Mythology of lord shiv: इस झरने के जल से स्वयं भगवान शिव करते हैं जलाभिषेक!

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Published: 27 Feb 2021, 10:52 AM IST

स्कंदपुराण के मानसखंड में भी मिलता है उल्लेख...

An old and great temple : lस्कंदपुराण के मानसखंड में भी मिलता है इस स्थान का उल्लेख Lord shiv Abhishek from the water of this Waterfall

सनातन धर्म के प्रमुख देवों मे से एक भगवान शिव के मंदिर देश दुनिया में कई स्थानों पर मौजूद हैं। लेकिन इनका मूल निवास स्थान कैलाश पर्वत माना जाता है। देवभूमि उत्तराखंड को देवभूमि का दर्जा कई वजहों से प्राप्त है।

एक ओर जहां आदिशक्ति माता को पहाड़ों वाली माता भी उनके निवास करने वाले स्थान के कारण कहा जाता है, वहीं भगवान शिव भी इसी पावन धरती पर निवासरत माने गए हैं। ऐसे में आज हम आपको भगवान शिव शंकर के एक ऐसे मंदिर के बारे में बता रहे हैं, जिसका उल्लेख स्कंदपुराण के मानसखंड में भी मिलता है। इसके अलावा यहीं ऐसा झरना भी है जिसके संबंध में मान्यता है कि इस झरने के जल से भगवान शिव जलाभिषेक करते हैं।

दरअसल ये मंदिर है पुंगेश्वर महादेव मंदिर... देवभूमि नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ,बेरीनाग (वेणीनाग) नागों की भूमि रूप मे प्रसिद्ध है। बाफिला ग्राम सभा-बेरीनाग(Berinag) शहर से 8 किलोमीटर दूरी पर में नागों के प्रमुख भगवान शिव का प्राचीन मंदिर है ,जिनकी पूजा यहां सुपारी(पुंगी)रूप में की जाती है यह आस्था का केंद्र एकमात्र ऐसा शिव मंदिर है जहां भगवान शिव का शिवलिंग सुपारी के रूप में उपस्थित है।

पुंगेश्वर शिव मंदिर का इतिहास
इस शिव मंदिर का निर्माण कत्यूरी राजाओं के शासन(7वीं-11वीं शताब्दी) में हुआ।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार प्राचीनकाल से आयोजित की जाने वाली कैलाश -मानसरोवर यात्रा की शुरूआत यात्री इस शिव मंदिर के दर्शन पश्चात ही आगे को प्रस्थान करते थे बाद में यात्रा मार्ग परिवर्तन के चलते यह परंपरा बंद हो गयी।

मान्यता है कि भगवान शिव पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती को ब्याह कर अपने मूल निवास कैलाश की ओर जब प्रस्थान कर रहे थे, तब भगवान शिव और माता पार्वती इस मार्ग से होकर गुजरे और उन्होंने यहां विश्राम किया, विश्राम के दौरान, उन दोनों की कलाई में बंधे आंचल ग्रंथ (शादी की रस्म में बांधा जाता है) से पुंगी(सुपारी) का दाना भूमि में गिरा, और जिस स्थान पर यह सुपारी का दाना गिरा वहां पर भगवान शिव सुपारी के रूप में स्थापित हुऐ।पुंगी नाम से विख्यात इस स्थल का नाम “पुंगीश्वर महादेव” पड़ा जो आज “पुंगेश्वर” के रूप में जाना जाता है।


स्कंदपुराण के मानसखंड(सप्ताशोतिमोअध्याय,व्यास उवाच,87) में भी इस मंदिर का नाम “पुंगीश्वर महादेव” के रूप में उल्लेखित है इस मंदिर के उत्तर में गौरीगंगा(गोरघटी) नदी बहती है इसमें उपस्थित झरना (“छीड़ का झरना ” छीड़केस्वर महादेव l) अत्यधिक खूबसूरत और अपने पूर्ण प्राकृतिक रूप में उपस्थित , जो पर्यटन की अपार संभावनाएं समेटे हुए है यह झरना 150 मीटर से अधिक ऊंचा है।

स्कंद पुराण के मानस खंड अनुसार ” इस झरने के जल से भगवान शिव जलाभिषेक करते हैं और झरने के किनारे पर रूद्र कन्याओं तथा नागकन्याओं से सेवित ‘लुंबका’ नाम की विशाल भव्य गुफा है जहां पर भगवान शिव ने कई वर्षों तक तपस्या की थी।”

मंदिर में वास्तुशिल्प
इस मंदिर का निर्माण कत्यूरी शैली में किया गया है ,कत्यूरी राजाओं को मंदिर निर्माण के लिए जाना जाता है इनके मंदिरों की पहचान वास्तुकला में मंदिर के ऊपर लकड़ी के खूबसूरत छत्रनुमा संरचना का निर्माण , शिलालेख और ताम्रपत्रों द्वारा किया जाता है।पुंगेश्वर महादेव मंदिर, जिसके गर्भगृह में सुपारी रूप में शिवलिंग , प्रांगण में नन्दी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं।