मनुष्य का स्वभाव है आनंद और कर्म, ऐसे रहें सुखी

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Published: 21 Apr 2018, 12:09 PM IST

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आदमी अपने स्वभाव से मुक्ति नहीं पा सकता है। वह स्वभाव को विस्मृत कर सकता है, विनष्ट नहीं। दुख बहिर्यात्रा है जबकि आनंद अंतर्यात्रा।

आनंद अंतर्यात्रा
आनंद तुम्हारा स्वभाव है। आनंद तो तुम लेकर ही आए हो। अभी भी जब तुम दुख से भरे हो, जब तुम्हारे चारों तरफ दुख की छाया हैं, तब भी तुम्हारे अंतरतम में आनंद का झरना ही बह रहा है। उससे छूटने का कोई उपाय ही नहीं है। स्वभाव से कोई कैसे छूट सकता है! भूल सकते हो स्वभाव को, विस्मृत कर सकते हो स्वभाव को, विनष्ट नहीं। आनंद भीतर जाने से मिलता है। दुख बाहर जाने से। दुख बहिर्यात्रा है। आनंद अंतर्यात्रा।

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