घर को जला दिया था। इसके बाद सूर्य को मनाने के लिए शनि ने काले तिल से अपने पिता सूर्य की पूजा की तो वह प्रसन्‍न हुए। इस घटना के बाद से तिल से शनिदेव और उनके पिता की पूजा होने लगी।

: माना जाता है कि शनिदेव पवनपुत्र हनुमानजी से भी बहुत डरते हैं। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि हनुमानजी के दर्शन और उनकी भक्ति करने से शनि के सभी दोष समाप्‍त हो जाते हैं। जो लोग हनुमानजी की नियमित रूप से पूजा करते हैं, उन पर शनि की ग्रहदशा का खास प्रभाव नहीं पड़ता है।

: वहीं अच्‍छे अच्‍छों को अपनी लीला से सबक सिखाने वाले भगवान श्रीकृष्‍ण को शनिदेव का इष्‍ट माना जाता है। मान्‍यता है कि अपने इष्‍ट का एक दर्शन पाने को शनिदेव ने कोकिला वन में तपस्‍या की थी। शनिदेव के कठोर तप से प्रसन्‍न होकर श्रीकृष्‍णजी ने कोयल के रूप में दर्शन दिए। तब शनिदेव ने कहा था कि वह अब से कृष्‍णजी के भक्‍तों को परेशान नहीं करेंगे।


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: पौराणिक मान्‍यताओं के अनुसार, शनिदेव को पीपल से भी डर लगता है। इसलिए शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाने से शनिदेव प्रसन्‍न होते हैं। शास्‍त्रों में बताया गया है कि जो पिप्‍लाद मुनि का नाम जपेगा और पीपल की पूजा करेगा, उस पर शनिदशा का अधिक प्रभाव नहीं होगा।

: शनि महाराज अपनी पत्नी से भय खाते हैं। इसलिए ज्योतिषशास्त्र में शनि की दशा में शनि पत्नी का नाम मंत्र जपना भी शनि का एक उपाय माना गया है। इसकी कथा यह है कि एक समय शनि पत्नी ऋतु स्नान करके शनि महाराज के पास आई, लेकिन अपने ईष्ट देव श्रीकृष्ण के ध्यान में लीन शनि महाराज ने पत्नी की ओर नहीं देखा। क्रोधित होकर पत्नी ने शाप दे दिया था।

: पिता सूर्यदेव के कहने पर शनिदेव को बचपन में एक बार सबक सिखाने के लिए शिवजी ने उन पर प्रहार किया था। शनिदेव इससे बेहोश हो गए तो पिता के विनती करने पर शिवजी ने वापस उन्‍हें सही किया। तब से मान्‍यता है कि शनिदेव शिवजी को अपना गुरु मानकर उनसे डरने लगे हैं।