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विचार मंथनः भविष्य के श्रेष्ठ सूत्रधारों का निर्माण करते है  शिक्षक-  युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा आचार्य

By Shyam Kishor

Sep, 05 2018 06:38:19 (IST)

भविष्य के श्रेष्ठ सूत्रधारों का निर्माण करते है शिक्षक- युगऋषि आचार्य श्रीराम शर्मा आचार्य

नव निर्माण को घडते है शिक्षक


वेदमूर्ति युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के शब्दों में जाने उज्जवल भविष्य के निर्माताओं का निर्माण करने वाले शिक्षक की सही परिभाषा । आज नविन समाज के नव निर्माण का महा पर्व है। आज शिक्षक दिन है। शिक्षा एक प्रतिपादन है, उसका मूर्तरूप शिक्षक है। अध्यापक को अपनी गरिमा समझने और चरितार्थ कर दिखाने में वर्तमान परिस्थितियाँ भी बाधा नहीं पहुँचा सकती। अध्यापकगण अपनी गुरु महिमा को अपने ही बलबूते बनाए रहें और अपने गौरव का महत्व अनुभव करते हुए बढ़ते चलें। विद्यार्थी अपने समय का महत्वपूर्ण भाग अध्यापकों के साथ रहकर विद्यालयों में गुजारते हैं। उनके प्रति सहज श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव भी रहता है। उनके उपकारों को कोई कैसे भुला सकता है? उनसे आयु में ही नहीं, हर हालत में छोटी स्थिति वाले छात्रों पर उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व की छाप पड़नी ही चाहिए।


स्कूली पढ़ाई पूरी कराना तो आवश्यक है ही। इसे वेतन के लिए किया गया परिश्रम भी माना जा सकता है। वेतन से जीवन निर्वाह होता है। पर बात इतने तक सीमित नहीं समझी जा सकती है। कारण यह भी है कि अध्यापक अपने संपर्क के छात्रों में शालीनता, सज्जनता, श्रमशीलता, समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी, जैसी सत्प्रवृतियों को विकसित करने में कुछ उठा न रखें। इन्हीं प्रयत्नों में निरत रहने वाले शिक्षक समूचे समाज को अपना ऋणी बना सकते हैं। गुरु की गरिमा का निर्वाह चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव को आदर्श बनाने से होगा।


शिक्षा के सम्बन्ध में एक महान सत्य हमने सीखा था। हमने यह जाना था कि मनुष्य से ही मनुष्य सीख सकता है। जिस तरह जल से ही जलाशय भरता है, दीप से ही दीप जलता है, उसी प्रकार प्राण से प्राण सचेत होता है। चरित्र को देखकर ही चरित्र बनता है। गुरु के सम्पर्क- सान्निध्य, उनके जीवन से प्रेरणा लेकर ही मनुष्य- मनुष्य बनता है। इस प्रकार शिक्षक अपने श्रेष्ठ आचरण से श्रेष्ठ मनुष्य (शिष्य) का निर्माण करता है।


नैतिक शिक्षा

हमारे देश, समाज, सभ्यता, संस्कृति का भार बहुत कुछ शिक्षकों के कंधों पर ही है। अपने इस उत्तरदायित्व को समझते हुए बच्चों के उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण करने में अधिकाधिक प्रयास आवश्यक है। नैतिक शिक्षा कहने- सुनने में तो सरल है, पर वह अति कठिन है, इसके लिए सबसे पहले अध्यापक को अपना बाहरी और आंतरिक जीवन ऐसे ढाँचे में ढालना होता है, जिसका अनुगमन करते हुए सम्बन्धित छात्र अनायास ही प्रामाणिकता एवं शालीनता के ढाँचे में ढलने लगे। वाणी से दिए जानें वाले मार्गदर्शन के साथ- साथ उन्हें चरित्र के द्वारा दिए जाने वाले शिक्षण, विद्या विकसित करनी होगी। उसमें घाटा कहीं भी नहीं है। छात्रों, अभिभावकों के श्रद्धापात्र बनते ही शिक्षकों को वह उच्चस्तरीय सम्मान और सहयोग प्राप्त होने लगता है, जिसके लिए बड़े- बड़े नेता, अधिकारी तरसते हैं।


अध्यापक अपनी गरिमा को समझें। शिक्षक का दायित्व महान- हमें अपने स्वाभिमान की रक्षा करनी है, आत्मसम्मान की रक्षा करनी है और यह तभी संभव है जब हम अपने दायित्व को समझें और उसके निर्वाह में कोताही न बरतें। शिक्षकों का दायित्व महान है। वह ओछे चिंतन, ओछे व्यक्तियों की भावनाओं द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। शिक्षक व्यक्तित्व निर्माण का ढाँचा हैं। जैसा ढाँचा होता है, वैसे ही प्रतिरूप ढलते हैं। शिक्षक छात्र के लिए आदर्श है, वह उसका अनुकरण करता है। श्रद्धा और सम्मान इसी शर्त पर प्राप्त होता चला जाता है।



ज्ञानदान महान दान- शिक्षक केवल छात्रों को ही नहीं, उनके अभिभावकों को भी ज्ञान के आलोक से आलोकित कर सकता है। छात्रों के माध्यम से शिक्षक, अच्छी पुस्तकें उनके अभिभावकों तक समय- समय पर पहुँचाकर उन्हें भी स्वाध्याय परम्परा से जोड़ने का प्रयास करते रहें। इस प्रकार ज्ञान का आलोक घर- घर पहुँचाकर राजकीय सेवा के साथ- साथ महान पुण्य का भागीदार बनने का सौभाग्य भी मिलता है।


शिक्षक छात्रों को पारिवारिक दायित्व का बोध कराएँ, समाजनिष्ठ बने रहने की प्रेरणा दें, पड़ोसियों के साथ मधुर संबंध बनाए रखने की प्रेरणा दें, स्वार्थपरता की हानियाँ एवं परमार्थ में ही स्वार्थ के सूत्रों को हृदयंगम कराएँ, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य का महत्त्व समझाएँ तथा विद्यार्थियों को जीवन जीने की कला के सूत्रों का ज्ञान कराए। जिन कुरीतियों पर विजय पाना शासन, धर्माचार्य, पुलिस, अदालत, एवं सामाजिक संगठनों के लिए असंभव है, उसे संभव बनाना शिक्षकों के लिए बड़ा आसान है। यदि वे अपने विषय के शिक्षणके साथ- साथ इन कुरीतियों से परिचित कराकर भविष्य में इनसे बचने की प्रेरणा दें तो उनका प्रभाव छात्रों के जीवन पर पड़ेगा। महान कार्यों के प्रतिफल के रूप में समाज में सम्मान और आत्मसंतोष की उपब्धियाँ अवश्य मिलती हैं। जिन छात्रों का सुलेख अच्छा है, उनको दीवार लेखन की प्रेरणा देकर दीवारों पर प्रेरणाप्रद वाक्य लिखवाने चाहिए। इस प्रकार रास्ता चलते व्यक्तियों को सद्विचार देकर आप बहुत महत्वपूर्ण कार्य करा सकते हैं।


विद्यालयों में समय

समय पर उत्सव, जयंतियाँ, राष्ट्रीय पर्व मनाए जाते हैं। ध्यान रखना चाहिए कि उनमें जो गीत गाए जाएँ वे राष्ट्रीयता, देशभक्ति से ओतप्रोत अपनी देश जाति के गौरव- गरिमा के अनुरूप हों तथा कविता सम्मेलन इत्यादि के द्वारा उनकी प्रतिभा को विकसित किया जा सकता है। शिक्षकों के पास एक बहुत बड़ी शक्ति है, उसे उन्हें समझना चाहिए। यदि प्यार और आत्मीयता के व्यवहार से उन्होंने छात्र वर्ग को अपनी बात मनवाने के लिए तैयार कर लिया तो समाज में कोई परिवर्तन कराना उनके लिए कठिन नहीं होगा।

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