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जब अर्जुन सिंह गाड़ी चलाकर पहुंचे पवन दीवान के घर

By Deepak Sahu

Sep, 12 2018 04:59:25 (IST)

शासकीय संस्कृत महाविद्यालय रायपुर में पढ़ते हुए पवन दीवान अपनी कविताओं के लिए वर्ष 1966-1967 में ही पहचाने जाने लगे थे।

रायपुर . शासकीय संस्कृत महाविद्यालय रायपुर में पढ़ते हुए पवन दीवान अपनी कविताओं के लिए वर्ष 1966-1967 में ही पहचाने जाने लगे थे। तब वे पाजामा कुर्ता पहनते थे। फिर वे राजिम में शिक्षक हो गए। कालांतर में वे उसी राजिम आश्रम के प्रमुख हो गए। उन्होंने संन्यासी का बाना पहन लिया। अद्भुत वक्ता और ओजस्वी कवि पवन दीवान बेहद प्रभावशाली भागवत प्रवचनकार के रूप में गांव-गांव में पूजे जाने लगे।

आपातकाल के बाद जो चुनाव हुआ उसमें प्रदेशभर में पवन दीवान प्रमुख वक्ता के रूप में गए। राजिम विधानसभा से विधायक हुए और उन्हें तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार में जेल मंत्री बनाया गया। शीघ्र ही उनका मोहभंग हो गया। वे इस्तीफा देकर आश्रम लौट आए। जनता पार्टी की सरकार भी कुछ वर्षों में पटरी से उतर गई। पवन दीवान जैसे तेजस्वी व्यक्ति पर मध्यप्रदेश के ताकतवर मंत्री अर्जुन सिंह की नजर पड़ी। वे उन्हें मनाकर कांग्रेस में ले लाए। उस समय पवन दीवान के आश्रम में वे स्वयं गाड़ी चलाकर गए। तब दीवान ने यह संदेश भेजा कि वे पूजा में बैठे हैं। अर्जुन सिंह कुशल खिलाड़ी थे।
उन्होंने कह दिया कि महाराज जी जब तक चाहें पूजा करें। पूजा के बाद मैं दर्शन करूंगा। इस प्रत्युत्तर से दीवान जी हार गए। कुछ देर बाद वे ठहाका लगाते हुए अर्जुन सिंह के पाए आए और उन्हें लेकर कमरे में गए। फिर जो कुछ हुआ वह सभी जानते हैं। संत पवन दीवान ने अर्जुन सिंह की राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से आगे बढ़ाया। छत्तीसगढ़ के अजेय नेता विद्याचरण को हराया। राजनीति के कुशल खिलाड़ी अर्जुन सिंह ने उन्हें सांसद का टिकट दिलवाया। वे महासमुंद से दो बार जीते।
राजीव गांधी और सोनिया गांधी जब छत्तीसगढ़ के कुम्हाड़ीघाट आए तब पवन दीवान को उन्होंने खूब महत्व दिया, लेकिन राजीव गांधी के चले जाने के बाद पवन दीवान की अहमियत कम हो गई और वे हाशिए पर चले गए। फिर से वे भागवत बांचने लगे और उसमें भी संतुष्टि नहीं मिली तो भारतीय जनता पार्टी में चले गए। कांग्रेस में भी वे गो सेवा आयोग के अध्यक्ष थे।
छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने उन्हें सम्मानपूर्वक आयोग का अध्यक्ष बनाया था। डॉ. रमन सिंह ने भी उन्हें गो सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाए रखा, लेकिन दीवान जी अपने पुराने वृहद स्वरूप को याद कर विचलित हो जाते थे। वे फिर पार्टी बदलकर कांग्रेस में चले आए।