जमीन से करीब 100 फीट नीचे, आज भी भारत में यहां रखा है श्री गणेश का सिर

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Published: 12 Aug 2020, 04:04 AM IST

भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर शवाष्टक दल ब्रह्मकमल से टपकती हैं जल की दिव्य बूंदें...

lord Shri Ganesh head is still kept in this cave- श्री गणेश का सिर आज भी रखा है यहां,जमीन से करीब 100 फीट नीचे : जिस पर गिरती है अमृत की धारा

हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। ऐसे में श्री गणेश का जन्मदिवस भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाया जाता है। मान्यता है कि गणेश जी का जन्म Borth of Shree Ganesh भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मध्याह्न काल में, सोमवार, स्वाति नक्षत्र एवं सिंह लग्न में हुआ था। ऐसे में इस वर्ष 2020 में यह गणेश चतुर्थी 22 अगस्त को पड़ रही है।

वहीं गणेश जी के जन्म के बाद की कथा के अनुसार भगवान शिव ने क्रोध में आकर गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में मां पार्वती जी कहने पर उन्होंने हाथी का मस्तक लगाया।

अब ऐसे में सवाल उठता है कि भगवान शिव ने गणेश जी का सिर धड़ से अलग किया था, वह सिर कहां पर रखा था? तो आज हम आपको बताते हैं कि वह सिर भगवान शिव ने एक गुफा में रख दिया था। वह गुफा देवभूमि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में स्थित है। इसे पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है।

 

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दरअसल उत्तराखंड के गंगोलीहाट की माता कालिका के सुप्रसिद्ध हाट कालिका मंदिर व पास ही समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पाताल भुवनेश्वर नाम के स्थान पर प्राकृतिक गुफा में धरती से करीब 100 फीट नीचे यह 160 मीटर लंबी चूना पत्थर की गुफा है।

इसके अंदर गहराई के 'पाताल' में आस्था का एक अलौकिक संसार मौजूद है। इस गुफा के भीतर पाताल में देवलोक सरीखे रहस्य और रोमांच से भरे सात तलों वाली मानो कोई दूसरी ही दुनिया है, जिसकी महिमा स्कंद पुराण के मानस खंड में भी वर्णित है। यहां आदि शंकराचार्य भी यहां आए थे।

पाताल भुवनेश्वर का वर्णन स्कंद पुराण में भी है। जहां गणेश जी का सिर रखा गया है, उसे पाताल भुवनेश्वर के नाम से जाना जाता है। यहां विराजित गणेश जी की मूर्ति को आदिगणेश कहा जाता है।

इस गुफा में भगवान गणेश की कटी हुई शिलारूपी ( मस्तक ) मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल सुशोभित है। इस ब्रह्मकमल से भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर जल की दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद आदि गणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है। इन बुंदों को अमृत की धारा भी कहा जाता है।

पुराणों के अनुसार भगवान गणेश का सिर आज भी एक गुफा में रखा है, जो पाताल भुवनेश्वर में स्थित है। वहीं इस गुफा में भगवान गणेश के मस्तक के साथ ही उस स्थान पर केदारनाथ, बद्रीनाथ और अमरनाथ के भी दर्शन किए जा सकते हैं।

इसके अलावा यहां एक चट्टान दिखेगी जो मार्ग के बीच में है यह चट्टान भगवान गणेश के बिना सिर के आंग का प्रतिनिधित्व करती है!

यहां कमल से पानी आता हैं और वह पानी इस मूर्ति पर पड़ता हैं, जो भगवान शिव द्वारा गणेशजी का सर काटने से पहले और हाथी का मस्तक जोडऩे से पहले की कथा का प्रतीक है, शरीर को सहस्त्रदल कमल (कमल के फूल) का पवित्र पानी से संरक्षित किया गया था!

पाताल भुवनेश्वर गुफा भक्तों की आस्था का केन्द्र है। यह गुफा विशालकाय पहाड़ी के अंदर करीब 160 मीटर लंबी है । कहा जाता है कि इस गुफा की खोज आदि शंकराचार्य द्वारा की गई थी।

पाताल भुवनेश्वर गुफा में बने दृश्य इस तरह लगते है मानो जैसे सब प्राकृतिक बना हो जानकारों की मानें तो पाताल भुवनेश्वर वाकई किसी स्वर्ग से कम नहीं, देवभूमि उत्तराखंड में स्थित है इस पाताल भुवनेश्वर गुफा का एक एक सच सभी को हैरान करने वाला है। यह गुफा उत्तराखंड के कुमाऊं में अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किमी की दूरी तय करके पहाड़ी के बीच बसे गंगोलीहाट कस्बे में है, पाताल भुवनेश्वर गुफा किसी आश्चर्य से कम नहीं है।

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चट्टानें करती हैं प्रतिनिधित्व
पाताल भुवनेश्वर के प्रवेश द्वार पर पथरीली छत के कुछ नीचे आने के अनुमानों को देखा जा सकता है, इसे हाथी ऐरावत के हजार पदचिह्नों के रूप में संदर्भित किया जाता है! भगवान नरसिंह के पंजे और जबड़े प्राकृतिक चट्टान में गुफा के बाहर उभरते देखे जा सकते हैं, यह भगवान नरसिंह और हिरण्यकशिपु के कहानी का वर्णन करते हैं! हर गुफा की चट्टानों पर हिंदू पौराणिक कथाओं की कहानी हैं!
इसके अलावा गुफा में राजा परीक्षत के बेटे की कहानी को देखा जा सकता है, वह साँप तक्षक द्वारा मारा गये थे!

आइए जानें इस गुफा की आश्चर्यजनक कहानी:

यहां है गणेश जी का कटा मस्तक:
हिंदू धर्म में भगवान गणेशजी को प्रथम पूज्य माना गया है. गणेशजी के जन्म के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं. कहा जाता है कि एक बार भगवान शिव ने क्रोधवश गणेशजी का सिर धड़ से अलग कर दिया था, बाद में माता पार्वतीजी के कहने पर भगवान गणेश को हाथी का मस्तक लगाया गया था, लेकिन जो मस्तक शरीर से अलग किया गया, वह शिव ने इस गुफा में रख दिया।

भगवान शिव ने की 108 पंखुड़ियों वाले कमल की स्थापना:
पाताल भुवनेश्वर गुफा में भगवान गणेश की ‍‍शिलारूपी मूर्ति के ठीक ऊपर 108 पंखुड़ियों वाला शवाष्टक दल ब्रह्मकमल सुशोभित है। इससे ब्रह्मकमल से पानी भगवान गणेश के शिलारूपी मस्तक पर दिव्य बूंद टपकती है। मुख्य बूंद आदिगणेश के मुख में गिरती हुई दिखाई देती है। मान्यता है कि यह ब्रह्मकमल भगवान शिव ने ही यहां स्थापित किया था।

गुफा का पौराणिक महत्व:
स्कंदपुराण के अनुसार स्वयं महादेव शिव पाताल भुवनेश्वर में विराजमान रहते हैं और अन्य देवी-देवता उनकी स्तुति करने यहां आते हैं। यह भी बताया गया है कि त्रेता युग में अयोध्या के सूर्यवंशी राजा ऋतुपर्ण जब एक जंगली हिरण का पीछा करते हुए इस गुफा में आ गए थे तो उन्होंने इस गुफा के अंदर महादेव शिव सहित 33 कोटि देवताओं के साक्षात दर्शन किए थे।

द्वापर युग में पाण्डवों ने यहां चौपड़ खेला और कलयुग में जगदगुरु आदि शंकराचार्य का 822 ई. के आसपास इस गुफा से साक्षात्कार हुआ तो उन्होंने यहां तांबे का एक शिवलिंग स्थापित किया।

माना जाता है सभी देवी-देवता आकर शिव जी की आराधना करते हैं। गुफा के अंदर का नजारा बेहद ही अलग है। जो इस गुफा में जाता है वो वो बाहर की दुनिया को भूलकर उसके रहस्यों में खो जाता है। अंदर जाने पर आपको पाता चलेगा कि गुफा के अंदर एक अलग ही दुनिया बसी हुई है।

गुफा के अंदर जाने के लिए लोहे की जंजीरों का सहारा लेना पड़ता है यह गुफा पत्थरों से बनी हुई है इसकी दीवारों से पानी रिश्ता रहता है जिसके कारण यहां के जाने का रास्ता बेहद चिकना है। गुफा में शेष नाग के आकर का पत्थर है उन्हें पृथ्वी पकड़ते देखा जा सकता है। इस गुफा की सबसे खास बात तो यह है कि यहां एक शिवलिंग है जो लगातार बढ़ रहा है। यहां शिवलिंग को लेकर यह मान्यता है कि जब यह शिवलिंग गुफा की छत को छू लेगा, तब दुनिया खत्म हो जाएगी।

यहां मौजूद है ये गुफा...
दरअसल हम जिस गुफा के बारे में बात कर रहे हैं वह देवभूमि उत्तराखंड के गंगोलीहाट की माता कालिका के सुप्रसिद्ध हाट कालिका मंदिर व पास ही स्थित है। समुद्र तल से 1350 मीटर की ऊंचाई पर स्थित इस पाताल भुवनेश्वर नाम के स्थान पर यह प्राकृतिक गुफा में धरती से 100 फीट नीचे व 160 मीटर लंबी है, यहां गहराई के 'पाताल' में आस्था का अलौकिक संसार मौजूद है।

इस गुफा के भीतर पाताल में देवलोक सरीखे रहस्य और रोमांच से भरे सात तलों वाली मानों कोई दूसरी ही दुनिया है, जिसकी महिमा स्कंद पुराण के मानस खंड में भी वर्णित है। कहते हैं कि आदि शंकराचार्य भी यहां आये थे। और उन्होंने ही यहां एक शिव-लिंग का भी निर्माण किया था।