मथुरा-वृंदावन के कृष्ण मंदिरों में इस तरह मनाई जाती है अक्षय तृतीया

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Published: 10 Apr 2018, 01:54 PM IST

वृन्दावन के सप्त देवालयों में फूल बंगले अक्षय तृतीया से शुरू होते हैं। राधा श्यामसुन्दर मंदिर में चरण से लेकर मुकुट तक सर्वांग दर्शन होते हैं।

उत्तर प्रदेश में अक्षय तृतीया पर वृन्दावन के मंदिरों में ठाकुर को चंदन की पोशाक धारण कराने के लिये तैयारियां शुरू कर दी गई हैं। इस बार अक्षय तृतीया 18 अप्रैल को है। बांके बिहारी मंदिर के सेवायत आचार्य ज्ञानेन्द्र किशोर गोस्वामी के अनुसार नेपाल और मैसूर से विशेष रूप से मंगाए गए चन्दन को गुलाबजल, केवड़ा और केशर में डुबोया जाता है। बाद में इसी ठोस चन्दन को घिसकर उसका गाढ़ा लेप तैयार किया जाता है जिससे ठाकुरजी के वस्त्र बनाए जाते हैं। अक्षय तृतीया पर ठाकुरजी इसे धारण करते हैं। उन्होंने बताया कि बांकेबिहारी मंदिर में तो फूल बंगला चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी से बनना शुरू हो गया है जो हरियाली अमावस्या तक चलेगा।

इसी प्रकार वृन्दावन के सप्त देवालयों में फूल बंगले अक्षय तृतीया से शुरू होते हैं। राधा श्यामसुन्दर मंदिर में चरण से लेकर मुकुट तक सर्वांग दर्शन होते हैं, फूल बंगला सजाया जाता है तथा भजन संध्या के साथ प्रसाद का वितरण होता है। अक्षय तृतीया की तैयारी के साथ ही चन्दन का घिसना शुरू हो गया है। इस दिन से ब्रज के मंदिरों में ठाकुर को सत्तू का भोग, खरबूजे का पना, ककड़ी, अमरस आदि का भोग लगना शुरू हो जाता है तथा इसी दिन से ठाकुर की पंखा सेवा शुरू हो जाती है। अधिकांश मंदिरों में इस दिन ठाकुर के सर्वांग में चन्दन का लेप होता है इसलिए ब्रज के अधिकांश मंदिरों में अक्षय तृतीया के दो तीन सप्ताह पहले से ही चन्दन का लेप तैयार होना शुरू हो जाता है।

बांकेबिहारी मंदिर के सेवायत आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी के अनुसार इस दिन बांके बिहारी महाराज को रजत पायल धारण कराकर उनके श्री चरणों में सृष्टि का प्रतीक चन्दन का गोला रखा जाता है। सवा सौ गोस्वामी परिवारों में से प्रत्येक परिवार से एक किलो चन्दन का गोला ठाकुर जी को समर्पित किया जाता है। उन्होंने बताया कि इस दिन बांकेबिहारी मंदिर तथा व्रज के कई मंदिरों में चरण दर्शन वर्ष में केवल एक बार ही होते हैं। सप्त देवालयों में राधारमण मंदिर में इस दिन से राजभेाग आरती बत्ती की न होकर फूलों की होती है। शरद उत्सव तक यही क्रम चलता रहता है।

मंदिर के सेवायत आचार्य के अनुसार ठाकुरजी की बालस्वरूप सेवा होने के कारण ठाकुरजी को गर्मी से बचाने के लिए अक्षय तृतीया के दिन चन्दन में कपूर, केसर मिलाकर और फिर ठाकुर का श्रंगार चंदन के पैजामा, अंगरखी, पगड़ी, पटका बनाकर अद्भुत रूप से किया जाता है। लाला को नजर लगने से बचाने के लिए इस दिन झांकी दर्शन होते हैं। अक्षय तृतीया से शरदपूर्णिमा तक ठाकुर जी जगमोहन में विराजते हैं।

इस दिन मंदिर में सतुआ के लड्डू और फलों का भोग लगता है। उधर मदनमोहन मंदिर के सेवायत सनातन किशोर गोस्वामी ने बताया कि रासलीला के दौरान ठाकुर को तपिश लगने पर राधारानी ने उनसे शरीर में चन्दन लेपने को कहा था। इस दिन ठाकुर के शरीर पर चंदन लेपकर सत्तू एवं शीतल फलों का भोग लगता है। इस मंदिर में विदेशी भक्त भी अक्षय तृतीया के लिए चंदन घिसकर पुण्य कमा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस दिन ठाकुर जी के शरीर में चंदन लेपन के बाद रायबेल के सुगंधित पुष्पों से श्रंगार कर सत्तू, ऋतुफल,ककड़ी, खरबूजा, शर्बत, किशमिश, मुनक्के आदि से ठाकुर जी का भोग लगाते हैं।

बताया जाता है कि मंदिर में ठाकुर राधादामोदर महाराज को चंदन लेपन की शुरूवात श्रील जीव गोस्वामी प्रभुपाद ने शुरू की थी। मंदिर के चारों ठाकुरों कृष्ण कविराज गोस्वामी के ठाकुर राधा वृन्दावन चन्द्र,जीव गोस्वामी के ठाकुर राधा दामोदर महराज, कविवर जयदेव के ठाकुर राधा माधव एवं भूगर्भ गोस्वामी के ठाकुर श्री राधा छैल चिकन को चंदन लेपन किया जाता है। राधा बल्लभ मंदिर में चंदन का विशेष श्रृंगार शीतल भोग, अंकुरित दाल के भोग के साथ ग्रीष्म ऋतु का श्रृंगार होता है। मंदिर के सेवायत गोविन्द गोस्वामी के अनुसार इस दिन से ही फूल बंगला बनना शुरू हो जाता है। गोविन्द देव मंदिर के सेवायत आचार्य सुमित गोस्वामी ने बताया कि प्राचीन मंदिर में जहां गिर्राज जी का चन्दन का श्रंगार किया जाता है और शीतल पदार्थों का भोग लगता है वहीं नवीन मंदिर में राधा गोविन्द देव का चन्दन से श्रंगार होता है।

वृन्दावन के सप्त देवालयों में गोपीनाथ मंदिर में चन्दन का अभिषेक कर ठाकुर को अधोवस्त्र धारण कराए जाते हैं। इस दिन से रथयात्रा तक शालिग्राम भगवान को मध्यान्ह में जलधारा में विराजमान करते हैं। वृन्दावन के सप्त देवालयों में मशहूर गोपीनाथ मंदिर के सेवायत राजा गोस्वामी ने बताया कि इस दिन से ही मंदिर में चमर की आरती शुरू हो जाती है तथा रथयात्रा तक सालिगराम जी को जलधारा में विराजमान करते हैं। कुल मिलाकर वृन्दावन के मंदिरों में इस दिन ठाकुर का चंदन श्रृंगार करने की होड़ सी लग जाती है। जहां देखो वहीं भक्तिभाव में डूबे भक्तों की कतारें अपने प्रिय प्रभु की सेवा करने के लिए तत्पर दिखाई देती है।

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