प्रवाह: फीस की टीस

|

Published: 06 Nov 2020, 08:41 AM IST

  • अभिभावकों की पीड़ा सामने लाने के लिए ‘पत्रिका’ ‘फीस की टीस’- नाम से अभियान शुरू कर रहा है। अभिभावक अपनी पीड़ा और अनुभव साझा करेंगे तो हमें खुशी होगी।

भुवनेश जैन

आज देश के हजारों-लाखों अभिभावक खून के आंसू रो रहे हैं। कोरोना महामारी ने पहले ही उनकी कमर तोड़ रखी है, अब बच्चों का भविष्य भी अंधकार में डूबा नजर आ रहा है। यों तो देश में स्कूलों की कोई कमी नहीं है, पर बच्चों को निजी स्कूलों में ‘स्टार’ श्रेणी की शिक्षा दिलाने की लालसा अब उनके गले की हड्डी बन गई है। राजस्थान में तो स्थिति और भी विकट है जहां बहुत से निजी स्कूल संचालक फीस के मामले में टस से मस होने को तैयार नहीं है। अभिभावकों का तो आरोप है कि बहुत से स्कूल मालिक बच्चों के नाम काटने की धमकी दे रहे हैं।

महामारी के दौर में निजी क्षेत्र में काम करने वाले और अपना रोजगार खुद चलाने वालों के सामने संकट ज्यादा बड़ा है। बहुत से लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। काम-धंधे चल नहीं रहे। वेतन में कटौती हो चुकी है। अभिभावक इन सब बातों को लेकर निजी स्कूलों के आगे गुहार कर रहे हैं। उनको केवल सरकारी कर्मचारियों के वेतन नजर आ रहे हैं। महामारी के दौरान निजी स्कूलों के खर्च काफी कम हो चुके हैं। स्कूल भवन का रखरखाव, बिजली का खर्च, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियां, पानी, सफाई, सुरक्षा आदि अनेक मद हैं, जिन पर खर्च सामान्य दिनों के मुकाबले निश्चित तौर पर बेहद कम रह गया है। पर वे इसे मानने को तैयार नहीं हैं। वे कहते हैं शिक्षकों को वेतन देना पड़ रहा है।

तो क्या वे सामान्य दिनों के बराबर वेतन दे रहे हैं? उतनी ही संख्या में शिक्षक उनके यहां कार्यरत हैं? क्या वे ईमानदारी से शिक्षा के अधिकार के अन्तर्गत गरीब विद्यार्थियों को निशुल्क शिक्षा दे रहे हैं? हो सकता है- कुछ स्कूल इस मामले में ईमानदारी बरत रहे हों, पर क्या अधिकांश निजी स्कूल ऐसा दावा कर सकते हैं?

तर्क दिया जा रहा है कि विद्यार्थियों को ऑनलाइन शिक्षा दी जा रही है। सब जानते हैं ऑनलाइन शिक्षा पर कितना खर्च आता है। न कक्षाएं, न बिजली, न अन्य पाठ्येत्तर गतिविधियां। कक्षा में तो विद्यार्थियों की सीमित संख्या होती है, ऑनलाइन में विकल्प खुले हैं। कई सेक्शन की कक्षाएं भले ही एक साथ चलाओ। यहां भी टीवी, मोबाइल, बिजली, डेटा का अतिरिक्त भार अभिभावकों पर ही आता है।

फिर शुरुआती कक्षाओं के शिशुओं को ऑनलाइन शिक्षा देना तो उनके स्वास्थ्य और आंखों की रोशनी के साथ खिलवाड़ करना ही है। बहुत से अभिभावक संचालकों की चेतावनी के बाद किसी तरह फीस भर भी चुके हैं। जो नहीं भर पा रहे हैं, वे चक्कर लगा रहे हैं। आशा भरी नजरों से सरकार की ओर देख रहे हैं। महामारी एक्ट में सरकार सब पर नियंत्रण कर लेती है, पर चिकित्सा और शिक्षा जैसी आवश्यक क्षेत्रों से आंखें मूंद लेती है। सरकार में किसी को मध्यम वर्ग की तो कतई परवाह नहीं है। मध्यम वर्ग न संगठित है और न आवाज उठाना जानता है, इसलिए पिसता भी वही सबसे ज्यादा है।

‘पत्रिका’ ऐसे लोगों की आवाज उठाने में पहले भी पीछे नहीं रहा और आगे भी अपना कत्र्तव्य निभाता रहेगा। अभिभावकों की पीड़ा सामने लाने के लिए ‘पत्रिका’ ‘फीस की टीस’- नाम से अभियान शुरू कर रहा है। अभिभावक अपनी पीड़ा और अनुभव साझा करेंगे तो हमें खुशी होगी।