शरीर ही ब्रह्माण्ड : असुर भाव भी हो जाए देव

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Updated: 25 Sep 2021, 08:21 AM IST

- व्यक्ति पूर्व जन्म की दैवीय सम्पत्तियों से अथवा आसुरी सम्पत्तियों से युक्त होकर आता है। किन्तु वर्तमान जन्म के संस्कारों के अनुरूप वह अपने दैवीय अथवा आसुरी भावों से मुक्त हो सकता है।
- जिस प्रकार जब तक बादल है तब तक प्रकाश आवरित रहता है, वायु रूप उपाय से बादल के हटने पर प्रकाश प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार हम जन्मसिद्ध संस्कार को वैध संस्कारों से बदलने में समर्थ हो सकते हैं। जन्मसिद्ध दैवीसम्पत्ति भी आसुरी सम्पत्ति बन जाती है तथा आसुरी सम्पत्ति भी दैवी सम्पत्ति में बदलती देखी जाती है।

गुलाब कोठारी, (प्रधान संपादक पत्रिका समूह)

गीता में कृष्ण स्वयं को अव्यय कहते हैं। समस्त संसार में अपनी व्यापकता को भी कह रहे हैं कि मैं सभी जगह विद्यमान हूं क्योंकि जीवलोक में मेरा ही अंश है-ममैवांशो जीवलोके। प्रत्येक कण में स्थित इस अव्यय की दो प्रकार की प्रकृतियां कही जाती हैं-अन्तरंग तथा बहिरंग। अन्तरंग प्रकति मूल प्रकृति है जिसमें सत्व, रजस् तथा तमस् तीनों गुण साम्य अवस्था में रहते हैं, यह आत्मा का अपना धर्म है। जबकि बहिरंग प्रकृति आत्मा के विकास को आवरित करती हुई, आत्मा का अधर्म बन जाती है। जाति, आयु तथा भोग तीनों की मूल प्रतिष्ठा बहिरंग प्रकृति है। इसमें ज्ञान और कर्म से उत्पन्न भावना और कामना संस्कार जुड़ जाते हैं। इन संस्कारों की भी दो अवस्थाएं हैं-नैसर्गिक तथा सांसारिक। पूर्व जन्म में संचित संस्कार अगले जन्म के कारण बनते हैं। अत: इस जन्मान्तरीय संस्कार को नैसर्गिक कहा गया है। वर्तमान जन्म में ज्ञान तथा कर्म से उत्पन्न संस्कार को सांसारिक कहते हैं। नैसर्गिक संस्कार जन्मसिद्ध है जबकि सांसारिक संस्कार अधिकारसिद्ध। ये दोनों ही संस्कार जब सत्व गुण से युक्त होते हैं तो दैवीसम्पत्ति कहलाते हैं। तमोगुण से युक्त होने पर इनको आसुरी सम्पत्ति कहते हैं। जब ये रजोगुण से युक्त हो जाते हैं तो ये ही मानवीय सम्पत्ति कहे जाते हैं। इस सम्पत्ति में दैवी तथा आसुरी दोनों सम्पत्तियों का समन्वय रहता है। अर्थात् दिव्य संस्कारों से मनुष्य देवभावात्मक भी बन सकता है एवं आसुरी संस्कारों से असुर भी बन सकता है।

जन्मसिद्ध नैसर्गिक संस्कार मूल होते हैं। अधिकार शब्द वर्णव्यवस्था कासूचक है। जिसके वीर्य में जन्मत: जो वर्ण आता है, वह उसी के अनुरूप बनता है। जन्मसिद्ध संस्कार देश, काल, पात्र, द्रव्य, शुक्र, शोणित आदि दोषों से युक्त रहते हैं। अत: देखा जाता है कि जन्म के ब्राह्मण माता-पिता से उत्पन्न सन्तान जन्म से ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणत्व से वंचित रह जाती है। इन दोषों को हटाने के लिए जो संस्कार किए जाते हैं वे वैध संस्कार कहे जाते हैं। जन्मसिद्ध संस्कार को बताते हुए कृष्ण कहते हैं कि जिसकी जैसी प्रकृति है उसे बाध्य होकर उसी का अनुसरण करना पड़ता है। ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा अर्थात् शरीर का व्यापार करता है। सब प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चलते हैं। मेरी आज्ञा अथवा अन्तर्यामी का निर्देश रूप निग्रह इसमें क्या करेगा?

'सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेज्र्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति ॥'
(गीता 3/33)

कहावत भी है कि 'ज्यां का पड्या सुभाव, जासी जीव सूं'-जिसका जैसा जन्मसिद्ध स्वभाव है वह उसके मरने पर ही मिटता है अर्थात् जन्मसिद्ध प्रकृति नहीं बदलती।

जन्मसिद्ध संस्कार हमारा उक्थ (केन्द्र) है। जैसा उक्थ होता है वैसा ही अर्क (रश्मियां) निकलता है। यदि किसी उपाय से उक्थ का स्वरूप बदल दिया जाता है तो स्वभाव का भी बदलना सम्भव हो सकता है। जिस प्रकार जब तक बादल है तब तक प्रकाश आवरित रहता है, वायु रूप उपाय से बादल के हटने पर प्रकाश प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार हम जन्मसिद्ध संस्कार को वैध संस्कारों से बदलने में समर्थ हो सकते हैं। जन्मसिद्ध दैवीसम्पत्ति भी आसुरी सम्पत्ति बन जाती है तथा आसुरी सम्पत्ति भी दैवी सम्पत्ति में बदलती देखी जाती है। संध्या, व्रत, उपवास आदि सात्विक संस्कारों से असुर भाव दब जाते हैं। दिव्य संस्कार विकसित हो जाते हैं। जबकि अभक्ष्य (मदिरा, मांस आदि) से उत्पन्न तामसिक संस्कारों से दैवीसम्पत्ति दब जाती है। इन दोनों ही सम्पत्तियों से आत्मा का ग्रन्थि बन्धन हो जाता है। शुभ भावना-कामना से दैवीसम्पत्ति का आवरण चढ़ता है तथा अशुभ भावना-कामना से आसुरी-सम्पत्ति का लेप होता है।

अच्छा और बुरा दोनों ही कामना पर निर्भर है। यदि कामना का बन्धन नहीं है तो न पुण्य है, न पाप है, न अच्छा है, न बुरा है, न दु:ख है, न सुख है। आत्मा की स्वतन्त्रता के लिए दोनों ही सम्पत्तियों का परित्याग आवश्यक है। अत: कृष्ण ने गीता में समत्व योग की बात कही है-'समत्वं योग उच्यते'। द्वन्द्वों में समभाव रखना ही समत्व कहा जाता है। इस अवस्था में ही दैवी तथा आसुरी दोनों ही सम्पत्तियां आत्मा के बन्धन का कारण नहीं बनती। आत्मा का यह ग्रन्थिभेदन भोग, प्रतिबन्धकत्व (एक सम्पत्ति को दूसरी सम्पत्ति से दबाना) और समत्व इन तीन उपायों से सम्भव है।

तीनों गुणों के अनुरूप प्रकृतिसिद्ध कर्मों को करना ही भोग है। प्रत्येक जीव में तीनों गुण रहते हैं। इनमें सत्वगुण सुख को देने वाला है। रजोगुण दु:ख का कारक है। तमोगुण मोह पैदा करने वाला है। सत्व धर्म तथा तम अधर्म है। रजोगुण दोनों के साथ रहता है क्योंकि यह रजोगुण ही धर्म अथवा अधर्म की ओर प्रेरित करता है। तीनों गुणों में से गति सिर्फ रजोगुण में ही होती है- रज: चलनात्मकम्। रजोगुण ही प्राण है। सत्व गुण मन तथा तमगुण वाक् है। मानवीय सम्पत्ति चूंकि रजोगुणयुक्त कही गई है अत: मानव धर्म और अधर्म दोनों के मध्य में स्थित रहता है। इस प्रकार वह अपने जीवन में तीनों गुणों का भोग करता रहता है। मनुष्य कभी सुखी देखा जाता है। कभी दु:ख के सागर में डूब जाता है अथवा कभी तटस्थ भी दिखाई देता है। अपने जीवन काल में प्रत्येक व्यक्ति तीनों अवस्थाओं का अनुभव करता हैं। आपके जीवन में जितना सुख मिलता है वह शुभ संस्कार का भोग है। जितना दु:ख मिलता है वह अशुभ संस्कार का भोग है। इन सुख-दु:ख आदि अवस्थाओं के क्रमिक भोग से जिस समय संचित संस्कार समाप्त हो जाते हैं उस समय आत्मा पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो जाता है। इस भोग के सम्बन्ध में हमारा प्रयास व्यर्थ है क्योंकि प्रकृति के अनुसार ही इन संचित संस्कारों का क्रमश: भोग हाता है।

दूसरा उपाय प्रतिबन्धकत्व है। जीवात्मा अपने पूर्वजन्मों के अनुरूप जाति के भावना तथा कामना, संस्कारों को लेकर आता है। जन्म के पश्चात् उनसे विपरीत संस्कारों से जीवात्मा का युक्त होना ही पूर्व संस्कारों का प्रतिबन्ध होना है। इन विजातीय संस्कारों से पूर्व संस्कार उसी प्रकार क्षीण हो जाते हैं जैसे सूर्य के प्रकाश से चन्द्रमा की चांदनी दिखाई नहीं देती। व्यक्ति पूर्व जन्म की दैवीय सम्पत्तियों से अथवा आसुरी सम्पत्तियों से युक्त होकर आता है। किन्तु वर्तमान जन्म के संस्कारों के अनुरूप वह अपने दैवीय अथवा आसुरी भावों से मुक्त हो सकता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति आसुरी भाव वाला है तो वह दु:ख का भोग करता है। इस संस्कार का उपशमन वह दैवीय सम्पत्ति को बढ़ाकर कर सकता है। पृथ्वी स्वयं तामसिक पिण्ड है। पार्थिव प्राणी जन्म से ही तामसिक होता है। उसे ज्ञान प्राप्त करके सात्विक होते हुए निस्त्रैगुण्य होना है।

तीसरा उपाय समत्व ही श्रेष्ठ उपाय है। समत्व से विद्याबल बढ़ता है। जिससे अविद्या बल स्वत: ही निर्बल बन जाता है। जैसे गर्म लोहे पर गिरने वाली जल की बूंदे उसी समय विलीन हो जाती है। वैसे ही विद्या बल के उदय से संस्कार उसी क्षण भस्म हो जाते हैं। कृष्ण भी इसी बात को कहते हैं कि 'ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा'। इसका अर्थ है कि-समत्व बुद्धि युक्त मानव ही समस्त देवासुर भाव से मुक्त होने में समर्थ हो सकता है।
क्रमश: