छोटी मछली-बड़ी मछली

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Published: 18 Jul 2020, 12:12 PM IST

ईश्वर की लीला मछलियों को छोटी-बड़ी करने में ही दिखाई देती है। डार्विन भी कह गया-समर्थ ही टिकता है। महाभारत का युद्ध क्या था? छोटी मछली को निगलने का प्रयास ही तो था। कृष्ण नहीं होते तो? राजस्थान हो, भारत हो, विश्व पटल हो अथवा सागर की गहराई, प्रकृति के बाहर कुछ नहीं है।

गुलाब कोठारी

ईश्वर की लीला मछलियों को छोटी-बड़ी करने में ही दिखाई देती है। डार्विन भी कह गया-समर्थ ही टिकता है। महाभारत का युद्ध क्या था? छोटी मछली को निगलने का प्रयास ही तो था। कृष्ण नहीं होते तो? राजस्थान हो, भारत हो, विश्व पटल हो अथवा सागर की गहराई, प्रकृति के बाहर कुछ नहीं है। वही हमें पैदा करती है, पालती-पोषती है, और अन्त में समेट लेती है। सारे चौसर-पासे यहीं धरे रह जाते हैं। सिवाय कर्मों के कुछ भी साथ नहीं जाता। याद किसको रहता है!
राजस्थान का संघर्ष छोटी-बड़ी मछली का नहीं है। अहंकार और अज्ञानता का है। महत्वाकांक्षा और खोटी सलाह देने वालों का है। आज एक पार्षद चुनाव जीतकर पांच साल खुश रहता है। हमारे यहां कहावत है कि 'पेट में जौ जब चुभने लग जाते हैं...।'

सचिन पायलट (Sachin Pilot) को अचानक लगा कि मैं मुख्यमंत्री क्यों नहीं! उप मुख्यमंत्री का पद अपमान का घूंट लग रहा था। सत्ता का नशा ऐसा ही होता है। कोई मर्यादा, लाज-शर्म काम नहीं करती। न अपनी औकात समझ में आती है। बस, हो गए कपड़ों के बाहर।

यह सिलसिला सचिन का शुरू किया हुआ नहीं है। राहुल गांधी (Rahul Gandhi) के सिर पर राजघराने की तरह ताज रखा और उनको मुंह की खानी पड़ी। उन्होंने जिन-जिनको पदासीन किया, बिना अनुभव के, सारे राजकुमार कांग्रेस (Congress) की नाव में छेद कर रहे हैं। ज्योतिरादित्य जी ने अपनी कीमत वसूली और बिक गए। सचिन ने कांग्रेस को धूल चटा दी। बिना अनुभव के राहुल और युवा टीम अहंकार में ही तो जी रही थी। 'हल्दी का टुकड़ा पाकर पंसारी हो चले थे।' किसी को पार्टी की चिन्ता नहीं है। व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पूरी होनी चाहिए। कांग्रेस भले ही डूब जाए।

दो बंदरों की लड़ाई में बिल्ली की मौज! कांग्रेस की दोनों मछलियां भाजपा की केन्द्र सरकार के आगे छोटी पड़ गईं। जो घटनाक्रम मध्यप्रदेश में घटा था, वही यहां भी दोहराया जाएगा। वहां सिंधिया की स्थिति सांसद के रूप में थी। यहां सचिन सड़क पर हैं। आलाकमान भी सहायता करने की क्यों सोचेगी? यह तो आगे भी कांग्रेस को ही डुबोने की तैयारी कर रहे हैं।

भारत के सिर पर भी आज तो चीन बड़ी मछली बनकर बैठा है। नेपाल साथ हो गया। चीन के निर्देश पर पिछले सप्ताह ही पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पहली उच्च स्तरीय वार्ता हुई है। एक अनहोनी घटना ही मानी जाएगी। उधर अमरीका के डर से ईरान भी चीन से हाथ मिला रहा है। अमरीका आज भी अपने-आपको सबसे बड़ी मछली समझे बैठा है। यह अलग बात है कोरोना उससे भी बड़ी मछली साबित हो गया। अमरीका में तो प्राकृतिक आपदाओं का दौर भी काफी समय से जारी है। चारों ओर महाभारत की तैयारियां चल रही हैं। अपने-अपने शंखनाद हो रहे हैं।

राजस्थान में भी भाजपा ने सिंहनाद तो कर दिया है। जन प्रतिनिधि बेशर्मी से अपनी बोलियां लगवा रहे हैं। बड़ी रकम चर्चा में है, और मध्यप्रदेश में देख भी चुके हैं। जहां राजे-महाराजे बिकने को उतावले हों, वहां एक विधायक की क्या कहें! उसके लिए तो यह राशि चांद पर पहुंचने जैसी है। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ (Former MP CM Kamalnath) से सारा वृतान्त सुना जा सकता है। वे आज भी सम्पूर्ण दल-बदल सहित सारी सीटें वापिस जीतने को जूझ रहे हैं। सचिन ने राजस्थान में भाजपा की सारी कठिनाइयां हल कर दी। वैसे भी अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। सचिन अपने अहंकार (ठसका) बनाए रखने के एवज में गहलोत सरकार गिराकर अधिक संतुष्ट होंगे।

भाजपा के शंखनाद से कांग्रेसी विधायक भी कपड़ों से बाहर हो रहे हैं। उनकी बांछें 25-30 करोड़ के सपनों से खिल उठी हैं। अशोक जी, मंत्रिमण्डल विस्तार और राजनीतिक पद स्थापन क्या इस बाढ़ के वेग को रोक पाएगा और कब तक? बड़ी मछली तो खाने को है। इस अनूठे महाभारत के हम साक्षी होंगे। हमारे लिए न तो राहुल, सचिन मुद्दा हैं और न गहलोत। देश की चिंता है कि लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष को कैसे जिंदा रखा जाए।