जनता का हिसाब

|

Published: 06 Nov 2020, 08:34 AM IST

  • कुल मिलाकर कह सकते हैं कि चुनाव ट्रंप सरकार की अकर्मण्यता का प्रतिबिम्ब है। ट्रंप के अहंकार ने लोकतंत्र की मर्यादाओं को कई बार तोड़ा है।

गुलाब कोठारी

लोकतंत्र में अहंकार के रावणों को मारने के लिए राम के अवतरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। जनता यदि समझदार है तो स्वयं ही हिसाब कर लेती है। समझदार का अर्थ बुद्धिमान होने से नहीं है। अर्थ यह है कि देश के भविष्य को ध्यान में रखकर, अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर अपनी भूमिका निभाना। आज हुई अमरीकी चुनावी परिस्थिति ने विश्व के समक्ष एक बहुत बड़ा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया। कोई सम्प्रदाय, धर्म, वंशवाद या क्षेत्रवाद जनता के निर्णय को प्रभावित नहीं कर पाया। हमारे यहां तो यह बात आम है। देश आगे बढ़े, न बढ़े, हमारा प्रतिनिधि (जाति-धर्म आदि का) ही जीतना चाहिए। विकास गौण होता रहा है।

अमरीकी लोकतंत्र में भी कुछ स्थानीय संकीर्णता तो रहती ही है, किन्तु अधिकांशत: जनमानस प्रभावी रहता है। चार साल पहले वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘अमरीकी गौरव’ के नारे पर चुनाव जीता था। आज जनता ने धराशायी कर दिया। हमारी तरहमशीनों की गड़बड़ी के, वोटरों को शराब-नोट बांटने के आरोप नहीं लगे। ट्रंप का हार से मुंह छिपाने के लिए कोर्ट में जाना साधारण बात है। हमें भी इन चुनावों से देशहित की प्राथमिकता सीखनी चाहिए।

जिन युवाओं ने ट्रंप को नौकरियों की आस में भारी समर्थन दिया था, वे पिछले चार सालों में अधिक बेरोजगार हो गए। पिछले चार वर्षों में अमरीकी लोकतंत्र कुछ महत्वाकांक्षाओं पर आकर ठहर गया था। ट्रंप का ‘अमरीकी फस्र्ट’ का नारा, राष्ट्रवाद के विरुद्ध काम कर गया। पूरा देश नस्लभेद की आग में जल उठा। हालांकि ट्रंप इसे सांस्कृतिक संघर्ष कहते रहे। इसका प्रभाव तो नेटिव अमरीकन तक पर पड़ गया। लोकतंत्र बंट गया, बिखर गया।

‘अमरीका फस्र्ट’ का दूसरा प्रभाव यह भी पड़ा कि मूलनिवासी और प्रवासी एक-दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हो गए। इनमें घृणा का वातावरण फैल गया। इसके चलते वीजा कानूनों में परिवर्तन की हवा ने नया विरोधी माहौल खड़ा कर दिया था।

भारतीय मूल के मतदाता भी लगभग दो प्रतिशत हैं, जो आहत हुए थे। पूरे चुनाव अभियान में ट्रंप ने मोदी की दोस्ती को भुनाने का प्रयास किया। वहीं बाइडेन ने भारतीय मूल की कमला हैरिस को आगे करके उन्हें आकर्षित करने का प्रयास किया। इन सबके चलते मतदाता ने सिद्ध कर दिया कि लोकतंत्र में जनता स्वयं आवश्यकता के अनुरूप सुधार कर सकती है। देश का भाग्य जनता के हाथ में ही है। यह एक बात भी हम सीख गए, तो उद्धार हो जाएगा। जो कुछ पिछले 70 वर्षों से भोग रहे हैं, नई पीढ़ी को नहीं भोगना पड़ेगा।

आप में से जिन्होंने भी दोनों उम्मीदवारों की अन्तिम संवाद (फाइनल डिबेट) देखी हो, तो कोरोना में प्रशासन की भूमिका का सारा दोष ट्रंप के सिर पड़ता नजर आया होगा। ट्रंप के निर्णयों की सर्वाधिक निन्दा हुई कि अमरीका में मृत्यु का आंकड़ा इतना बड़ा हो गया। चीन में इतने लोग नहीं मरे। इससे स्थानीय लोगों में एक अलग ही रोष था।

अमरीका एक मुक्त समाज के रूप में जाना जाता है। पिछले चार सालों में बहुत कुछ उलट हो गया। जो वादे ट्रंप ने किए थे, पूरे नहीं हुए। आज तक कोरोना की वैक्सीन भी नहीं आ पाई। स्वयं ट्रंप बिना मास्क रहते थे। जनता का विश्वास ट्रंप प्रशासन के प्रति घटता ही गया।
बाइडेन की छवि साफ सुथरी रही है। ओबामा के साथ उपराष्ट्रपति रह चुके हैं। शान्त स्वभाव के तथा शुद्ध अमरीकी विचारधारा के हैं। वे ट्रंप प्रशासन के विरोध में भी बोलते रहे हैं।

कुल मिलाकर कह सकते हैं कि चुनाव ट्रंप सरकार की अकर्मण्यता का प्रतिबिम्ब है। ट्रंप के अहंकार ने लोकतंत्र की मर्यादाओं को कई बार तोड़ा है। प्रेस की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तो मानों शत्रु ही थे। कई बार पत्रकारों को प्रेसवार्ता में बेइज्जत करते देखे गए। उन पर निजी स्वार्थों के लिए सत्ता के दुरुपयोग के भी कई आरोप लगे। यह अलग बात है कि वे भारत के अभिन्न मित्र रहे।

अमरीकी चुनावों का विश्व राजनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। चीन, रूस, ईरान और भारत सहित कुछ देशों की दृष्टि उधर ही टिकी रहेगी। काश! हमारी चुनाव संस्था भी इसी तरह स्वतंत्र चुनाव करा सके, ताकि हम अपना भी खोया हुआ गौरव पुन: प्राप्त कर सकें।