स्पंदन: होशियारी-2

|

Published: 09 Apr 2018, 03:31 PM IST

इसके भीतर बैठा हुआ अहंकार ही बुद्धि को तामसिक स्वरूप प्रदान करता है। व्यवहार को उष्ण और आक्रामक बना देता है।

जीवन में हमारा किया ही लौटकर हमको मिलता है। किसी को भी इसके लिए दोष देना उचित नहीं होगा। हम केवल अच्छे परिणाम को ही अपने कर्मों का फल मानते हैं। नकारात्मक परिणाम दूसरों के सिर मढ़ते हैं। यही हमारी कमजोरी भी है, और होशियारी भी। करूं मैं और भरे कोई ऐसा प्रकृति का नियम नहीं है। मैं परीक्षा में फेल हो गया, क्योंकि मैं बीमार हो गया था। बीमारी का कारण कौन? सच पूछो, आज के जीवन का एक मात्र सूत्र है- होशियारी। यानी उत्तरदायित्व से मुकर जाना। कर्मठता और कर्तव्यपरायणता का अभाव। इसके साथ ही व्यक्ति का अन्य व्यक्ति के प्रति अनमना भाव या उदासीनता।

इसके केन्द्र में है स्वार्थयुक्त अहंकार। अहंकार से ही बुद्धि पैदा होती है। बुद्धि ही मन के विषयों को आत्मा तक ले जाती है। बुद्धि के निर्णय से ही शरीर कार्य करता है। अत: इसके भीतर बैठा हुआ अहंकार ही बुद्धि को तामसिक स्वरूप प्रदान करता है। व्यवहार को उष्ण और आक्रामक बना देता है। स्वयं को भी और दूसरों को भी खण्ड-खण्ड कर देता है। बुद्धि का मूल जनक सूर्य स्वयं भी जलता है और पृथ्वी का जल भी खुश्क कर देता है, सोख लेता है। होशियारी का अर्थ भी दूसरों की सद्भावनाओं पर अतिक्रमण या आक्रमण करना ही तो है। दूसरे शब्दों में अपना काम निकाल लेने के लिए दूसरे को भ्रमित करना ही है।

होशियारी अपने आप में संवाद की एक विशेष विधा है। इसमें सत्त्वगुण का अभाव रहता है। कभी रजोगुण, कभी तमोगुण हावी रहते हैं। तमस अधिक रहता है। यह जीवन का आसुरी भाव है। यही ज्ञान को अज्ञान रूप में बदल देता है। तमोगुण में अर्थ और काम अग्रणी रहते हैं। इनकी पूर्ति के हेतु ही व्यक्ति नीति का उपयोग करता है। साम-दाम-दण्ड- भेद के माध्यम से खुद का उल्लू सीधा करना ही नीति का लक्ष्य होता है। इससे भले ही किसी का भी अहित हो, इसकी चिन्ता नहीं रहती। राजनेता भी तो इसी नीति पर चलकर स्वयं को होशियार ही समझते हैं। किसी को ऐसा करते समय कहां याद रहता है कि खुद का किया ही खुद के पास लौट कर आता है। परिणाम का स्वरूप समझ में नहीं आता। क्योंकि हमारी प्रत्येक क्रिया का कारण सूक्ष्म शरीर में रहता है। परिणाम भी वहीं से नियंत्रित होते हैं। हम भीतर कहां झांक पाते हैं।

भावों का प्रभाव
तमस का सारा क्षेत्र वासना का होता है। इन्द्रियों एवं इन्द्रियों के विषयों से जुड़ा होता है। वासनाएं और भावनाएं मन में इच्छा के रूप में पैदा होती हैं अथवा उठती हैं। इच्छापूर्ति का निर्णय बुद्धि करती है। यहां से व्यक्ति की मर्जी काम करने लगती है। इसमें व्यक्ति की प्रकृति मुख्य भूमिका में रहती है। प्रकृति ही जगत् की नियन्ता है। प्रकृति के साथ रहता है स्वधर्म। यह व्यक्ति का ढला हुआ एक निश्चित स्वरूप होता है। इसमें प्राणों की सबलता- निर्बलता एवं वातावरण की भी महती भूमिका रहती है। इन सारे कारणों से बुद्धि के तीनों गुणों या जो भी प्रधान गुण है, को गति मिलती है। प्रत्येक प्राण बाहरी परिणाम प्रकट करने से पूर्व भीतर सूक्ष्म और कारण शरीरों को रूपान्तरित कर देता है। यही तो कर्मफल का जनक होता है। स्थूल परिणाम अस्थायी कहे गए हैं, जो मृत्यु के साथ ही ठहर जाते हैं। सूक्ष्म परिणाम भावी जन्मों को भी प्रभावित करते हैं। आत्मा का ईश्वर या साक्षी भाव इस प्रक्रिया को संचालित करता है।

वासना अथवा नकारात्मक भावों का प्रभाव स्थूल शरीर में परिलक्षित होता जाता है। चूंकि पहले भीतर के तीन स्तरों पर- मन-बुद्धि-आत्मा में बदलाव आता है, अत: शरीर में बदलाव आने में समय लग जाता है। हमारे चक्र शरीर में ऊर्जाओं के केन्द्र होते हैं। आधुनिक मेडिकल साइन्स में इनको अन्त:स्रावी ग्रन्थियां (Endocrine glands) कहते हैं। शरीर के भीतर ये भिन्न-भिन्न अवयवों से जुड़ी रहती हैं। शरीर के बाहर आभा मण्डल के जरिए वातावरण से ऊर्जाओं का आदान-प्रदान करती हैं। जिस प्रकार के भाव मन में उठते हैं, वैसी ही प्राण ऊर्जा इन ग्रन्थियों से निकलने वाले स्रावों को प्रभावित करती जाती हैं। यहीं से जीवन में परिवर्तन शुरू हो जाते हैं।

रस रूप
जैसे ही अन्न जठराग्रि में पहुंचता है, वहां उपलब्ध रसायन इस अन्न को रस रूप में रूपान्तरित करते हैं। इस रस में पृथ्वी, अन्तरिक्ष, चन्द्रमा के तत्त्वों का प्रभाव रहता है। हमारे विचार, हमारी होशियारी, चालाकी मिलकर इस रस के स्वरूप का निर्माण करते हैं। मूल में तो रस ही ब्रह्म है, आनन्द है, प्रेम है। हमारे भाव इसको दूषित करते जाते हैं। रस से ही शुक्र तक के सातों धातु बनते हैं। यह प्रदूषण सन्तान तक पहुंच जाता है। शुक्र से ओज बनता है। ओज से मन का स्वरूप निर्मित होता है। ‘जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन।’ तब नए विचार भी वैसे ही आएंगे। हम इसी तरह अपना भविष्य निर्माण करते हैं।

दूषित ऊर्जाएं अवयवों को भी दूषित करके रोगग्रस्त करती हैं। यह हमारे व्यवहार की स्थूल अभिव्यक्ति है। इनकी चिकित्सा दवा से सम्भव नहीं होती। हमें ही तय करना है कि अपनी होशियारी से हम अपना उत्थान करते हैं अथवा पतन।

Related Stories