शुक्र यानि शुक्राचार्य: जानिये क्यों बने असुरों के गुरु

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Published: 12 Jun 2020, 08:20 AM IST

शुक्राचार्य का जन्म शुक्रवार को...

Shukracharya The God of Luck- भाग्य के कारक हैं शुक्र

देवताओं और दैत्यों की आपने कई कथाएं आपने सुनी होंगी। एक और जहां देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं, वहीं दैत्यों और राक्षसों के गुरु शुक्राचार्य हैं। सप्ताह के दिनों में भी दोनों ही गुरुओं का अपना अपना दिन निश्चित है, इसमें से जहां गुरुवार यानि बृहस्पतिवार का दिन देवताओं के गुरु बृहस्पति को समर्पित है, वहीं शुक्रवार का दिन दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य को समर्पित है।

आज शुक्रवार है और ऐसे में आज हम आपको ये बताने जा रहे हैं कि आखिर शुक्राचार्य दैत्यों, दानवों एवं राक्षसों के आचार्य कैसे बने?

पंडित सुनील शर्मा के अनुसार शुक्राचार्य महर्षि भुगु के पुत्र थे। महर्षि भृगु की पहली पत्नी का नाम ख्याति था। ख्याति से भृगु को दो पुत्र दाता और विधाता मिले और एक बेटी का जन्म हुआ। वहीं भृगु के दो पुत्रों में उशना, च्यवन थे। माना जाता है कि उशना ही आगे चलकर शुक्राचार्य कहलाए।

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पहली कथा के अनुसार शुक्राचार्य का जन्म शुक्रवार को हुआ था इसलिए महर्षि भृगु ने अपने इस पुत्र का नाम शुक्र रखा। जब शुक्र थोड़े से बड़े हुए तो उनके पिता ने उन्हें ब्रह्मऋषि अंगिरस के पास शिक्षा के लिए भेज दिया। मान्यता है कि अंगिरस ब्रह्मा के मानस पुत्रों में सर्वश्रेष्ठ थे और उनके पुत्र का नाम बृहस्पति था, जो बाद में देवों के गुरु बने । शुक्राचार्य के साथ उनके पुत्र बृहस्पति भी पढ़ते थे।

ऐसा माना जाता है की शुक्राचार्य की बुद्धि बृहस्पति की तुलना में कुशाग्र थी, लेकिन फिर भी बृहस्पति को अंगिरस ऋषि ने पुत्र होने के चलते ज्यादा अच्छी तरह से शिक्षा दी गई, जिसके चलते एक दिन शुक्राचार्य ईर्ष्यावश उस आश्रम को छोड़ के सनक ऋषियों और गौतम ऋषि से शिक्षा लेने लगे।

फिर शिक्षा पूर्ण होने के बाद जब शुक्राचार्य को पता चला की बृहस्पति को देवों ने अपना गुरु नियुक्त किया है तो वो ईर्ष्या वश दैत्यों के गुरु बनने की बात मन में ठान ली, परन्तु इसमें सबसे बड़ी बाधा दैत्यों को देवोंं के हाथों हमेशा मिलनी वाली पराजय थी।

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उसके बाद शुक्राचार्य मन ही मन ये सोचने लगे की अगर मैं भगवान शिव को प्रसन्न कर उनसे संजीविनी मन्त्र प्राप्त कर लेता हूं, तो मैं दैत्यों को देवों पर अवश्य ही विजय दिलवा दूंगा। और यही सोचकर उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या शुरू कर दी।

उधर देवो ने इस मौके का फायदा उठा के दैत्यों का संहार आरम्भ कर दिया। शुक्राचार्य को तपस्या में देख दैत्य उनकी माता ख्याति की शरण में चले गए। ख्याति ने दैत्यों को शरण दी और जो भी देवता दैत्यों को मारने आता वो उसे अपनी शक्ति से मूर्छित कर लकवाग्रस्त देती। ऐसे में दैत्य बलशाली हो गए और धरती पर पाप बढ़ने लगा।

शुक्राचार्य की मां का वध
ऐसे में धरती पर धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु ने शुक्राचार्य की मां और भृगु ऋषि की पत्नी ख्याति का सुदर्शन चक्र से सर काट दैत्यों के संहार में देवों की और समूचे जगत की मदद की।

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वहीं जब इस बात का पता शुक्राचार्य को लगा तो उन्हें भगवान् विष्णु पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने मन ही मन उनसे बदला लेने की ठान ली और वो एक बार फिर से भगवान शिव की तपस्या में लीन हो गए।

कई सालों के घोर तपस्या के बाद आखिर कार उन्होंने भगवान शिव से संजीवनी मंत्र पाया और दैत्यों के राज्य को पुनः स्थापित कर अपनी मां का बदला लिया।

उधर महर्षि भृगु को जब इस बात का पता चला की भगवान विष्णु ने उनकी पत्नी ख्याति का वध कर दिया है, तो उन्होंने विष्णु जी को शाप दिया की चूंकि विष्णु जी ने एक स्त्री का वध किया है इसलिए उनको बार बार पृथ्वी पर मां के गर्भ से जन्म लेना होगा और गर्भ में रह कष्ट भोगना पड़ेगा।

ज्ञात हो इससे पहले भगवान प्रकट हो कर ही अवतार लेते थे जैसे की वराह, मतस्य, कुर्मा और नरसिंह, लेकिन उसके बाद उन्होंने परशुराम राम, कृष्ण, बुद्ध रूप में मां की कोख से ही जन्म लिया। वहीं बाद में शुक्राचार्य से बृहस्पति के पुत्र ने संजीवनी विद्या सीख के उनका पतन किया।

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दैत्य गुरु शुक्राचार्य के विषय में कुछ आश्चर्यजनक तथ्य –
: मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। इनका वाहन रथ है, जिसमें 8 घोड़े हैं। इनका शस्त्र आयुध दंड है। शुक्र वृष और तुला राशि के स्वामी हैं। इन की महादशा 20 वर्ष की होती है। शुक्राचार्य के सिर पर सुंदर मुकुट होता है। गले में माला है। वे श्वेत कमल पर विराजमान रहते हैं। उनके चार हाथों में दंड, वरदमुद्रा, रुद्राक्ष की माला और पात्र सुशोभित रहती है।

: महाभारत के अनुसार शुक्राचार्य रसों, मंत्रों और औषधियों के स्वामी हैं। शुक्राचार्य ने अपना पूरा जीवन तप और साधना करने में लगाया था। अपनी सारी संपत्ति अपने असुर शिष्यों को दे दी थी।

: शुक्राचार्य को नीति शास्त्र का जन्मदाता भी कहा जाता है। शुक्र नीति को महत्वपूर्ण समझा जाता है। शुक्राचार्य को महत्वपूर्ण स्थान मिला है। शुक्र ग्रह वीर्य से संबंधित है। वीर्य का संबंध जन्म से है। शुक्राचार्य शुक्र ग्रह बनकर तीनों लोकों का कल्याण करते हैं।

: ब्रह्मा की सभा में ये ग्रह बनकर उपस्थित होते हैं। शुक्र ग्रह वर्षा रोकने वाले ग्रहों को शांत करता है और वर्षा करने में मदद करता है। वर्षा होने पर पृथ्वी पर नया जीवन शुरू होता है। मनुष्य और जीव जंतुओं को शान्ति, संतोष और भोजन मिलता है।

दानव गुरु शुक्राचार्य इसलिए कहलाए शिव पुत्र...
शुक्राचार्य भृगु महर्षि के पुत्र थे। देवताओं के गुरु बृहस्पति अंगीरस के पुत्र थे। इन दोनों बालकों ने बाल्यकाल में कुछ समय तक अंगीरस के यहां विद्या प्राप्त की। आचार्य अंगीरस ने विद्या सिखाने में शुक्र के प्रति विशेष रुचि नहीं दिखाई। असंतुष्ट होकर शुक्र ने अंगीरस का आश्रम छोड़ दिया और गौतम ऋषि के यहां जाकर विद्यादान करने की प्रार्थना की।

गौतम मुनि ने शुक्र को समझाया, बेटे! इस समस्त जगत् के गुरु केवल ईश्वर ही हैं। इसलिए तुम उनकी आराधना करो। तुम्हें समस्त प्रकार की विद्याएं और गुण स्वत: प्राप्त होंगे। गौतम मुनि की सलाह पर शुक्र ने गौतमी तट पर पहुंचकर शिव जी का ध्यान किया।

शिव जी ने प्रत्यक्ष होकर शुक्र को मृत संजीवनी विद्या का उपदेश दिया। शुक्राचार्य द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली इस मृत संजीवनी विद्या के कारण दानवों की संख्या बढ़ती ही गई।

एक कथा के अनुसार देवताओं ने शिव जी से शिकायत की, महादेव! आपकी विद्या का दानव लोग दुरुपयोग कर रहे हैं। आप तो समदर्शी हैं। शुक्राचार्य संजीवनी विद्या से मृत दानवों को जिलाकर हम पर भड़का रहे हैं। यही हालत रही तो हम कहीं के नहीं रह जाएंगे। कृपया आप हमारा उद्धार कीजिए।

शुक्राचार्य द्वारा मृत संजीवनी विद्या का इस प्रकार अनुचित कार्य में उपयोग करना शिव जी को अच्छा न लगा। शिव जी क्रोध में आ गए और शुक्राचार्य को पकड़कर निगल डाला। महादेव द्वारा शुक्राचार्य को निगलने के बाद राक्षसों की सेना कमजोर हो गई और अंत में देवताओं की विजय हुई।

इधर भगवान शिव के पेट में शुक्राचार्य बाहर आने का रास्ता खोजने लगे। शुक्राचार्य को महादेव के पेट में सातों लोक, ब्रह्मा, नारायण, इंद्र आदि पूरी सृष्टि के दर्शन हुए। इस तरह शुक्राचार्य सौ सालों तक महादेव के पेट में ही रहे। अंत में जब शुक्राचार्य बाहर नहीं निकल सके तो वे शिवजी के पेट में ही मंत्र जाप करने लगे।

इस मंत्र के प्रभाव से शुक्राचार्य महादेव के शुक्र रूप में लिंग-मार्ग से बाहर निकले। तब उन्होंने शिवजी को प्रणाम किया। शुक्राचार्य को लिंग-मार्ग से बाहर निकला देख भगवान शिव ने उनसे कहा कि- चूंकि तुम मेरे लिंग-मार्ग से शुक्र की तरह निकले हो, इसलिए अब तुम मेरे पुत्र कहलाओगे।