साक्षात्कार : नई दुनिया को नए विचारों की जरूरत, महामारी ने बदला शक्ति संतुलन

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Updated: 13 Oct 2021, 08:39 AM IST

साक्षात्कार: पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की प्रमुख यामिनी अय्यर....

पड़ोस में अफगानिस्तान से लेकर सुदूर अमरीका तक तेजी से बदलाव हो रहे हैं। सीमा पर चीन से हमारी तनातनी बरकरार है। नेपाल जैसे ऐतिहासिक करीबी वाले देशों से भी हमारे रिश्तों के समीकरण बदल रहे हैं। कोरोना की वैश्विक महामारी ने जीवन के हर क्षेत्र की तरह वैश्विक संबंधों को भी प्रभावित किया है। बदले हालात में हमारे लिए कुछ अवसर हाथ आए हैं तो कुछ नई चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। बदलते वैश्विक परिदृश्य के मायने और इनमें भारत के लिए अवसर और चुनौतियों पर सरन और अय्यर से 'पत्रिका' के मुकेश केजरीवाल की बातचीत के प्रमुख अंश...

कोरोना ने जीवन के हर पहलू पर प्रभाव डाला है। हमारी अंतरराष्ट्रीय भूमिका और स्थिति को इसने किस तरह प्रभावित किया?
कोविड-19 महामारी ने अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन और राष्ट्रों के आपसी संबंधों पर भी गंभीर प्रभाव डाला है। भारत के लिए मौके और चुनौतियां दोनों बढ़े हैं। पहले से जारी कुछ ट्रेंड और तेज हुए। वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र ट्रांस-अटलांटिक क्षेत्र से एशिया की तरफ हस्तांतरित हो रहा था, यह बदलाव और तेज हो गया। चीन की शक्ति में नाटकीय तरीके से विकास हुआ है। एशिया में अगर वर्तमान या भविष्य में कोई प्रतिद्वंद्विता होगी तो वह भारत और चीन के बीच ही होगी। बदलते वैश्विक वातावरण में हम चीन की चुनौती का सामना कैसे करेंगे, यह देखना हमारे लिए अहम है। हमारे लिए जो नए अवसर पैदा हुए हैं अगले दस साल के दौरान हम उनका लाभ उठाने के लिए क्या तैयारी कर रहे हैं वह भी ध्यान रखना जरूरी है।

नियंत्रण रेखा पर लंबे समय से चीन से तनातनी जारी है। 13वें दौर की बातचीत भी नाकाम रही...
इसका असल कारण है भारत और चीन के बीच शक्ति संतुलन में आया बदलाव। 2005-06 में लोग कह रहे थे कि भारत अगला चीन है। वर्ष 2007-08 में जब वैश्विक वित्तीय संकट आया था, उस समय भारत तेज गति से बढ़ रहा था और चीन नीचे आ रहा था। सुनामी के दौरान भारतीय नौसेना ने देशों को सहारा दिया। विश्व में भारत की सकारात्मक छवि बन रही थी कि एक बड़ा देश तेजी से विकास कर रहा है, बाकी विश्व के लिए भी आर्थिक अवसर बढ़ रहे हैं। लेकिन उसके बाद हमारी आर्थिक वृद्धि दर 7-8 प्रतिशत से 4-6 प्रतिशत पर आ गई। दोनों देशों के बीच फासला बढ़ता गया। इसलिए आज चीन हमारे सामने चुनौती बन गया है। सीमा पर अडिय़ल रवैया अपना रहा है।

लेकिन फिलहाल नियंत्रण रेखा पर जो स्थिति बनी हुई है उससे कैसे निपटें?
हमारा मानना है कि इस समय चीन जहां है, उससे आगे बढऩा चाहेगा तो उसे रोकने की शक्ति हमारे पास है। लेकिन जहां वह बैठा है वहां से तुरंत बाहर निकाल देने की स्थिति में हम नहीं। हमारा लक्ष्य यह हो कि वह जब भी ऐसी कुटिल चाल चले तो उसे यह महंगा पड़े। अगर वह एक जगह हमारे लिए चुनौती खड़ी करता है तो दूसरी जगह हम उसे चुनौती देने की स्थिति में हों। हमें अपनी सैन्य शक्ति को भी बढ़ाना होगा।

अफगानिस्तान में आए बदलाव, आतंकी संगठनों पर इसके प्रभाव और पाकिस्तान व चीन की साझेदारी को किस तरह देखते हैं?
अफगानिस्तान में तालिबान का वापस आना हमारे लिए झटका तो है ही। कोई कहे कि इससे हमारी सुरक्षा स्थिति पर फर्क नहीं पड़ेगा तो वह बिल्कुल गलत है। हमारे लिए आतंकवादी गतिविधियों का खतरा बढ़ेगा। जम्मू-कश्मीर में दिख भी रहा है। लोगों ने कहा कि नई सत्ता कितनी भी क्रूर हो लेकिन स्थिरता तो होगी। लेकिन ऐसा भी नहीं होता दिख रहा। चीन को भी डर है कि कहीं अफगानिस्तान उन आतंकवादी संगठनों का ठिकाना नहीं बन जाए जो उसके शिनजियांग सूबे में सक्रिय हैं। पाकिस्तान में भी सत्ता को सरकार विरोधी शक्तियों को और बल मिलने का डर सता रहा है। पिछले दिनों उत्तरी पाकिस्तान में हमले हुए भी हैं। आज पाकिस्तान और चीन, अफगानिस्तान की नई सत्ता का समर्थन तो कर रहे हैं, लेकिन आने वाले दिनों में उनके लिए यह कितना फायदेमंद रहे, इस बारे में पुख्ता तौर पर कुछ कहना मुश्किल है।

बाइडन प्रशासन के रहते हुए अमरीका से हमारे संबंधों को ले कर कैसी उम्मीदें की जा सकती हैं?
पिछले 15 वर्षों में हमारे रिश्ते बहुत मजबूत हुए। वर्ष 2005 में परमाणु समझौते पर चर्चा शुरू हुई थी। आज राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद रोधी विषयों पर हमारे गहरे संबंध हैं। इनको आगे ले जाने के लिए मजबूत आधार स्तम्भ हैं। संबंधों को प्रगाढ़ करना भारत के हित में है। रिश्तों में कोई बाधा है तो वह है आर्थिक क्षेत्र की वजह से। व्यापार और निवेश बढ़ा तो है, लेकिन एक ऐसा ढांचा तैयार करना होगा जो दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग और विकास को आगे बढ़ा सके। चीन को सीमित रखना दोनों देशों का साझा लक्ष्य है। इन सब बातों के बावजूद हमें यह ध्यान रखना होगा कि अमरीका और चीन कभी कहीं साथ आ जाएं और हम ताकते रह जाएं। देशों के न स्थायी दोस्त होते हैं और न ही स्थायी दुश्मन होते हैं। सिर्फ हमारे हित स्थायी होते हैं। 1970-71 में चीन और अमरीका के रिश्तों में नाटकीयता हम देख चुके हैं।

नेपाल जैसे हमारे सबसे करीबी पड़ोसी देश ने हमारे इलाके पर दावा कर दिया। क्या पड़ोसियों के साथ हमारे संबंधों में गिरावट आई है?
गिरावट तो आई है। पाकिस्तान से तो कोई बात ही नहीं चल रही। श्रीलंका में चीन का प्रभाव बहुत बढ़ गया। केवल भूटान, बांग्लादेश और मालदीव ही तीन देश हैं जहां भारत के हित अब तक सुरक्षित हैं। बाकी देशों पर हमारे प्रभाव में गिरावट आई है। हर पड़ोसी देश चाहेगा कि भारत के समानांतर कोई और शक्ति भी खड़ी हो। इसलिए जरूरी है कि हम पूरे भारतीय उप महाद्वीप के लिए 'इंजिन ऑफ ग्रोथ' के रूप में स्थापित हों। ऐसा साझेदार बनें जो उनके आर्थिक और सामाजिक हितों में भागीदार हो। इन देशों से हमारी कनेक्टिविटी अच्छी नहीं। बाजार को खोलने को लेकर हमारी सोच भी ऐसी नहीं। हम सार्क को नजरअंदाज कर के भी गलत कर रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय नीति संबंधी विमर्श में घरेलू मुद्दों की कितनी अहमियत है?
भारत को अपने पड़ोसियों को भी विकास की यात्रा में आगे ले जाना है। लेकिन हमारे खुद के आधार स्तम्भ हिल रहे होंगे तो हम यह कैसे कर सकेंगे? दुनिया में प्रभाव स्थापित करने के लिए घरेलू मोर्चे पर इन चार चीजों का ध्यान रखना जरूरी है - घरेलू आर्थिक विकास, सामाजिक समावेशन, राजनीतिक लोकतंत्र और उदारवादी संवैधानिक व्यवस्था। संसद में जरूरी विषयों पर गंभीर विमर्श नहीं हो, सभी राजनीतिक दल ताकत और पैसे में विश्वास बढ़ाएं और राजनीति व प्रशासन का इसी तरह केंद्रीकरण होता रहे तो हम आगे नहीं बढ़ सकते।

'हमें अपनी स्वतंत्र नीति पर चलना होगा'
विदेश नीति और सामरिक मामलों पर देश एकजुट होता रहा है। क्या वर्तमान में ऐसा हो रहा है?
सरन- हर नई सरकार अपनी नीति पिछली सरकार से अलग व ज्यादा सफल दिखाती है, जबकि अहम मुद्दों पर एक निरंतरता दिखेगी। अमरीका को वाजपेयी ने 'नेचुरल अलाइ' बताया। यूपीए के परमाणु समझौते का विपक्ष ने विरोध किया, पर मौजूदा सरकार ने उसे और आगे बढ़ाया। इतिहास, भूगोल और शक्ति का संतुलन हर बदलती सरकार अपने मुताबिक नहीं बदल सकती।

अय्यर- बदलती वैश्विक परिस्थितियों के मुताबिक हमें रणनीति तो बदलनी होगी, लेकिन अपनी मूल नीति नहीं बदल सकते। हम अपनी पहचान नहीं खो सकते। हमें अपनी स्वतंत्र नीति पर चलना होगा। वैश्विक स्तर पर हमारी आकांक्षा और शक्ति को अधिकतम स्थान दिलाना है लेकिन आंतरिक लोकतंत्र और सहभागिता के बिना वैश्विक शक्ति का मोह बेमतलब होगा।

- चीन जहां जमा बैठा है वहां से उसे निकालने की स्थिति में हम नहीं।
- आर्थिक विकास में हमारे पिछडऩे के कारण चीन आज अडिय़ल रवैया अपना रहा।
- देशों के न स्थायी दोस्त होते हैं न स्थायी दुश्मन। सिर्फ हित स्थायी होते हैं।
- इतिहास, भूगोल व शक्ति का संतुलन बदलती सरकारें अपने मुताबिक नहीं बदल सकतीं।

हितों में भागीदार बनें...
हम पूरे भारतीय उप महाद्वीप के लिए 'इंजिन ऑफ ग्रोथ' के रूप में स्थापित हों। ऐसा साझेदार बनें जो पड़ोसियों के आर्थिक और सामाजिक हितों में भागीदार हो।
(श्याम सरन, पूर्व विदेश सचिव, परमाणु मामले-जलवायु परिवर्तन पर पीएम के विशेष प्रतिनिधि रहे हैं)

तो कैसे बढ़ेंगे आगे?
सभी राजनीतिक दल ताकत और पैसे में विश्वास बढ़ाएं और राजनीति व प्रशासन का इसी तरह केंद्रीकरण होता रहे तो हम आगे नहीं बढ़ सकते।
(यामिनी अय्यर, नीतिगत मामलों की जानी-मानी विचारक, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च की प्रमुख हैं)